क्या लोकतंत्र का तंत्र ही लोकतंत्र के खिलाफ हो गया है?

मतदाता सूची से SIR तक और निर्वाचन संस्थाओं की जवाबदेही तक—सवाल केवल चुनावी प्रक्रिया के नहीं, लोकतंत्र में नागरिक के भरोसे के हैं।
Editorial Analysis
Published: September 25, 2026 | Editor in Chief
Has the Very Machinery of Democracy Turned Against Democracy?

Abstract: Democracy does not necessarily weaken through a coup or the suspension of elections. It can also erode gradually when the institutions and procedures designed to sustain it begin to raise questions about citizens’ rights, electoral transparency and public trust. The ongoing debate over the Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls has brought issues of voter eligibility, verification, deletion and due process into sharper focus. This editorial examines the distinction between voter registration and citizenship determination and argues that any large-scale revision of electoral rolls must be based on clear legal procedures, transparency and effective opportunities for citizens to raise objections.

The editorial also examines the wider question of electoral credibility. An election result that differs from pre-election assessments is not, by itself, evidence of malpractice. However, allegations supported by data or documentary evidence merit transparent and impartial examination. Similarly, reported objections or disagreements by former Election Commissioners regarding the functioning of the Election Commission raise questions of institutional accountability that require appropriate scrutiny and clarification.

The central concern is not which political party gains or loses from an electoral process, but whether citizens can continue to trust the institutions responsible for maintaining electoral rolls and conducting elections. Elections are essential to democracy, but democracy also depends on transparency, institutional accountability, independent scrutiny, the right to question and public confidence in the electoral process. The fundamental question, therefore, is whether the machinery created to protect democracy can itself become a source of democratic distrust.

Keywords: Indian democracy, democratic institutions, electoral rolls, SIR, Special Intensive Revision, Election Commission of India, voter list, voter verification, electoral transparency, electoral trust, electoral accountability, voter rights, citizenship and voting rights, election process, constitutional institutions, institutional accountability, India elections

मतदाता सूची, SIR, चुनावी पारदर्शिता और निर्वाचन संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़े सवाल केवल राजनीति के नहीं, लोकतंत्र में नागरिक के भरोसे के सवाल हैं। असली प्रश्न यह है कि कहीं लोकतंत्र का अपना तंत्र ही उसके विरुद्ध तो काम नहीं करने लगा है?

लोकतंत्र हमेशा किसी तख्तापलट से नहीं मरता। कभी-कभी उसकी संस्थाएँ बनी रहती हैं, चुनाव होते रहते हैं, सरकारें बनती रहती हैं और संविधान भी अपनी जगह रहता है—लेकिन लोकतांत्रिक भरोसा भीतर से क्षीण होता जाता है। लोकतंत्र की प्रक्रियाएँ चलती रहें और उन्हीं प्रक्रियाओं के भीतर ऐसे सवाल पैदा होने लगें जिनका संतोषजनक उत्तर न मिले, तो समस्या केवल किसी एक चुनाव की नहीं रह जाती। सवाल व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है।

2003 के बाद लगातार अनेक चुनाव हुए। उन्हीं मतदाता सूचियों के आधार पर मतदाता वोट देते रहे और सरकारें बनती रहीं। फिर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नामों के सत्यापन, हटाए जाने और उनकी पात्रता को लेकर गंभीर सवाल सामने आए।

यहीं लोकतंत्र का सबसे असहज प्रश्न खड़ा होता है—यदि ये लोग वर्षों तक वैध मतदाता थे, तो अचानक उनकी वैधता पर इतना बड़ा प्रश्न कैसे खड़ा हो गया? और यदि वे पहले से ही अयोग्य थे, तो उन्हीं के मतों से बनी सरकारों के जनादेश पर सवाल क्यों नहीं उठा?

यह केवल मतदाता सूची का तकनीकी प्रश्न नहीं है। यह नागरिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच विश्वास का प्रश्न है। मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी राजनीतिक पहचान किसी पारदर्शी और स्पष्ट प्रक्रिया से निर्धारित होती है और उसके मताधिकार पर सवाल उठे तो उसे अपनी बात रखने का प्रभावी अवसर मिलेगा।

यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि मतदाता सूची में नाम होना और नागरिकता का निर्धारण एक ही कानूनी प्रक्रिया नहीं है। इसलिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नागरिकता के प्रश्न के बीच यदि कोई व्यावहारिक या प्रक्रियात्मक संबंध दिखाई देता है, तो उसकी संवैधानिक सीमा और कानूनी आधार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी बड़े प्रशासनिक अभ्यास का आधार केवल आदेश नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया और नागरिक को उपलब्ध प्रभावी आपत्ति-निवारण होना चाहिए।

चुनाव परिणामों का पूर्व चुनावी आकलनों से अलग होना अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। जनता का निर्णय किसी भी सर्वेक्षण या राजनीतिक अनुमान से अलग हो सकता है। लेकिन जब चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर आरोप आँकड़ों और दस्तावेजों के साथ लगाए जाएँ, तब उनका परीक्षण होना चाहिए। परिणाम आ जाना प्रक्रिया पर सवालों का अंत नहीं है।

लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इसलिए असाधारण महत्व रखती है। आयोग केवल चुनाव कराने वाली संस्था नहीं है; वह मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया के प्रति सार्वजनिक विश्वास का प्रमुख आधार है। इसलिए आयोग के निर्णयों पर उठने वाले गंभीर प्रश्नों का उत्तर पारदर्शिता से मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है।

सितंबर 2026 में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने पूर्व चुनाव आयुक्तों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज को लेकर व्यक्त की गयी आपत्तियों को फिर सार्वजनिक विमर्श में ला दिया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और उनके कानूनी पक्ष का परीक्षण अलग विषय है। लेकिन यदि किसी संवैधानिक संस्था के भीतर से ही उसके कामकाज को लेकर गंभीर असहमति सामने आती है, तो उसे महज राजनीतिक बयान कहकर खारिज कर देना भी पर्याप्त उत्तर नहीं हो सकता।

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना विपक्ष का विशेषाधिकार ही नहीं, नागरिक का अधिकार भी है। संस्थाएँ सवालों से कमजोर नहीं होतीं; सवालों का जवाब न मिलने से उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े होते हैं।

आज समस्या केवल यह नहीं है कि किस दल को कितने वोट मिले। बड़ी समस्या यह है कि क्या नागरिक को अपनी मतदाता पहचान, अपने वोट और चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा है?

यदि मतदाता सूची में नाम हटता है तो नागरिक को कारण पता होना चाहिए। यदि पात्रता पर सवाल है तो उसे निष्पक्ष अवसर मिलना चाहिए। यदि चुनाव प्रक्रिया पर आरोप है तो स्वतंत्र परीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। और यदि संवैधानिक संस्था के भीतर से ही असहमति सामने आती है तो उसका जवाब संस्थागत पारदर्शिता से मिलना चाहिए।

लोकतंत्र में चुनाव जरूरी हैं, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है। मतदाता सूची, स्वतंत्र चुनाव आयोग, निष्पक्ष मतदान, पारदर्शी मतगणना, न्यायिक समीक्षा, स्वतंत्र मीडिया और विपक्ष की सवाल पूछने की स्वतंत्रता—ये सभी लोकतंत्र के अलग-अलग स्तंभ हैं। इन स्तंभों में से किसी एक की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठें तो उसका समाधान सवालों को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें स्पष्ट रूप से संबोधित करने में है।

लोकतंत्र का क्षरण अक्सर तब शुरू होता है जब असहमति को असुविधा समझ लिया जाता है और सवालों को जवाब देने के बजाय उन्हें शोर मान लिया जाता है। लोकतांत्रिक तंत्र की ताकत इस बात में नहीं कि वह सवालों से मुक्त हो, बल्कि इस बात में है कि वह सवालों का उत्तर देने की क्षमता और इच्छा रखता हो।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल किसी सरकार या विपक्ष से भी बड़ा है—

क्या हम ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहते हैं जिसमें चुनाव तो होते रहें, लेकिन चुनाव कराने वाली संस्थाओं पर उठे गंभीर सवालों का उत्तर न मिले?

क्योंकि लोकतंत्र केवल इस बात से जीवित नहीं रहता कि चुनाव समय पर हो गया। वह तब जीवित रहता है जब नागरिक को विश्वास हो कि उसका नाम मतदाता सूची में क्यों है, क्यों नहीं है; उसका वोट सुरक्षित है; उसका मत गिना गया है; और जिस संस्था को चुनाव की निगरानी सौंपी गयी है, वह सार्वजनिक प्रश्नों का उत्तर देने के लिए भी जवाबदेह है।

यहीं मूल प्रश्न लौटकर सामने आता है—क्या लोकतंत्र का अपना तंत्र ही उसके खिलाफ हो गया है?

यदि लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए नागरिक के अधिकारों और विश्वास को कमजोर करने लगें, यदि सवालों का उत्तर देने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही संदिग्ध मान लिया जाए, और यदि चुनावी प्रक्रिया पर उठे गंभीर प्रश्नों का समाधान पारदर्शिता के बजाय मौन में खोजा जाए, तो लोकतंत्र की बाहरी संरचना भले कायम रहे, उसकी लोकतांत्रिक आत्मा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

लोकतंत्र को खत्म करने के लिए लोकतंत्र के बाहर से किसी शक्ति का आना जरूरी नहीं। खतरा तब भी पैदा हो सकता है जब लोकतंत्र का अपना तंत्र ही नागरिक के विश्वास से दूर होने लगे।

इसलिए असली कसौटी केवल यह नहीं कि चुनाव हुआ या नहीं। असली कसौटी यह है कि क्या चुनावी तंत्र नागरिक को भरोसा देता है, सवालों का जवाब देता है और अपनी शक्ति के प्रयोग के लिए स्वयं भी जवाबदेह रहता है?

क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल लोकतंत्र-विरोधियों से नहीं करनी होती; कभी-कभी लोकतंत्र को उसके अपने तंत्र की जवाबदेही के लिए भी सजग रहना पड़ता है।

  • 🗳️ SIR और मतदाता सूची: संबंधित आधिकारिक जानकारी के लिए भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट देखी जा सकती है।
  • ⚖️ न्यायिक मामले: चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुकदमों और फैसलों के लिए भारत का सर्वोच्च न्यायालय आधिकारिक स्रोत है।
  • 📰 मीडिया रिपोर्ट: सितंबर 2026 में प्रकाशित संबंधित समाचारों के लिए The Indian Express – India देखें।
  • 📜 संवैधानिक प्रावधान: विस्तृत कानूनी संदर्भ के लिए भारत का संविधान देखा जा सकता है।
  • Dr. R. Achal Pulastey

    Dr. R. Achal Pulastey

    Editor-in-Chief, Eastern Scientist

    A multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, geopolitical dynamics, and Ayurveda.

    ORCID iD ORCID: 0009-0002-8240-2689

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