पुराणों में देवी कामाख्या : आदिम आस्था से आदिशक्ति तक (भाग–2)

Culture | संस्कृति

Date : June 09, 2026   |   Author : डॉ.दुष्यंत कुमार शाह

Kamakhya Shakti Peetha in the Puranas: Sati, Kamadeva, Kalika Purana and the Evolution of the Divine Feminine

The Kamakhya Shakti Peetha, located on Nilachal Hill in Assam, occupies a unique place in the religious and cultural history of India. This article examines how various Puranic traditions interpreted and redefined the worship of Goddess Kamakhya, transforming an ancient fertility and mother-goddess cult into one of the most significant centers of Shakta spirituality.

Drawing upon the Shiva Purana, Padma Purana, Devi Bhagavata Purana, Skanda Purana, and Kalika Purana, the study explores the multiple identities of Kamakhya—as Sati’s sacred Yoni, the primordial Adi Shakti, the granter of desires, and the cosmic source of creation. While the narratives differ in detail, they collectively emphasize the goddess as the embodiment of creative energy, fertility, power, and spiritual transformation.

Special attention is given to the Kalika Purana, which elevated Kamakhya from a regional mother deity to the supreme center of Shakta and Tantric traditions. The article argues that the diverse Puranic narratives do not represent contradictions but rather successive cultural and theological interpretations of a much older sacred tradition. Through these texts, Kamakhya emerges as a symbol of India's enduring synthesis of indigenous beliefs, Puranic mythology, and Tantric philosophy.

Keywords: Kamakhya, Kamakhya Temple, Kamakhya Shakti Peetha, Kalika Purana, Shaktism, Tantra, Adi Shakti, Nilachal Hill, Kamarupa, Goddess Worship, Indian Mythology, Sacred Geography.

शिवपुराण, पद्मपुराण, देवी भागवत और कालिका पुराण में वर्णित देवी कामाख्या, कामाख्या शक्तिपीठ, कामरूप और तंत्र साधना की रहस्यमयी कथायें जानिए।

कामाख्या शक्तिपीठ भारत के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी शक्ति-स्थलों में गिना जाता है। लेकिन क्या देवी कामाख्या की कथा केवल मंदिर से शुरू होती है, या उसका इतिहास पुराणों और प्राचीन मातृ-आस्थाओं में कहीं अधिक गहरा है? शिवपुराण, पद्मपुराण, देवी भागवत, स्कंद पुराण और कालिका पुराण में देवी कामाख्या के अनेक स्वरूप मिलते हैं। कहीं वे सती की महामुद्रा हैं, कहीं आदिशक्ति, कहीं महामाया और कहीं सृष्टि की मूल रचनात्मक शक्ति। यह लेख उन पौराणिक स्रोतों की पड़ताल करता है जिन्होंने कामाख्या को भारतीय शक्ति परंपरा के केंद्र में स्थापित किया।

पुराणों ने देवी कामाख्या की रचा नहींं, आदिम आस्था को नया स्वरूप दिया?

नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या शक्तिपीठ के बारे में जब हम पुराणों और तांत्रिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है। कामाख्या से जुड़ी कथाएँ किसी एक ग्रंथ या परंपरा तक सीमित नहीं हैं। शिवपुराण, पद्मपुराण, देवी भागवत, स्कंद पुराण, कालिका पुराण, योगिनी तंत्र तथा अनेक स्थानीय परंपराओं में देवी का उल्लेख मिलता है, किंतु इन सभी का स्वरूप और दृष्टिकोण एक समान नहीं है।

कहीं देवी सती के रूप में प्रकट होती हैं, कहीं आदिशक्ति के रूप में, कहीं महामाया के रूप में और कहीं सृष्टि की मूल कामना तथा सृजन-ऊर्जा के प्रतीक के रूप में। पहली दृष्टि में ये कथाएँ परस्पर भिन्न प्रतीत हो सकती हैं, किंतु भारतीय धार्मिक परंपरा की विशेषता ही यह है कि वह विविध कथाओं को एक ही आध्यात्मिक सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियों के रूप में स्वीकार करती है।

संभवतः एक ही मूल आस्था को विभिन्न पुराणों ने अपने-अपने देशकाल, सांस्कृतिक परिवेश और दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार व्यक्त किया। यही कारण है कि कहीं 51 शक्तिपीठों का उल्लेख मिलता है, कहीं 52, कहीं 64 और कहीं 108 शक्तिपीठों का। सती के अंगों, दक्ष प्रजापति की कन्याओं तथा शक्तिपीठों की सूचियों में भी विभिन्न ग्रंथों में भिन्नताएँ दिखाई देती हैं।

वास्तव में पुराण आधुनिक अर्थों में इतिहास नहीं हैं। वे समाज की सांस्कृतिक स्मृति, धार्मिक कल्पना और दार्शनिक चिंतन के दस्तावेज हैं। वे यह बताते हैं कि विभिन्न युगों में लोगों ने स्वयं को, प्रकृति को और दिव्यता को किस प्रकार समझा। इस दृष्टि से पुराण केवल घटनाओं का नहीं, बल्कि मानव-चेतना का इतिहास हैं।

इसीलिए शक्तिपीठों का भूगोल भी भारतीय सांस्कृतिक भूगोल की तरह व्यापक दिखाई देता है। काशी, प्रयाग, उज्जैन, मिथिला, कामरूप, बंगाल, ढाका, लाहौर और लंका तक फैले शक्तिपीठ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक एकता के आध्यात्मिक प्रतीक भी हैं।

शिवपुराण में कामाख्या : सती की महामुद्रा और महापीठ

कामाख्या से जुड़ी सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा शिवपुराण में मिलती है। इसके अनुसार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, किंतु अपने दामाद भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। अपमान से आहत सती ने यज्ञ-अग्नि में आत्मदाह कर लिया।

सती की मृत्यु से व्याकुल शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे। सृष्टि के संतुलन की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित कर दिया। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए।

मान्यता है कि नीलांचल पर्वत पर सती का योनि-भाग अथवा महामुद्रा गिरी थी। इसी कारण कामाख्या को सभी शक्तिपीठों में विशिष्ट स्थान प्राप्त हुआ और इसे महापीठ कहा गया। आज भी मंदिर के गर्भगृह में किसी मूर्ति के स्थान पर प्राकृतिक शैल-गह्वर की पूजा इसी परंपरा की स्मृति मानी जाती है।

पद्मपुराण में कामाख्या : कामदेव और कामरूप की कथा

पद्मपुराण में कामाख्या का संबंध मुख्यतः कामदेव की कथा से जुड़ा है।

सती के निधन के बाद शिव गहन समाधि में लीन हो गए। देवताओं को भय हुआ कि यदि उनका वैराग्य बना रहा तो सृष्टि का संतुलन बाधित हो जाएगा। तब उन्होंने कामदेव को शिव का ध्यान भंग करने के लिए भेजा।

कामदेव ने अपने पुष्पबाण चलाए, किंतु शिव ने क्रोधित होकर तीसरा नेत्र खोल दिया और वे भस्म हो गए। बाद में रति और देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने उनके पुनर्जीवन का मार्ग बताया।

कामदेव नीलांचल पर्वत पहुँचे और देवी की तपस्या की। देवी की कृपा से उन्हें पुनः रूप और सौंदर्य प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि इसी कारण क्षेत्र का नाम कामरूप और देवी का नाम कामाख्या पड़ा।

यह कथा केवल प्रेम और सौंदर्य की नहीं, बल्कि विनाश के बाद पुनर्जन्म तथा पुनर्सृजन की संभावना का भी प्रतीक है।

देवी भागवत में कामाख्या : आदिशक्ति का सर्वोच्च स्वरूप

देवी भागवत पुराण में कामाख्या को केवल एक शक्तिपीठ नहीं, बल्कि स्वयं आद्याशक्ति का निवास माना गया है।

यहाँ देवी सृष्टि की मूल प्रकृति और समस्त इच्छाओं की अधिष्ठात्री हैं। पुराण के अनुसार नीलांचल पर्वत पर स्थित यह पीठ ऐसा दिव्य केंद्र है जहाँ देवी अदृश्य रूप में निवास करती हैं।

देवी भागवत में ‘कामाख्या’ का अर्थ इच्छाओं को पूर्ण करने वाली शक्ति के रूप में किया गया है। यहाँ देवी का स्वरूप अपेक्षाकृत सौम्य, करुणामयी और कल्याणकारी दिखाई देता है। वे केवल युद्ध और संहार की देवी नहीं, बल्कि प्रेम, समृद्धि और जीवन-ऊर्जा की अधिष्ठात्री भी हैं।

स्कंद पुराण में कामरूप : देवी की क्रीड़ाभूमि

स्कंद पुराण में कामाख्या का वर्णन अपेक्षाकृत संक्षिप्त है, किंतु उसका महत्व कम नहीं है।

इस ग्रंथ में कामरूप को देवी की क्रीड़ाभूमि और शक्ति की पवित्र भूमि कहा गया है। यहाँ की उपासना को विशेष फलदायी माना गया है। इससे संकेत मिलता है कि मध्यकाल तक कामरूप भारतीय तीर्थ-परंपरा में एक प्रतिष्ठित केंद्र बन चुका था।

स्कंद पुराण की दृष्टि में कामरूप केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि ऐसी भूमि है जहाँ शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

कालिका पुराण में कामाख्या : सृष्टि, काम और महामाया की देवी

यदि कामाख्या की महिमा का सर्वाधिक विस्तृत वर्णन किसी ग्रंथ में मिलता है, तो वह कालिका पुराण है। लगभग 10वीं–11वीं शताब्दी में कामरूप क्षेत्र में रचित यह ग्रंथ स्थानीय मातृ-आस्था को शाक्त और तांत्रिक दर्शन से जोड़कर उसे एक व्यापक धार्मिक स्वरूप प्रदान करता है।

कालिका पुराण के अनुसार कामाख्या केवल सती के अंगपतन से निर्मित शक्तिपीठ नहीं हैं; वे स्वयं महामाया, कामेश्वरी और आदिशक्ति हैं। ग्रंथ में वर्णित है कि सृष्टि के प्रारंभ में शिव और शक्ति का प्रथम दिव्य संयोग नीलांचल पर्वत पर हुआ था। इसलिए यह स्थान सृष्टि की मूल ऊर्जा और रचनात्मक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

यहाँ ‘काम’ का अर्थ केवल सांसारिक इच्छा नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल प्रेरणा और सृजन-शक्ति है। इस दृष्टि से कामाख्या वह देवी हैं जिनसे समस्त जीवन और सृजन का प्रवाह आरंभ होता है।

कामदेव और कामरूप की कथा

कालिका पुराण में कामदेव की कथा को भी विशेष महत्व दिया गया है। शिव के क्रोध से भस्म होने के बाद उन्होंने नीलांचल पर्वत पर देवी की तपस्या की और देवी की कृपा से पुनः अपना रूप प्राप्त किया। इसी घटना से कामरूप और कामाख्या नामों की व्याख्या की जाती है।

नरकासुर और देवी कामाख्या

कालिका पुराण में कामरूप के पौराणिक राजा नरकासुर की कथा भी मिलती है। प्रारंभ में वह देवी का भक्त था, किंतु शक्ति और सामर्थ्य के अहंकार में डूब गया। लोककथाओं के अनुसार उसने देवी से विवाह की इच्छा प्रकट की और ऋषियों का अपमान किया।

अंततः उसका विनाश हुआ। यह कथा इस आध्यात्मिक सत्य की ओर संकेत करती है कि देवी की कृपा विनम्रता से प्राप्त होती है, अहंकार से नहीं।

तंत्र-साधना का सर्वोच्च पीठ

कालिका पुराण की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह कामाख्या को केवल एक तीर्थ नहीं मानता। ग्रंथ के अनुसार यह स्थान तंत्र-साधना, योगिनी उपासना और शक्ति-सिद्धि का सर्वोच्च केंद्र है।

यहीं से कामाख्या का वह स्वरूप विकसित होता है जिसने आगे चलकर योगिनी तंत्र, कौल परंपरा और वज्रयान बौद्ध साधना तक को प्रभावित किया। नीलांचल पर्वत की प्राकृतिक महायोनि को सृष्टि के मूल स्रोत के रूप में प्रतिष्ठित कर कालिका पुराण ने कामाख्या को भारतीय शक्ति-दर्शन के केंद्र में स्थापित कर दिया।

एक देवी, अनेक कथाएँ

शिवपुराण, पद्मपुराण, देवी भागवत, स्कंद पुराण और कालिका पुराण की कथाओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि कामाख्या किसी एक मिथक, एक ग्रंथ या एक धार्मिक परंपरा की देवी नहीं हैं। वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना में विकसित उस आदिशक्ति का रूप हैं, जिसे विभिन्न युगों और समुदायों ने अपने अनुभवों, प्रतीकों और विश्वासों के माध्यम से समझने का प्रयास किया।

  • शिवपुराण में वे सती की महामुद्रा हैं।
  • पद्मपुराण में कामदेव को पुनर्जीवन देने वाली शक्ति।
  • देवी भागवत में आदिशक्ति और मूल प्रकृति।
  • स्कंद पुराण में कामरूप की अधिष्ठात्री देवी।
  • कालिका पुराण में सृष्टि की मूल रचनात्मक ऊर्जा।

इन सभी कथाओं के पीछे चाहे भिन्न धार्मिक दृष्टिकोण हों, उनका केंद्र एक ही है—सृष्टि की मूल शक्ति के प्रति श्रद्धा।

इसीलिए कामाख्या केवल एक मंदिर या एक शक्तिपीठ नहीं हैं। वे भारतीय सभ्यता की उस दीर्घ सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक हैं, जिसमें आदिम मातृ-आस्था, पुराणिक कल्पना, शाक्त दर्शन और तांत्रिक साधना एक-दूसरे में विलीन होकर एक अद्वितीय आध्यात्मिक परंपरा का निर्माण करती हैं।

अगले भाग मे

बौद्ध और तांत्रिक ग्रंथों में देवी कामाख्या : महायोनि, योगिनियाँ और शक्ति-साधना का रहस्य — जहाँ कामाख्या केवल देवी नहीं, बल्कि तांत्रिक ब्रह्मांड की केंद्रीय शक्ति के रूप में उभरती हैं।

डॉ. दुष्यंत कुमार शाह
डॉ. दुष्यंत कुमार शाह - किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। इतिहास,पुरातत्व,संस्कृति के प्रतिष्ठित विद्वान के साथ साहित्य, समीक्षा और यात्रिकी लेखन में आपका महत्वपूर्ण योगदान है। महान गणराज्य गढ़मण्डला- आदिवासी इतिहास पुस्तक के सह लेखक, कोरोनाकाल कथा-स्वर्ग में सेमीनार उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद (Seminar in Heaven A Global Chronicle of the Pandemic) किया है। आपके कई शोधपत्र विभिन्न राष्ट्रीय,अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित है।
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