EASTERN SCIENTIST | संपादकीय
आरक्षण पर भारत में बहस होते ही दो शब्द सबसे पहले सामने आते हैं—योग्यता और समानता। आरक्षण के विरोध में कहा जाता है कि यह प्रतिभा के साथ अन्याय है, जबकि समर्थन में कहा जाता है कि सदियों से असमान समाज में केवल प्रतियोगिता की घोषणा कर देना समान अवसर की गारंटी नहीं हो सकता।
लेकिन इस बहस को केवल भारत की सीमा में देखना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल होगी।
दुनिया के अनेक देशों ने अपने-अपने इतिहास में पैदा हुई असमानताओं को कम करने के लिए ऐसी व्यवस्थाएं बनाई हैं, जिन्हें व्यापक अर्थ में Affirmative Action या Positive Discrimination कहा जाता है। कहीं इसका आधार नस्ल है, कहीं मूलनिवासी पहचान, कहीं सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन और कहीं ऐतिहासिक भेदभाव।
अर्थात प्रश्न यह नहीं है कि दुनिया में आरक्षण जैसा कोई विचार है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि किस समाज ने किस ऐतिहासिक अन्याय के जवाब में किस प्रकार की सकारात्मक कार्रवाई चुनी है।
अमेरिका इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहां विश्वविद्यालय प्रवेश में नस्ल-आधारित कठोर कोटा लंबे समय से कानूनी विवाद का विषय रहा है। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में Harvard और University of North Carolina से जुड़े मामलों में नस्ल को प्रवेश निर्णय का प्रत्यक्ष आधार बनाने पर गंभीर संवैधानिक सीमाएं लगाईं। इसके बावजूद अमेरिकी इतिहास से नस्लीय भेदभाव को मिटाने के लिए affirmative action की पूरी बहस समाप्त नहीं हुई; उसका स्वरूप बदल रहा है।
दक्षिण अफ्रीका का अनुभव इससे बिल्कुल अलग है। रंगभेद की व्यवस्था ने अश्वेत बहुसंख्यक आबादी को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा था। लोकतांत्रिक संविधान के बाद वहां प्रतिनिधित्व और आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए Black Economic Empowerment जैसी नीतियां विकसित हुईं। यहां सकारात्मक कार्रवाई केवल विश्वविद्यालय में प्रवेश का सवाल नहीं रही, बल्कि रोजगार, स्वामित्व, कौशल और आर्थिक भागीदारी से जुड़ गई।
मलेशिया का मॉडल तो और भी अलग है। वहां Bumiputera नीति के माध्यम से मलय और कुछ अन्य मूलनिवासी समूहों को शिक्षा, व्यवसाय, आवास और आर्थिक अवसरों में प्राथमिकता दी गई। यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह धारणा टूटती है कि affirmative action हमेशा किसी छोटे अल्पसंख्यक समूह के लिए ही होती है। कभी-कभी किसी देश में ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां बहुसंख्यक समुदाय के एक विशिष्ट समूह के लिए भी विशेष नीति का आधार बनती हैं।
ब्राजील ने नस्ल और सामाजिक-आर्थिक असमानता को एक साथ संबोधित करने का प्रयास किया। 2012 के कानून के बाद संघीय विश्वविद्यालयों में सरकारी विद्यालयों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए कोटा व्यवस्था बनाई गई, जिसमें आय, नस्ल और आदिवासी पहचान जैसे तत्वों को भी शामिल किया गया। यह मॉडल बताता है कि सामाजिक असमानता का कोई एक कारण नहीं होता और इसलिए उसका समाधान भी केवल एक कसौटी से नहीं निकाला जा सकता।
ब्रिटेन का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत अलग है। वहां सकारात्मक कार्रवाई को कठोर कोटा के बजाय प्रशिक्षण, अवसर और प्रतिनिधित्व बढ़ाने के उपायों से जोड़ा गया है। समान योग्यता की स्थिति में कम प्रतिनिधित्व वाले समूह को प्राथमिकता देने जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन नस्ल या लिंग के आधार पर स्थायी सीटें आरक्षित करने की अमेरिकी या भारतीय शैली की व्यवस्था नहीं है।
इन उदाहरणों को एक साथ रखने पर एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—दुनिया में affirmative action का कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं है।
हर समाज ने अपने इतिहास के अनुसार इसका स्वरूप तय किया है।
यही बात भारत पर भी लागू होती है।
भारत की आरक्षण व्यवस्था केवल गरीबी उन्मूलन की योजना नहीं है। इसका मूल संबंध सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा ऐतिहासिक बहिष्करण से है। भारतीय संविधान निर्माताओं के सामने केवल यह प्रश्न नहीं था कि गरीब व्यक्ति को अवसर कैसे मिले; उनके सामने यह बड़ा प्रश्न था कि जिस समाज में कुछ समुदायों को शिक्षा, प्रशासन, सार्वजनिक संस्थानों और सामाजिक सम्मान से पीढ़ियों तक दूर रखा गया, उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में वास्तविक भागीदारी कैसे मिले।
इसलिए भारत के आरक्षण को केवल आर्थिक सहायता की भाषा में समझना अधूरा है।
यह मूलतः प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी है।
यहीं 'मेरिट' की बहस सबसे अधिक जटिल हो जाती है।
क्या परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त कर लेना ही प्रतिभा का अंतिम प्रमाण है?
या यह भी देखा जाना चाहिए कि दो विद्यार्थियों की प्रतिस्पर्धा किन सामाजिक परिस्थितियों में हुई?
एक विद्यार्थी ऐसे विद्यालय में पढ़ता है जहां पुस्तकालय, इंटरनेट, प्रशिक्षित शिक्षक और निजी मार्गदर्शन उपलब्ध हैं। दूसरा विद्यार्थी ऐसे वातावरण से आता है जहां उसके परिवार में पहली पीढ़ी स्कूल तक पहुंची है और पढ़ाई के साथ उसे आर्थिक तथा सामाजिक बाधाओं से भी लड़ना पड़ा है।
दोनों को एक ही परीक्षा-कक्ष में बैठा देने से प्रतियोगिता औपचारिक रूप से समान हो सकती है, लेकिन क्या वह सामाजिक रूप से समान भी हो जाती है?
यही वह बिंदु है जहां समानता और न्याय के बीच अंतर दिखाई देता है।
समानता का अर्थ है—सबको एक जैसा अवसर देना।
सामाजिक न्याय का प्रश्न पूछता है—क्या सब वास्तव में उस अवसर तक समान स्थिति से पहुंच रहे हैं?
आरक्षण इसी दूसरे प्रश्न का राजनीतिक उत्तर है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आरक्षण की हर नीति स्वतः न्यायपूर्ण है।
आरक्षण पर आलोचनात्मक प्रश्न उठना चाहिए।
क्या लाभ वास्तव में सबसे वंचित तक पहुंच रहा है?
क्या आरक्षण का लाभ एक ही सामाजिक समूह के अपेक्षाकृत सक्षम हिस्से तक सीमित होता जा रहा है?
क्या शिक्षा की गुणवत्ता सुधारे बिना केवल सीटों का पुनर्वितरण पर्याप्त है?
क्या आरक्षण के साथ प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, ग्रामीण अवसंरचना और आर्थिक अवसरों में समान निवेश हो रहा है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आरक्षण को स्थायी समाधान मान लिया गया है या सामाजिक असमानता समाप्त करने के संक्रमणकालीन उपकरण के रूप में देखा जा रहा है?
इन प्रश्नों से बचना आरक्षण का समर्थन करना नहीं, बल्कि उसे कमजोर करना है।
दूसरी ओर, आरक्षण का विरोध करते समय यह कहना कि "अब तो सब बराबर हैं" इतिहास और वर्तमान दोनों से आंखें मूंद लेना है। सामाजिक भेदभाव केवल कानून बदल देने से समाप्त नहीं होता। कानून छुआछूत को अपराध घोषित कर सकता है, लेकिन सामाजिक व्यवहार को बदलने में पीढ़ियां लग सकती हैं।
इसीलिए दुनिया में affirmative action को लेकर बहस आज भी जारी है।
एक पक्ष कहता है कि व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी वर्तमान योग्यता और आर्थिक स्थिति से होना चाहिए। दूसरा पक्ष पूछता है कि यदि समाज में अवसरों का वितरण ही असमान है तो केवल वर्तमान उपलब्धि को आधार बनाना क्या वास्तव में निष्पक्ष होगा?
शायद समाधान इन दोनों के बीच कहीं है।
आरक्षण को न तो प्रतिभा का शत्रु मानना चाहिए और न सामाजिक न्याय का अंतिम समाधान।
यह एक उपकरण है—और हर उपकरण की तरह इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से और कितनी सावधानी से किया जाता है।
भारत को दुनिया से यह सीखने की आवश्यकता है कि affirmative action के अनेक मॉडल मौजूद हैं। अमेरिका से कानूनी सीमाओं की बहस समझी जा सकती है, दक्षिण अफ्रीका से प्रतिनिधित्व और आर्थिक भागीदारी का अनुभव, ब्राजील से सामाजिक-आर्थिक और नस्ली मानकों के संयोजन का प्रयोग और मलेशिया से यह सवाल कि सकारात्मक कार्रवाई का लाभ किस समूह को और कितने समय तक दिया जाना चाहिए।
लेकिन भारत को अपनी ऐतिहासिक वास्तविकता से अलग होकर कोई विदेशी मॉडल नहीं अपनाना चाहिए।
भारत की चुनौती अपनी है—और इसलिए समाधान भी भारतीय होना चाहिए।
हमें आरक्षण की बहस को 'आरक्षण बनाम मेरिट' के संकुचित द्वंद्व से बाहर निकालना होगा।
सवाल यह होना चाहिए कि ऐसी व्यवस्था कैसे बने जिसमें प्रतिभा को अवसर मिले, वंचित को रास्ता मिले और सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़े।
क्योंकि जिस समाज में प्रतियोगिता की शुरुआत ही असमान जमीन से होती है, वहां केवल अंतिम अंक देखकर न्याय का फैसला नहीं किया जा सकता।
और शायद यही आरक्षण का सबसे बड़ा वैश्विक सबक है—
दुनिया ने समानता को केवल कानून की किताब में नहीं छोड़ा; अलग-अलग समाजों ने उसे व्यवहार में उतारने के लिए अलग-अलग रास्ते खोजे हैं। भारत का आरक्षण भी उसी लंबी वैश्विक खोज का एक भारतीय अध्याय है।
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