खत्म होता डर, भंग होता सम्मोहन और दमन पर भरोसा

जब रोजगार, शिक्षा और भविष्य के सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं, तो भय की राजनीति की सीमाएँ सामने आने लगती हैं। क्या नई पीढ़ी का असंतोष राजनीतिक सम्मोहन को तोड़कर लोकतांत्रिक प्रतिरोध का नया अध्याय लिखेगा?
Public Discourse
Published: October 10, 2026 | Author: डॉ. चतुरानन ओझा

The End of Fear, the Breaking of Political Illusion, and the Politics of Repression

India’s changing political landscape raises important questions about youth aspirations, unemployment, democratic accountability, religious polarization, and the limits of political repression. This Eastern Scientist editorial examines how growing public awareness, economic anxieties, and the courage to question authority may challenge established political narratives and reshape democratic resistance.

अभी महज दो वर्ष पहले तक विपक्ष के पास इतनी राजनीतिक शक्ति और आत्मविश्वास नहीं दिखाई देता था कि वह देशव्यापी जनांदोलन खड़ा कर सके। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध से लेकर किसान आंदोलन तक, जनता सड़कों पर उतरती रही। दूसरी ओर, जंगल, पहाड़, बंदरगाह, हवाई अड्डे और दूसरी सार्वजनिक परिसंपत्तियाँ निजी हाथों में सौंपी जाती रहीं। स्थायी रोजगार, उचित वेतन, सुरक्षित नौकरियों और छोटे कारोबारियों के लिए अवसरों पर दबाव बढ़ता रहा। लेकिन इन सवालों पर व्यापक राजनीतिक प्रतिरोध खड़ा करने का साहस विपक्ष में दिखाई नहीं दिया।

इस राजनीतिक निष्क्रियता के पीछे केवल विपक्ष की कमजोरी नहीं थी। इसके पीछे जनता के एक बड़े हिस्से का वह वैचारिक सम्मोहन भी था, जिसमें महँगाई, बेरोजगारी, नोटबंदी और लॉकडाउन से उपजी तकलीफों के बावजूद धार्मिक पहचान राजनीतिक और आर्थिक सवालों पर भारी पड़ती दिखाई देती थी।

लॉकडाउन के दौरान हजारों किलोमीटर पैदल चलने को विवश मजदूरों की तस्वीरें आज भी भारतीय लोकतंत्र के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा करती हैं। जिन लोगों ने अपने परिवारों के साथ भूख, बेबसी और असुरक्षा झेली, वे व्यापक राजनीतिक विद्रोह में क्यों नहीं बदल सके? राहत के रूप में मिले कुछ किलो अनाज ने तत्काल भूख को भले ही कुछ समय के लिए शांत किया हो, लेकिन क्या उसने उस व्यवस्था के प्रति उठने वाले सवालों को भी दबा दिया? इसी बीच श्रम कानूनों में बदलाव हुए, कामगारों की सुरक्षा और काम के घंटों को लेकर चिंताएँ बढ़ीं, शिक्षा की लागत पर सवाल उठे और संवैधानिक संस्थाओं तथा संविधान के भविष्य को लेकर बहस तेज होती रही। लेकिन राजनीतिक परिदृश्य में एक लंबी खामोशी बनी रही। यह खामोशी सहमति का प्रमाण नहीं थी; संभव है, इसके भीतर असंतोष लगातार जमा हो रहा था।

2024 के आम चुनाव ने पहली बार इस राजनीतिक तस्वीर में एक स्पष्ट दरार दिखाई। सत्तारूढ़ दल को अपने दम पर पहले जैसा बहुमत नहीं मिला और सरकार को गठबंधन के सहारे आगे बढ़ना पड़ा। यह परिणाम इस बात का संकेत था कि मतदाता के भीतर सवाल जीवित हैं। हालांकि, सत्ता परिवर्तन की संभावना समाप्त नहीं हुई थी; सरकार फिर भी सत्ता में बनी रही। इस प्रकार, जनादेश ने सत्ता को चुनौती तो दी, लेकिन राजनीतिक संघर्ष का अंत नहीं किया।

इसके बाद भी आर्थिक दबाव, रुपये की विनिमय दर, ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर सवाल बने रहे। इन परिस्थितियों में जनता का हर बार चुप दिखाई देना यह साबित नहीं करता कि उसने सब कुछ स्वीकार कर लिया है। लोकतंत्र में असंतोष हमेशा तत्काल आंदोलन के रूप में सामने नहीं आता। कभी वह मतदान में व्यक्त होता है, कभी सामाजिक संवाद में और कभी ऐसी पीढ़ी के रूप में उभरता है, जो पुराने राजनीतिक तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर देती है।

2026 : एक नई पीढ़ी, नए सवाल

समय के साथ पीढ़ियाँ बदलती हैं। 2010 से 2014 के बीच आठ से दस वर्ष की उम्र वाले बच्चे अब लगभग बीस से छब्बीस वर्ष की उम्र के युवा हो चुके हैं। यह वही पीढ़ी है, जिसने बचपन से सोशल मीडिया, डिजिटल संचार और बदलती दुनिया को देखा है। उसके सामने शिक्षा, रोजगार, सम्मान और भविष्य की अपनी आकांक्षाएँ हैं।

उसके लिए केवल अतीत का गौरव पर्याप्त नहीं है। उसे वर्तमान में अवसर चाहिए और भविष्य के प्रति भरोसा चाहिए।

जब डिग्रियों के बावजूद रोजगार नहीं मिलता, मेहनत के बावजूद जीवन असुरक्षित बना रहता है और सार्वजनिक विमर्श में वास्तविक सवालों के जवाब के स्थान पर आरोप, उपहास या धमकियाँ सुनाई देती हैं, तब असंतोष एक नया रूप लेने लगता है। युवा पूछते हैं—यदि सब कुछ ठीक है, तो हमारा भविष्य इतना अनिश्चित क्यों है? यदि व्यवस्था इतनी सफल है, तो रोजगार, शिक्षा और जीवन की बुनियादी सुरक्षा को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है?

और जब सवालों के जवाब में तर्क के बजाय अहंकार दिखाई देता है, तो सत्ता की विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है। जिस भय के सहारे राजनीतिक प्रभुत्व कायम रखा जाता है, वही भय धीरे-धीरे आक्रोश में बदल सकता है।

यहीं से विपक्ष को भी नया साहस मिलता है। जनता के भीतर उठते सवाल राजनीतिक दलों को अपनी भूमिका निभाने का अवसर देते हैं। आंदोलन केवल किसी एक दल की रणनीति से पैदा नहीं होते; कई बार समाज में जमा असंतोष राजनीतिक नेतृत्व को भी उसकी निष्क्रियता से बाहर निकलने के लिए बाध्य करता है।

सम्मोहन टूटने के बाद

राजनीति में धार्मिक आस्था, जातीय पहचान और सामाजिक विभाजन का प्रभाव वास्तविक है। लेकिन यह प्रभाव स्थायी और असीमित नहीं होता। जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताएँ संकट में पड़ती हैं, तब पहचान की राजनीति और आर्थिक यथार्थ के बीच टकराव पैदा हो सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि नई पीढ़ी पूरी तरह धर्म, जाति या लिंग के भेद से मुक्त हो चुकी है। भारतीय समाज की जटिलताएँ इतनी सरल नहीं हैं। लेकिन यह जरूर संभव है कि युवा पीढ़ी का एक हिस्सा इन पहचानों से ऊपर उठकर रोजगार, शिक्षा, समानता, स्वतंत्रता और सम्मान को साझा राजनीतिक मुद्दा बनाने लगे।

लड़कियों और महिलाओं की भागीदारी इस बदलाव का विशेष संकेत हो सकती है। यदि वे अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरती हैं, दमन का सामना करने को तैयार होती हैं और सार्वजनिक जीवन में बराबरी का दावा करती हैं, तो यह केवल किसी आंदोलन की ताकत नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना में बदलाव का भी संकेत है।

फिर भी, किसी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को भारतीय इतिहास में पहली घटना कहना उचित नहीं होगा। भारत का इतिहास महिलाओं के संघर्षों और आंदोलनों के अनेक उदाहरणों से भरा है। आज का महत्त्व इस बात में है कि नई पीढ़ी किस तरह अपने समय के प्रश्नों के साथ इन संघर्षों को जोड़ती है।

दमन : सत्ता का अंतिम भरोसा?

जब सत्ता को लगता है कि तर्क और उपलब्धियाँ जनता का भरोसा जीतने में पर्याप्त नहीं हैं, तब वह कभी-कभी कठोरता, धमकी और दमन पर अधिक निर्भर होने लगती है। लेकिन दमन का प्रभाव हमेशा एक जैसा नहीं होता। भयभीत समाज चुप रह सकता है; अपमानित समाज भीतर ही भीतर प्रतिरोध की तैयारी भी कर सकता है।

इतिहास बताता है कि किसी व्यवस्था की स्थिरता केवल उसकी संस्थागत शक्ति पर निर्भर नहीं करती। वह इस बात पर भी निर्भर करती है कि नागरिक उस व्यवस्था को कितना न्यायपूर्ण, विश्वसनीय और अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी मानते हैं।

यदि सत्ता जनता के सवालों को चुनौती मानने लगे, आलोचना को शत्रुता समझने लगे और असहमति को दबाने योग्य अपराध मानने लगे, तो वह अपने ही लोकतांत्रिक आधार को कमजोर करती है। भय कुछ समय तक विरोध को रोक सकता है, लेकिन वह विश्वास पैदा नहीं कर सकता।

आज भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन-सा राजनीतिक दल सत्ता में रहेगा। असली प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र नागरिकों को सवाल पूछने, असहमति व्यक्त करने और अपने भविष्य की माँग करने का पर्याप्त अवसर देगा?

क्योंकि जब नागरिकों को लगता है कि खोने के लिए अब बहुत कम बचा है, तब भय की शक्ति घटने लगती है। लेकिन इस क्षण का वास्तविक महत्त्व तभी है, जब निराशा संगठित, अहिंसक और लोकतांत्रिक प्रतिरोध में बदले। सम्मोहन का टूटना अपने आप में परिवर्तन नहीं है। सवालों का उठना भी अपने आप में विजय नहीं है। परिवर्तन तब होता है, जब जागरूक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग होते हैं, सत्ता को जवाबदेह बनाते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं। आज की राजनीतिक परिस्थिति को इसी कसौटी पर परखना होगा।

डर का खत्म होना सत्ता के अंत की घोषणा नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के जागने की शुरुआत है। और जब नागरिक चेतना जागती है, तब सत्ता को पहली बार यह एहसास होता है कि जनता केवल शासित होने के लिए नहीं, बल्कि सवाल पूछने और जवाब माँगने के लिए भी है।

Cite as:
Ojha, C. (2026). Centralization vs. Autonomy: The Yakṣa Question of Higher Education Reform in India. Eastern Scientist, II(34). Available at: https://www.easternscientist.in/2026/06/blog-post_03.html

Dr. Chaturanand Ojha

डॉ. चतुरानन ओझा

सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, लेखक, विचारक, सह-संयोजक — समान शिक्षा अधिकार मंच, उत्तर प्रदेश यूनिट

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