काजीरंगा पर संकट: क्या भारत अब भी चुप रहेगा?

काजीरंगा खतरे में है। हसदेव और अरावली के अनुभव के बीच सवाल है—क्या भारत काजीरंगा को बचाने के लिए अब अपनी सामूहिक आवाज उठाएगा?
Editorial Analysis
Published: August 19, 2026 | Editor in Chief | काजीरंगा संकट | काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान | काजीरंगा बचाओ |
Kaziranga Under Threat: Will India Remain Silent?

Abstract

The growing concerns over Kaziranga National Park are not merely an Assam issue but a national environmental challenge. The struggles to protect the Hasdeo forests, as well as forests in Odisha, Madhya Pradesh and Maharashtra, show how local communities and environmentalists are often left to fight alone while the rest of the country remains silent. The response to the Aravalli crisis, however, demonstrated that when a wider region unites, public pressure can compel the government to reconsider its decisions.
Kaziranga now faces a similar test. The people of Assam and a few environmentalists are raising their voices, but much of India remains silent. Kaziranga is not merely Assam's heritage; it is India's natural heritage. Its forests, rhinos, elephants, tigers, wetlands and biodiversity belong to the ecological wealth of the entire nation.
The editorial argues that development cannot mean continuously shrinking forests and wildlife habitats. Environmental protection must be understood as a form of national responsibility. The question is therefore not simply whether Kaziranga will survive, but whether India still possesses the collective will to protect its natural heritage.
Central Message: Hasdeo warned us. Aravalli showed us the power of collective resistance. Kaziranga is now India's test.

Keywords:Kaziranga National Park, Kaziranga Crisis, Assam, Wildlife Conservation, Environmental Protection, Forest Conservation, Hasdeo Forest, Aravalli Range, Biodiversity, One-Horned Rhinoceros, Elephant Habitat, Tiger Conservation, Eco-Sensitive Zone, Sustainable Development, Environmental Activism, Tribal Rights, Indigenous Communities, Forest Rights, Development vs Environment, Climate Change, Natural Heritage, Public Resistance, Environmental Justice, Indian Environment, Conservation Movement, National Responsibility

काजीरंगा बचाओ

हसदेव के जंगलों को बचाने के लिए स्थानीय आदिवासी वर्षों तक संघर्ष करते रहे। उनके साथ कुछ पर्यावरणविद् भी खड़े हुए। उन्होंने जंगल, जमीन, जल और अपनी आने वाली पीढ़ियों के अधिकार की लड़ाई लड़ी। आवाजें उठीं, धरने हुए, अपीलें हुईं, लेकिन देश का बड़ा हिस्सा उस संघर्ष को अपनी लड़ाई नहीं मान सका। अंततः हसदेव का बड़ा भूभाग उस विकास की भेंट चढ़ गया, जिसके सामने जंगल और वहां रहने वाले समुदाय की आवाज कमजोर पड़ गई।

ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी अलग-अलग रूपों में यही कहानी दिखाई देती रही है। कहीं जंगलों पर परियोजनाओं का दबाव बढ़ा, कहीं खनन का, कहीं औद्योगिक विस्तार का। स्थानीय लोग लड़ते रहे और शेष देश प्रायः दर्शक बना रहा।

लेकिन अरावली के मामले में एक फर्क दिखाई दिया। जब अरावली पर संकट गहराया तो उत्तर भारत की आवाज उठी। पर्यावरणविद् सामने आए, नागरिक समाज सक्रिय हुआ और व्यापक जनदबाव बना। अंततः सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना पड़ा।

यह घटना एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ती है—क्या किसी जंगल को बचाने के लिए उसके पक्ष में केवल स्थानीय लोगों का संघर्ष पर्याप्त नहीं है? क्या देश की सामूहिक आवाज के बिना प्रकृति की रक्षा संभव नहीं?

आज यही प्रश्न काजीरंगा के सामने खड़ा है।

काजीरंगा केवल असम का नहीं है

काजीरंगा असम में है, लेकिन काजीरंगा केवल असम का नहीं है। एक सींग वाले गैंडे की विश्व-प्रसिद्ध आबादी, हाथी, बाघ, जंगली भैंसा, दलदली और घासभूमि का पारिस्थितिकी तंत्र तथा ब्रह्मपुत्र की बाढ़ से निर्मित उसका अनूठा प्राकृतिक भूगोल—ये सब भारत की प्राकृतिक विरासत हैं।

जिस तरह हिमालय केवल हिमालयी राज्यों की संपत्ति नहीं, गंगा केवल उन राज्यों की संपत्ति नहीं जिनसे होकर वह गुजरती है और समुद्र केवल तटीय राज्यों का नहीं, उसी तरह काजीरंगा भी पूरे देश की धरोहर है।

फिर काजीरंगा की रक्षा का प्रश्न केवल असम के लोगों के भरोसे क्यों छोड़ा जाए?

आज असम में लोग आवाज उठा रहे हैं। पर्यावरणविद् चेतावनी दे रहे हैं। काजीरंगा के आसपास विकास और संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं। लेकिन देश का बड़ा हिस्सा अभी भी शांत है।

यह शांति नहीं, खतरनाक चुप्पी है

विकास की कीमत कौन चुकाएगा?

देश को विकास चाहिए। सड़क चाहिए, उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए, पर्यटन चाहिए। इसमें कोई विवाद नहीं।

विवाद तब शुरू होता है जब विकास का अर्थ प्रकृति को लगातार पीछे धकेलना बन जाता है।

सवाल यह नहीं कि सड़क बने या नहीं।
सवाल यह है कि सड़क कैसे बने।

सवाल यह नहीं कि पर्यटन बढ़े या नहीं।
सवाल यह है कि पर्यटन किस कीमत पर बढ़े।

सवाल यह नहीं कि असम विकसित हो या नहीं।
सवाल यह है कि क्या असम का विकास उसके जंगल, नदियों, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों को साथ लेकर होगा या उनके ऊपर से गुजर जाएगा?

यदि किसी परियोजना की सफलता के लिए जंगल को कमजोर करना पड़े, वन्यजीवों को बेघर कर दिया जाए और उनके आवागमन के रास्ते बंद कर दिए जाएं, तो हमें परियोजना की उपयोगिता के साथ उसकी पर्यावरणीय कीमत भी गिननी होगी।

क्योंकि जंगल का नुकसान किसी सरकारी बजट में दिखाई नहीं देता। नदी के प्रदूषित होने की कीमत किसी परियोजना रिपोर्ट में पूरी तरह दर्ज नहीं होती। किसी प्रजाति के विलुप्त होने की भरपाई किसी मुआवजे से नहीं हो सकती।

हसदेव से काजीरंगा तक

हसदेव का संघर्ष हमें एक कठोर सबक देता है—केवल स्थानीय लोगों की लड़ाई पर प्रकृति को नहीं छोड़ा जा सकता।

जिन आदिवासियों का जीवन जंगल से जुड़ा है, वे जंगल के लिए सबसे पहले खड़े होते हैं। लेकिन जब उनके सामने विशाल आर्थिक हित, राजनीतिक शक्ति और प्रशासनिक तंत्र खड़ा हो, तब उन्हें पूरे देश के नागरिक समाज की जरूरत होती है।

अरावली ने इसका दूसरा उदाहरण प्रस्तुत किया। जब स्थानीय चिंता राष्ट्रीय चिंता बनी, तब दबाव का स्वरूप बदल गया।

अब काजीरंगा की बारी है।

क्या देश फिर वही गलती दोहराएगा?
क्या हम तब जागेंगे जब काजीरंगा का संकट अपरिवर्तनीय हो जाएगा?
क्या हम तब आवाज उठाएंगे जब जंगल का एक बड़ा हिस्सा विकास की परियोजनाओं में बदल चुका होगा?
या इस बार संकट के पहले ही देश अपनी आवाज उठाएगा?

राष्ट्रवाद का अर्थ केवल सीमा नहीं

यह प्रश्न उन लोगों से भी है जो राष्ट्रवाद की बात करते हैं।

राष्ट्र केवल सीमा, सेना और झंडे से नहीं बनता।
राष्ट्र अपनी नदियों से बनता है।
अपने जंगलों से बनता है।
अपने पहाड़ों से बनता है।
अपने वन्यजीवों से बनता है।
और उन समुदायों से बनता है जिन्होंने पीढ़ियों से इन प्राकृतिक संसाधनों के साथ जीवन बिताया है।

यदि हम गैंडे को केवल पर्यटन का प्रतीक बनाकर देखें, जंगल को केवल लकड़ी या जमीन के रूप में देखें और नदी को केवल परियोजना की संभावित बाधा समझें, तो हमारा राष्ट्रवाद अधूरा है।

प्रकृति की रक्षा भी राष्ट्र-रक्षा है।

और यह कसौटी किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है। कांग्रेस के शासनकाल में भी जंगल बचाने का प्रश्न था। आज भाजपा के शासनकाल में भी है। कल कोई दूसरी सरकार होगी, तब भी यही प्रश्न रहेगा।

इसलिए काजीरंगा को राजनीतिक दलों की बहस से ऊपर उठाकर देखा जाना चाहिए।

जंगल किसी पार्टी का नहीं होता।

इस बार देश को बोलना होगा

Gen-Z को भी बोलना होगा।

हसदेव के समय स्थानीय आदिवासी अकेले पड़ गए। कई दूसरे राज्यों में भी स्थानीय समुदाय अपने-अपने जंगलों के लिए संघर्ष करते रहे।

अरावली ने दिखाया कि व्यापक जनदबाव सरकार के निर्णय को प्रभावित कर सकता है।

अब काजीरंगा हमें पुकार रहा है।

असम के लोग अकेले क्यों लड़ें?
क्यों केवल वही लोग बोलें जिनके घर के पास जंगल है?
क्यों दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, कोलकाता, जयपुर और देश के दूसरे शहरों में बैठे नागरिक इसे असम की समस्या मानें?

काजीरंगा में रहने वाला गैंडा असम की सीमा नहीं जानता।
हाथी किसी प्रशासनिक नक्शे का पालन नहीं करता।
ब्रह्मपुत्र किसी राज्य की विधानसभा से अनुमति लेकर नहीं बहती।

प्रकृति को हमने सीमाओं में बांटा है; प्रकृति स्वयं सीमाहीन है। इसलिए काजीरंगा की रक्षा की आवाज भी सीमाहीन होनी चाहिए।

अब सवाल काजीरंगा का नहीं, हमारी संवेदना का है

आज हमें तय करना है कि हम किस तरह का भारत बनाना चाहते हैं।

ऐसा भारत जिसमें हर जंगल को विकास की अगली परियोजना के लिए संभावित जमीन समझा जाए?

या ऐसा भारत जिसमें विकास और प्रकृति के बीच संतुलन को सभ्यता की अनिवार्य शर्त माना जाए?

हम हसदेव को खोकर भी यदि नहीं सीखते, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। अरावली के संघर्ष से यदि हमने कुछ सीखा है, तो उसका अर्थ यही है कि जनता की व्यापक आवाज सत्ता के निर्णय को बदल सकती है।

काजीरंगा के मामले में भी यही आवाज उठनी चाहिए।

असम को अकेला मत छोड़िए।
काजीरंगा को केवल असम का प्रश्न मत बनाइए।

आज जरूरत है कि पर्यावरणविद् बोलें, लेखक बोलें, वैज्ञानिक बोलें, विद्यार्थी बोलें, किसान बोलें, आदिवासी बोलें, शहरों के नागरिक बोलें और वे सभी लोग बोलें जिन्हें लगता है कि विकास का अर्थ जीवन का विनाश नहीं हो सकता।

हसदेव हमें चेतावनी दे चुका है।
अरावली हमें रास्ता दिखा चुका है।
अब काजीरंगा हमारी परीक्षा है।

इस बार देश चुप रहा तो इतिहास पूछेगा—

जब काजीरंगा पुकार रहा था, तब भारत कहां था?

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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