Youth Protests, Government Accountability & Indian Democracy
The editorial examines the growing discontent among India's youth over repeated failures in public examinations, recruitment delays, and the perceived lack of governmental accountability. It argues that peaceful protest is not a threat to democracy but one of its defining characteristics, emerging when institutional dialogue fails. Drawing upon India's democratic traditions and historical ideals of ethical governance, the article questions why governments often resist accepting moral responsibility despite widespread public dissatisfaction. It further warns against dismissing popular movements as politically motivated or foreign conspiracies, emphasizing that such protests frequently reflect genuine administrative failures. The editorial concludes that democratic legitimacy depends not merely on electoral victories but on responsiveness, transparency, and the willingness to listen to citizens—especially young people whose trust will determine the future of India's democracy.
Keywords:Youth Protests in India,Government Accountability,Indian Democracy,Democratic Responsibility,Youth Anger ,Examination Crisis,Public Recruitment,Moral Responsibility,Democratic Governance,Public Trust,Civil Protest,Political Accountability
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| डॉ.चतुरानन ओझा के सौजन्य से |
भारतीय परंपरा में भी शासक और प्रजा के बीच संवाद का महत्व स्वीकार किया गया था। राजाओं के दरबारों में न्याय के घंटे लगाए जाते थे ताकि कोई भी पीड़ित अपनी बात सीधे शासक तक पहुँचा सके। आधुनिक लोकतंत्र में तो जनता स्वयं सर्वोच्च है। इसलिए यदि जनता—विशेषकर युवा—बार-बार अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं और सत्ता मौन बनी हुई है, तो यह प्रशासनिक नहीं, लोकतांत्रिक संकट है।
आज देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक आंदोलन चल रहे हैं। मणिपुर में शांति की मांग है, आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन बचाने की लड़ाई है, मजदूर बेहतर वेतन और सम्मानजनक श्रम परिस्थितियों की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच दिल्ली में उमड़ा युवाओं का आक्रोश एक अलग संदेश दे रहा है। यहाँ न सत्ता परिवर्तन की मांग है, न किसी वैचारिक क्रांति की। मांग केवल इतनी है कि जिन परीक्षाओं के भरोसे लाखों युवाओं ने अपने जीवन के वर्ष दांव पर लगाए हैं, वे समय पर और निष्पक्ष रूप से सम्पन्न हों। यदि व्यवस्था बार-बार विफल हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय हो।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। आखिर सरकार की जिद का कारण क्या है?
यदि किसी मंत्री के कार्यकाल में लगातार परीक्षाएँ विवादों में घिरें, पेपर लीक हों, परीक्षाएँ स्थगित हों, अभ्यर्थियों का भरोसा टूटे और लाखों युवा सड़कों पर उतर आएँ, तब भी यदि सरकार यह संदेश दे कि किसी स्तर पर कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती, तो लोकतंत्र किस सिद्धांत पर चलेगा? क्या अब जवाबदेही केवल विपक्ष के लिए आरक्षित शब्द बनकर रह गई है?
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह किस बात पर अड़ी हुई है। क्या उसे यह स्वीकार करने में कठिनाई है कि व्यवस्था में गंभीर खामियाँ हैं? क्या उसे यह भय है कि यदि एक मंत्री ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर ली तो जवाबदेही की परंपरा स्थापित हो जाएगी? या फिर सत्ता का अहंकार इस स्तर तक पहुँच चुका है कि लाखों युवाओं का आक्रोश भी उसे विचलित नहीं करता?
लोकतंत्र में नैतिक उत्तरदायित्व कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति का प्रतीक माना जाता है। विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में मंत्री छोटी-सी प्रशासनिक चूक पर भी इस्तीफा दे देते हैं। वे इसलिए नहीं जाते कि वे अपराधी हैं, बल्कि इसलिए कि जनता का विश्वास सर्वोपरि है। भारतीय संस्कृति में तो भगवान राम ने भी प्रजा की बात पर सीता को वनवास भेज दिया था। फिर राम आदर्श मानने वाली सरकार जनता की बात क्यों नहीं सुन पा रही है?
भारत में भी यही राजनीतिक संस्कृति रही है। आज प्रश्न यह है कि क्या नैतिकता अब केवल किताबों, भाषणों और चुनावी घोषणापत्रों तक सीमित होकर रह गई है? सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि सरकार युवाओं के धैर्य की परीक्षा ले रही है। यह वही पीढ़ी है जिसने वर्षों तक तैयारी की, बेरोजगारी के बीच संघर्ष किया, परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाया और फिर भी व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखा। यदि यही वर्ग यह महसूस करने लगे कि उसकी आवाज़ का कोई मूल्य नहीं है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगेगी। लोकतंत्र जनता के विश्वास पर चलता है, पुलिस बल या प्रशासनिक आदेशों पर नहीं।
सरकारों को यह समझना होगा कि हर आंदोलन विपक्ष की साजिश नहीं होता। आज कल यह देखने आ रहा है कि किसी भी आंदोलन को विदेशी साजिश कर खारिज करने कोशिश भी हो रही है। जबकि यथार्थ यह है कि कोई भी आंदोलन शासन की विफलताओं का आईना होते हैं। उस आईने को तोड़ देने से चेहरा सुंदर नहीं हो जाता। यह भी उतना ही सत्य है कि युवाओं का आंदोलन संविधान की मर्यादाओं और अहिंसक लोकतांत्रिक तरीकों के भीतर रहना चाहिए। हिंसा किसी भी न्यायपूर्ण मांग को कमजोर करती है। लेकिन सरकार के लिए भी यह उतना ही आवश्यक है कि वह शांतिपूर्ण विरोध को अनसुना करने की नीति न अपनाए। लोकतंत्र में संवाद की जगह यदि जिद ले ले, तो समाधान की जगह टकराव जन्म लेता है। शान्तिपूर्ण अहिंसक आंदोलनों का दमन उसे उग्र और हिंसक भी बना देते है।
आज देश के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि परीक्षाएँ कब होंगी या कौन मंत्री रहेगा। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारतीय लोकतंत्र में नैतिक जवाबदेही का स्थान समाप्त हो चुका है? क्या सत्ता के लिए पद अधिक महत्वपूर्ण हो गया है और युवाओं का भविष्य कम? क्या सरकार यह संदेश देना चाहती है कि लाखों युवाओं का आक्रोश भी उसकी राजनीतिक प्राथमिकताओं को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर 'हाँ' की ओर जाता है, तो यह केवल युवाओं की हार नहीं होगी, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा की पराजय होगी।
सरकारें बहुमत से बनती हैं, लेकिन उनका नैतिक अधिकार जनता के विश्वास से संचालित होता है। इसलिए समय आ गया है कि सरकार जिद छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाए, जवाबदेही तय करें और यह सिद्ध करें कि भारतीय लोकतंत्र में जनता की आवाज़ अभी भी सत्ता के दरवाज़े तक पहुँचती है। क्योंकि जिस लोकतंत्र में युवा स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगें, वहाँ भविष्य केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, लोकतंत्र का भी संकट बन जाता है।
Dr. R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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