The growing opposition to the proposed 11,200 MW Siang Upper Multipurpose Project in Arunachal Pradesh raises fundamental questions about development, national security and indigenous rights. The Adi community's resistance highlights the cultural, ecological and social consequences of large dams in the fragile Himalayan region. The debate also extends downstream to Assam and the Brahmaputra basin, demanding a more democratic and environmentally responsible approach to development.
Keywords: Siang River Movement, Siang Dam Project, Siang Upper Multipurpose Project, Adi indigenous community, environmental crisis in Arunachal Pradesh, future of the Brahmaputra River, displacement of indigenous people, development versus environment, Himalayan ecology
अरुणाचल प्रदेश की राजधानी दिल्ली स्थित अरुणाचल भवन के बाहर गूंजती एक आवाज आज पूरे देश के लिए आत्ममंथन का विषय है—"तुमने तो अपनी नदी गंगा को माँ कहकर गंदा कर दिया, सियांग हमारी नदी है, उसे खराब क्यों कर रहे हो?" यह सवाल केवल एक नदी या बांध परियोजना को लेकर नहीं है। यह उस विकासवादी मानसिकता से सीधा सवाल है, जिसने प्रकृति को संसाधन, नदियों को बिजली उत्पादन का माध्यम और जंगलों को औद्योगिक विस्तार की जमीन मान लिया है।
अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग और आसपास के क्षेत्रों में आदि आदिवासी समुदाय द्वारा 11,200 मेगावाट की प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (SUMP) के खिलाफ जारी आंदोलन ने विकास की मौजूदा अवधारणा के सामने एक बुनियादी प्रश्न खड़ा कर दिया है। क्या विकास का अर्थ केवल बिजली उत्पादन, बड़े बांध और आर्थिक निवेश है? क्या किसी क्षेत्र की जनता की इच्छा, उसकी सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के साथ उसका सदियों पुराना संबंध विकास की योजनाओं से कम महत्वपूर्ण है?
नदी केवल जल संसाधन नहीं, सभ्यता का आधार है
आदि समुदाय के लिए सियांग महज एक नदी नहीं है। वह उनकी सांस्कृतिक स्मृति, पूर्वजों की विरासत, लोककथाओं और जीवन-पद्धति का हिस्सा है। उनके लिए नदी का अस्तित्व उनकी सामूहिक पहचान से जुड़ा है। इसलिए सियांग को बांधने का विरोध केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता और जीवन के अधिकार की रक्षा का प्रश्न भी है।
यही वह अंतर है जिसे आधुनिक विकास की नीतियां समझने में अक्सर विफल रहती हैं। एक ओर सरकार नदी में उपलब्ध जल की मात्रा, उससे पैदा होने वाली बिजली और परियोजना के आर्थिक लाभ का हिसाब लगाती है, दूसरी ओर स्थानीय समाज उस नदी में अपना अतीत, वर्तमान और भविष्य देखता है।
स्थानीय संगठनों के अनुसार प्रस्तावित जलाशय से लगभग 27 गांव पूरी तरह डूब सकते हैं, जबकि 40 से 50 अन्य गांव प्रभावित हो सकते हैं। कृषि भूमि, जंगल, पारंपरिक आजीविका और पीढ़ियों से आबाद बस्तियों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है। यह केवल घरों के उजड़ने का मामला नहीं है। किसी समुदाय को उसकी जमीन से विस्थापित करना उसकी सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक स्मृति और सामुदायिक जीवन को भी प्रभावित करता हैता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम स्थानीय अस्तित्व
इस परियोजना के पक्ष में सरकार का सबसे बड़ा तर्क राष्ट्रीय सुरक्षा है। चीन तिब्बत में यारलुंग सांगपो नदी पर विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित कर रहा है। भारत की आशंका है कि ऊपरी प्रवाह पर चीन के नियंत्रण से भविष्य में जल प्रबंधन और नदी के प्रवाह को लेकर सामरिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इसी संदर्भ में सियांग पर बड़े जलाशय की परिकल्पना की गई है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। क्या एक देश की सामरिक सुरक्षा दूसरे देश के भीतर रहने वाले नागरिकों की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय सुरक्षा की कीमत पर सुनिश्चित की जानी चाहिए?
राष्ट्रीय सुरक्षा निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके नाम पर स्थानीय समुदायों की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार का कहना है कि फिलहाल परियोजना पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन के चरण में है और अंतिम निर्माण का निर्णय नहीं हुआ है। फिर भी जब स्थानीय लोगों की जमीन पर सर्वेक्षण और ड्रिलिंग की गतिविधियां शुरू होती हैं, तो उनके लिए यह भविष्य में होने वाले विस्थापन की आशंका से जुड़ जाती हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी परियोजना का तकनीकी रूप से संभव होना ही उसे सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं बना देता। प्रभावित लोगों को पूरी जानकारी देना, उनके साथ वास्तविक संवाद करना और उनकी स्वतंत्र सहमति को महत्व देना आवश्यक है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब स्थानीय समुदाय इस विकास मॉडल को स्वीकार नहीं कर रहे, तब उनकी असहमति को दूर करने के बजाय सुरक्षा बलों और प्रशासनिक दबाव के जरिए परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश क्यों की जा रही है?
सियांग से ब्रह्मपुत्र तक: संकट का व्यापक भूगोल
इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू असम और ब्रह्मपुत्र नदी का भविष्य भी है। तिब्बत में यारलुंग सांगपो के नाम से बहने वाली नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है। आगे असम में दिहांग और लोहित जैसी नदियों के साथ मिलकर यह ब्रह्मपुत्र का विशाल प्रवाह बनाती है।
इसलिए सियांग पर किसी विशाल जलाशय या बांध का प्रभाव केवल अरुणाचल तक सीमित नहीं माना जा सकता। नदी के प्राकृतिक प्रवाह, गाद के परिवहन, मत्स्य जीवन, बाढ़ के स्वरूप और नदी से जुड़े पारिस्थितिक तंत्र में होने वाले बदलावों का असर नीचे के क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। असम के लिए भी यह गंभीर पर्यावरणीय और आजीविका संबंधी प्रश्न है।
एक तरफ भारत चीन की ऊपरी जलधारा पर बनने वाली परियोजनाओं के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त करता है, दूसरी तरफ भारत के भीतर भी नदी के प्राकृतिक प्रवाह और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा को लेकर वैसी ही गंभीरता अपेक्षित है। नदी पर नियंत्रण की सामरिक प्रतिस्पर्धा कहीं उसे साझा प्राकृतिक विरासत के बजाय दो देशों की शक्ति-प्रतिस्पर्धा का माध्यम न बना दे।
हिमालय की संवेदनशीलता और विकास का जोखिम
हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक और पारिस्थितिक संवेदनशीलता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह क्षेत्र भूकंपीय गतिविधियों, भूस्खलन और भूगर्भीय अस्थिरता के लिहाज से संवेदनशील है। इतने बड़े बांध और जलाशय के निर्माण से पहले भूगर्भीय संरचना, भूकंपीय जोखिम, नदी के प्राकृतिक प्रवाह और जैव-विविधता पर संभावित प्रभावों का स्वतंत्र तथा व्यापक अध्ययन आवश्यक है।
विकास परियोजनाओं के मूल्यांकन में अक्सर बिजली उत्पादन और आर्थिक लाभ के आंकड़े प्रमुखता से प्रस्तुत किए जाते हैं, लेकिन पर्यावरणीय क्षति, विस्थापन, आजीविका के नुकसान और सांस्कृतिक विघटन की वास्तविक कीमत का आकलन उतनी गंभीरता से नहीं होता।
बड़े बांधों के लाभ का हिसाब लगाने वालों को यह भी बताना चाहिए कि उनकी कीमत कौन चुकाएगा। बिजली का लाभ दूर-दराज के शहरों और औद्योगिक केंद्रों को मिल सकता है, लेकिन जलमग्न होने वाली जमीन, उजड़ने वाले गांव और खोती हुई सांस्कृतिक विरासत स्थानीय लोगों की होगी।
उत्तर भारत की पर्यावरणीय चेतना पर सवाल
सियांग आंदोलन का एक दूसरा पक्ष भी है, जो उत्तर भारत के समाज और उसकी पर्यावरणीय चेतना को कठघरे में खड़ा करता है।
हमने गंगा और यमुना को शास्त्रों में मां और लोकमाता का दर्जा दिया, लेकिन उनके प्रति व्यवहार कैसा रखा? धार्मिक आस्था के बावजूद हमने नदियों को सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और कचरे से प्रदूषित होने दिया। धार्मिक आयोजनों के नाम पर नदियों के किनारों पर प्लास्टिक और कचरे के ढेर लगते हैं। विकास और शहरीकरण के नाम पर पेड़ काटे जाते हैं, जलस्रोत पाटे जाते हैं और कंक्रीट के विस्तार को आधुनिकता का प्रतीक मान लिया जाता है।
इस पृष्ठभूमि में सियांग के लिए उठ रही आदिवासी आवाज हमें एक असुविधाजनक प्रश्न से सामना कराती है। क्या प्रकृति के साथ हमारा संबंध केवल धार्मिक प्रतीकों और नारों तक सीमित रह गया है? क्या किसी नदी को मां कहना पर्याप्त है, यदि हम उसके प्राकृतिक अस्तित्व की रक्षा करने को तैयार नहीं हैं?
यह कहना उचित नहीं होगा कि उत्तर भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई आंदोलन या संघर्ष नहीं होता। लेकिन यह जरूर विचारणीय है कि पर्यावरणीय प्रश्नों पर व्यापक सामाजिक और युवा भागीदारी कितनी मजबूत है। इसके मुकाबले सियांग घाटी के आदिवासी समुदाय अपनी जमीन, भाषा, परंपरा और नदी के लिए जिस सामूहिकता के साथ आवाज उठा रहे हैं, वह प्रकृति के साथ उनके जीवंत संबंध को सामने लाती है।
यहां आदिवासी समाज को पिछड़ेपन के किसी पुराने पैमाने से देखने के बजाय उससे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की चेतना सीखने की आवश्यकता है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों और प्राकृतिक विरासत से कट जाना नहीं हो सकता।
विकास का अधिकार या विकास थोपने का अधिकार?
सियांग का आंदोलन अंततः विकास की परिभाषा और लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रश्न है। किसी भी क्षेत्र के लोगों को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वे किस प्रकार का विकास चाहते हैं और उसकी कितनी कीमत चुकाने को तैयार हैं। विकास जनता के जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम होना चाहिए, न कि जनता के जीवन और संस्कृति को बदल देने का सरकारी कार्यक्रम।
पासीघाट में हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और पुलिसकर्मियों के घायल होने की घटनाएं भी सामने आई हैं। किसी भी आंदोलन में हिंसा और तोड़फोड़ को स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इन घटनाओं को आधार बनाकर पूरे जन-असंतोष को कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना भी उचित नहीं होगा। गिरफ्तारियों, सुरक्षा बलों की तैनाती और प्रशासनिक दबाव से असहमति को दबाने के बजाय उसके मूल कारणों को समझना जरूरी है।
सरकार को चाहिए कि वह परियोजना से प्रभावित समुदायों के साथ पारदर्शी संवाद करे, स्वतंत्र पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव आकलन कराए तथा वैकल्पिक ऊर्जा और जल प्रबंधन के उपायों पर भी विचार करे। जब तक स्थानीय लोगों की आशंकाओं का समाधान नहीं होता, तब तक परियोजना संबंधी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की जल्दबाजी अविश्वास को और गहरा करेगी।
सियांग की आवाज केवल अरुणाचल की आवाज नहीं है। वह पूरे देश से पूछ रही है कि आखिर विकास किसके लिए और किसकी कीमत पर हो रहा है? जिस विकास में नदी का अस्तित्व, मनुष्य की संस्कृति और प्रकृति का संतुलन सुरक्षित न रह सके, उसकी सफलता के दावों पर पुनर्विचार आवश्यक है। नदियां केवल बिजली पैदा करने के लिए नहीं बहतीं; वे सभ्यताओं को जीवन देती हैं।
Dr. R. Achal Pulastey
A multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, geopolitical dynamics, and Ayurveda.
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