विकास की कसौटी: बुनियादी ढाँचा या जीवन स्तर?

सड़क, उद्योग और बड़े निर्माण विकास के साधन हो सकते हैं, लेकिन विकास की असली कसौटी स्थानीय लोगों का बेहतर जीवन, स्वास्थ्य, आजीविका और सुरक्षित पर्यावरण है।
Editorial Analysis
Published: October 01, 2026 | Editor in Chief
What Should Be the Real Measure of Development?

Abstract: Development is often measured by roads, electricity, transport networks, large industries and massive construction projects. But are these really the ultimate indicators of development? This editorial questions whether the benefits of such projects actually reach the people who have lived in these regions for generations.
In many tribal and forest regions, mining, industrial projects and large infrastructure have placed growing pressure on land, forests, water resources and traditional livelihoods. Roads and industries may transform the physical landscape, but the crucial question remains: has the quality of life of local communities improved in the same proportion?
A single model of development cannot be applied uniformly across India's diverse geographical, ecological and social regions. In remote tribal and mountainous areas, primary healthcare, quality education, clean drinking water and sustainable local livelihoods may be more important than large industrial projects. Similarly, in fragile mountain ecosystems, unrestricted construction and tourism can exceed the natural carrying capacity of the region.
The editorial argues that roads, bridges, electricity and industries are means of development, not development itself. The real measure of progress should be the improvement in people's health, education, livelihood, dignity, autonomy and environmental security.
The fundamental question is therefore not simply how much has been built, but for whom and at what cost?

Keywords: Development Model, Sustainable Development, Quality of Life, Infrastructure Development, Tribal Development, Displacement, Environmental Protection, Tribal Rights, Mining and Development, Sustainable Infrastructure, Rural Development, Mountain Ecology, Uncontrolled Tourism, India Development Model, Eastern Scientist

बायें विकास के पूर्व दायें विकास के बाद
सड़क, बिजली, परिवहन और बड़े उद्योगों की स्थापना को सामान्यतः विकास का अकाट्य प्रतीक मान लिया गया है। जनसामान्य भी अक्सर इसी प्रचारित परिभाषा को विकास का पर्याय स्वीकार कर लेता है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि ‘विकास’ के नाम पर बनाई जा रही इन सड़कों, बिछाई जा रही बिजली की लाइनों और स्थापित किए जा रहे विशाल उद्योगों का वास्तविक लाभ उस क्षेत्र में पीढ़ियों से निवास कर रहे लोगों को किस रूप में मिलता है? यह मौलिक सवाल विकास के मुख्यधारा के विमर्श में अक्सर दब जाता है।

वास्तविकता यह है कि अनेक बड़ी विकास परियोजनाओं की सबसे भारी कीमत उन्हीं लोगों को चुकानी पड़ती है, जो अपनी जमीन, जंगल और आजीविका से विस्थापित होते हैं। यदि पक्की सड़कें, बड़े उद्योग और विशाल बुनियादी ढाँचे ही समृद्धि के वास्तविक मानक होते, तो राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे बसे अनेक गाँव आज भी गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझते क्यों दिखाई देते?

भारत में विकास का यह विस्थापन-आधारित मॉडल विशेष रूप से आदिवासी और वनांचल क्षेत्रों में दिखाई देता है। मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के अनेक क्षेत्रों में खनन, बड़े उद्योगों और भारी निर्माण के लिए जंगलों और पहाड़ों का बड़े पैमाने पर दोहन हुआ है। सड़कें बनीं, खदानें खुलीं और औद्योगिक परियोजनाएँ स्थापित हुईं; लेकिन सवाल यह है कि क्या स्थानीय समुदायों का जीवन उसी अनुपात में बेहतर हुआ?

विडंबना यह है कि जिन समुदायों को ‘पिछड़ा’ कहकर आधुनिक विकास का लाभ पहुँचाने का दावा किया गया, उनमें से अनेक समुदाय उस समय अपनी प्राकृतिक संपदा के साथ कहीं अधिक आत्मनिर्भर थे, जब आधुनिक विकास की परियोजनाएँ वहाँ नहीं पहुँची थीं। उनके पास जंगल था, जमीन थी, जलस्रोत थे और अपनी आजीविका तथा सामाजिक जीवन पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण था। विकास के नाम पर जब यही आधार उनसे छिन गया, तो बदले में मिला रोजगार और पुनर्वास हर बार उस क्षति की भरपाई नहीं कर सका। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध ये क्षेत्र विकास की दौड़ में भौतिक रूप से बदल तो गए, लेकिन वहाँ रहने वाले अनेक लोगों के जीवन में अपेक्षित समृद्धि नहीं आ सकी।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या हर क्षेत्र के लिए विकास का एक ही मॉडल हो सकता है?

भारत की भौगोलिक, पारिस्थितिक और सामाजिक विविधता इतनी व्यापक है कि किसी एक केंद्रीय विकास मॉडल को हर क्षेत्र पर लागू करना न तो वैज्ञानिक है और न ही न्यायसंगत। किसी दूरस्थ आदिवासी या पहाड़ी क्षेत्र के लिए प्राथमिक आवश्यकता विशाल उद्योग नहीं, बल्कि बेहतर प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्थानीय रोजगार, स्वच्छ पेयजल और ऐसी आजीविका हो सकती है जो उसके प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट न करें।

विडंबना यह भी है कि कई क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं ने लोगों की पारंपरिक आजीविका के साथ-साथ उनके प्राकृतिक पेयजल स्रोतों और स्वच्छ हवा पर भी दबाव बढ़ाया है। इसका असर कुपोषण, जलजनित तथा संक्रामक बीमारियों और समग्र स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। यदि विकास लोगों के जीवन को स्वस्थ और सुरक्षित बनाने के बजाय उनके स्वास्थ्य के लिए नया संकट पैदा करने लगे, तो उसके मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसी तरह हर रास्ते को चौड़ी सड़क में बदल देना भी विकास नहीं है। कुछ प्राकृतिक और संवेदनशील क्षेत्रों की दुर्गमता ही उनका संरक्षण है। पर्वतीय और पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्रों में अंधाधुंध सड़क विस्तार ने जिस प्रकार अनियंत्रित पर्यटन और वाहनों का दबाव बढ़ाया है, उसने वहाँ की प्राकृतिक वहन-क्षमता को गंभीर चुनौती दी है। भूस्खलन, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी आपदाओं का बढ़ता जोखिम हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की गति और स्वरूप प्रकृति की सीमाओं के अनुरूप होना चाहिए।

धार्मिक स्थलों के संदर्भ में यह संकट और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। पहाड़ों में स्थित अनेक तीर्थस्थल कभी कठिन यात्राओं, स्थानीय संस्कृति और प्रकृति के साथ गहरे संबंध के केंद्र थे। बेहतर संपर्क सुविधाओं ने निश्चित रूप से लोगों की पहुँच आसान की है, लेकिन जब सुविधा अनियंत्रित पर्यटन में बदल जाती है, तो आस्था के केंद्र धीरे-धीरे व्यावसायिक पर्यटन स्थलों में बदलने लगते हैं। बढ़ता निर्माण, कचरा, यातायात, जलस्रोतों पर दबाव और पहाड़ों की कटाई अंततः उसी प्रकृति को कमजोर करते हैं जिसके बीच ये तीर्थ विकसित हुए थे।

इसलिए विकास की अवधारणा पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि किसी क्षेत्र में कितने किलोमीटर सड़क बनी, कितने मेगावाट बिजली पैदा हुई या कितने बड़े उद्योग स्थापित हुए। असली प्रश्न यह होना चाहिए कि वहाँ के लोगों का जीवन कितना बेहतर हुआ? क्या उनकी आय और आजीविका सुरक्षित हुई? क्या बच्चों को बेहतर शिक्षा मिली? क्या स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचीं? क्या कुपोषण और बेरोजगारी कम हुई? क्या स्थानीय लोगों की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या यह सब पर्यावरण को नष्ट किए बिना संभव हुआ?

जिन जंगलों में रहने वाले समुदाय पीढ़ियों से प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीते आए थे, उनके सामने आज विकास के साथ नए स्वास्थ्य और आजीविका संकट भी खड़े हो रहे हैं। यदि विकास के बाद भी उन्हें कुपोषण, प्रदूषित जल, अस्वास्थ्यकर वातावरण और रोजगार की असुरक्षा से जूझना पड़े, तो यह पूछना जरूरी है कि विकास का वास्तविक लाभ किसे मिला?

विकास का अर्थ केवल प्रकृति पर कंक्रीट बिछाना नहीं हो सकता। यदि किसी परियोजना के बाद सड़क तो चौड़ी हो जाए, लेकिन नदी सिकुड़ जाए; उद्योग तो लग जाए, लेकिन स्थानीय लोगों की जमीन चली जाए; बिजली तो पैदा हो, लेकिन गाँव के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिले—तो हमें यह पूछना ही होगा कि आखिर यह विकास किसके लिए है?

समय आ गया है कि विकास को केवल भौतिक बुनियादी ढाँचे की मात्रा से मापने के बजाय मानवीय जीवन की गुणवत्ता से मापा जाए। सड़कें, पुल, बिजली और उद्योग विकास के साधन हो सकते हैं, स्वयं विकास नहीं।

विकास की अंतिम कसौटी यह होनी चाहिए कि वह स्थानीय समुदाय की गरिमा, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, पर्यावरणीय सुरक्षा और स्वायत्तता को कितना मजबूत करता है। जिस विकास में मनुष्य और प्रकृति दोनों सुरक्षित रहें, वही टिकाऊ विकास है। और जिस विकास के लिए किसी समुदाय को अपनी जमीन, जंगल, जल और जीवन की कीमत चुकानी पड़े, उसकी सफलता पर सवाल उठाना ही लोकतांत्रिक समाज का दायित्व है।

Dr. R. Achal Pulastey

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

A multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, geopolitical dynamics, and Ayurveda.

ORCID iD ORCID: 0009-0002-8240-2689

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