Manipur: A Burning Periphery and a Silent Centre
Manipur is once again witnessing violence, but this is not an isolated घटना—it is part of a prolonged crisis that has been unfolding for nearly three years. Recent incidents, including the deaths of children in an explosion and civilians in security force firing, reveal a deep erosion of trust, safety, and social stability. Despite the gravity of the situation, national political discourse and mainstream media have remained largely silent, making the crisis appear invisible. Protests in Imphal, where thousands demanded peace, security, and a return to normal life, reflect the growing frustration of ordinary people whose voices are not being heard.
The conflict is not merely about law and order; it is rooted in historical and structural inequalities. The Meitei population, concentrated in the Imphal Valley, has long held greater access to political power and development, while tribal communities in the hill regions have faced marginalization. Over time, this imbalance has turned into a struggle over identity, representation, and control of resources.
Political strategies that rely on consolidating majority sentiment while fostering distrust toward minority groups have further deepened divisions. As a result, both Meitei and tribal communities are now caught in cycles of violence, while political institutions appear ineffective or disengaged.
The editorial argues that Manipur represents a deeper challenge to India’s pluralistic identity. Continued neglect could escalate tensions beyond the state, posing a serious threat to the country’s federal unity and integrity. It calls for urgent dialogue, inclusive governance, and a renewed commitment to diversity and coexistence.
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| बीबीसी हिन्दी समाचार से साभार |
आज फिर मणिपुर जल उठा है। यह कोई अचानक भड़की आग नहीं, बल्कि तीन वर्षों से सुलगती वह चिता है, जिसकी लपटें समय-समय पर हमारे सामने फूट पड़ती हैं—और फिर उतनी ही तेजी से राष्ट्रीय विमर्श से गायब हो जाती हैं।
कुछ ही दिन पहले एक गांव में हुए विस्फोट में दो बच्चों की मौत हो गई। उसी दिन गुस्साए लोगों ने पास के सीआरपीएफ कैंप पर हमला कर दिया। जवाब में हुई फायरिंग में तीन नागरिक मारे गए, दर्जनों घायल हुए। यह केवल एक घटना नहीं है—यह उस गहरे अविश्वास, भय और टूटते सामाजिक ताने-बाने का संकेत है, जिसे लगातार अनदेखा किया जा रहा है।
राजधानी इंफाल में आयोजित COCOMI की रैली, जो शांति और सामान्य जीवन की बहाली की मांग लेकर निकली थी, देखते ही देखते तनाव में बदल गई। हजारों लोग सड़कों पर थे—उनकी मांगें सरल थीं: हिंसा रुके, सुरक्षा सुनिश्चित हो, जीवन सामान्य हो। लेकिन इन सरल मांगों का उत्तर सत्ता और व्यवस्था के पास नहीं दिखता। सबसे चिंताजनक बात यह नहीं कि मणिपुर में हिंसा हो रही है—बल्कि यह है कि इस हिंसा पर राष्ट्रीय राजनीति और मुख्यधारा मीडिया लगभग मौन है। मानो देश के एक कोने में जलती आग, शेष भारत के लिए अप्रासंगिक हो।
यदि हम इस संकट की तह में जाएँ, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है। यह एक गहरी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना का परिणाम है। मणिपुर की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय असमानता—जहाँ लगभग 10% भूभाग (इंफाल घाटी) में 59% मैतेई आबादी निवास करती है, जबकि 90% पहाड़ी क्षेत्र में फैली 41% जनजातीय आबादी (कुकी, नागा, चिन आदि) रहती है—संघर्ष की मूल भूमि तैयार करती है। इतिहास गवाह है कि 17वीं सदी में वैष्णव प्रभाव के साथ मैतेई समाज का सांस्कृतिक रूपांतरण हुआ, जबकि पहाड़ी कबीलों ने अपनी पारंपरिक पहचान को बनाए रखा। औपनिवेशिक काल में ईसाई प्रभाव ने एक और परत जोड़ दी। परिणामस्वरूप मणिपुर एक बहुस्तरीय पहचान का प्रदेश बन गया—जहाँ ‘एक’ नहीं, बल्कि कई मणिपुर साथ-साथ अस्तित्व में हैं।
समस्या तब गहराती है जब इस विविधता को समझने के बजाय, उसे एकरूप बनाने की कोशिश की जाती है। मैतेई भाषा को “मणिपुरी” के रूप में राष्ट्रीय मान्यता मिलती है, जबकि अन्य दर्जनों जनजातीय भाषाएँ और संस्कृतियाँ हाशिए पर चली जाती हैं। विकास का केंद्र घाटी बनता है, सत्ता-प्रशासन उसी के इर्द-गिर्द सिमटता है, और पहाड़ों में रहने वाली आबादी स्वयं को उपेक्षित पाती है। आज का संघर्ष केवल भूगोल या संसाधनों का नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और पहचान का है। मैतेई समुदाय, जो लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहा, अब अपने विस्तार और अधिकारों के लिए पहाड़ियों की ओर देखता है। वहीं जनजातीय समुदाय इसे अपने अस्तित्व पर अतिक्रमण मानते हैं।
इस पूरे परिदृश्य में राजनीति की भूमिका निर्णायक हो जाती है। बहुसंख्यक को गोलबंद कर सत्ता में बने रहने की रणनीति—जो देश के अन्य हिस्सों में भी देखी जा सकती है—मणिपुर में एक खतरनाक रूप ले चुकी है। अल्पसंख्यक के प्रति अविश्वास और घृणा का निर्माण, बहुसंख्यक एकता का सबसे आसान, और सबसे विनाशकारी उपकरण बन गया है। विडंबना यह है कि यह रणनीति अंततः सभी को जलाती है। कुकी और मैतेई—दोनों समुदाय आज हिंसा की आग में झुलस रहे हैं। परन्तु चौसर के खिलाड़ी—राजनीतिक शक्ति केंद्र—मौन हैं।
और शायद सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या हम भी इस मौन के हिस्सेदार हैं? जब मीडिया इस त्रासदी को प्राथमिकता नहीं देता, जब राष्ट्रीय विमर्श में इसकी जगह नहीं बनती, तब एक पूरा प्रदेश धीरे-धीरे ‘अदृश्य’ बना दिया जाता है। यह अदृश्यता ही सबसे खतरनाक है—क्योंकि यह अन्याय को सामान्य बना देती है। मणिपुर आज केवल एक राज्य का संकट नहीं है; यह उस भारत का आईना है, जहाँ विविधता को समझने के बजाय उसे नियंत्रित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है—जहाँ पहचान की राजनीति, सह-अस्तित्व की संभावना को निगल रही है।
यदि यह आग नहीं बुझी, तो इसकी लपटें केवल मणिपुर तक सीमित नहीं रहेंगी—वे देश की संघीय एकता और अखण्डता के लिए गंभीर चुनौती बन जाएँगी। और यह भी कम चिंताजनक नहीं कि राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ कहीं और भटकती दिखती हैं। जब देश का एक हिस्सा जल रहा हो, तब सत्ता और मीडिया का ध्यान चुनावी अभियानों या राजनीतिक विस्तार पर अधिक केंद्रित होना एक असहज प्रश्न खड़ा करता है—क्या वास्तव में राष्ट्र की पीड़ा हमारे सार्वजनिक विमर्श का केंद्र है? समय है—मौन तोड़ने का, संवाद शुरू करने का, और उस भारत को पुनः याद करने का, जो अपनी विविधताओं में ही अपनी शक्ति देखता था।
डॉ. आर. अचल पुलस्तेय
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
Multidisciplinary scholar focusing on socio-economic transitions and geopolitical shifts in the Eastern hemisphere.
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