चुनावी शुचिता और लोकतंत्र का संकट: जनता नाराज है, फिर सत्ता के पक्ष में जनादेश कैसे?

बेरोजगारी, महंगाई, बुलडोजर कार्रवाई और किसान-युवा आंदोलनों के बीच चुनावी सफलता पर सवाल। चुनाव आयोग अधिनियम 2023 की धारा 16 से जुड़ा कानूनी संरक्षण लोकतांत्रिक जवाबदेही की बहस को क्यों गहरा रहा है?
Editorial Analysis
Published: October 30, 2026 | Editor in Chief
Electoral Integrity and the Crisis of Democracy: Public Discontent, Political Power and Institutional Accountability

India's democracy faces a growing credibility challenge amid widespread public discontent over unemployment, inflation, bulldozer demolitions, farmers' protests and declining access to education and healthcare. Yet electoral victories by the ruling party continue to raise questions about the relationship between public sentiment and electoral outcomes. The editorial examines concerns surrounding voter lists, electoral transparency, the use of state machinery and, most importantly, Section 16 of the Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023, which provides broad legal protection to election commissioners for acts related to their official duties, even after retirement. It questions the democratic justification for such protection and argues that electoral independence must go hand in hand with institutional accountability. Abstract:

Keywords: Electoral integrity, Election Commission Section 16, Chief Election Commissioner Act 2023, crisis of Indian democracy, electoral impartiality, 'bulldozer' action, electoral rolls, democratic accountability.

चुनाव शुचिता पर सवाल
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव जनता के असंतोष को सत्ता परिवर्तन में बदलने का सबसे प्रभावी माध्यम रहे हैं। सरकारें आती-जाती रही हैं, लेकिन मतदाता ने हमेशा अपने वोट की ताकत से सत्ता को चुनौती दी है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारतीय चुनावी राजनीति में एक ऐसा विरोधाभास उभरा है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकार की नीतियों के विरुद्ध आंदोलन हो रहे हैं, जनता महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली से जूझ रही है, हजारों परिवार बुलडोजर कार्रवाई और विस्थापन की मार झेल रहे हैं, लेकिन चुनावी परिणामों में सत्तारूढ़ दल की सफलता का सिलसिला जारी है। आखिर जनता का यह असंतोष चुनावी जनादेश में प्रभावी ढंग से दिखाई क्यों नहीं देता?

जनता का असंतोष और सत्ता की चुनावी सफलता

देश की मौजूदा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर नजर डालें तो असंतोष के अनेक कारण दिखाई देते हैं। शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। चिकित्सा आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है। युवाओं के सामने रोजगार का संकट है। भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक की घटनाओं ने उनके भविष्य को अनिश्चित बनाया है। महंगाई ने घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है और किसानों की समस्याएं अब भी पूरी तरह हल नहीं हुई हैं।

किसान आंदोलन ने सरकार को अपनी नीतियों पर पीछे हटने के लिए मजबूर किया था। अग्निवीर योजना के विरोध में युवाओं का आक्रोश सामने आया। देश के विभिन्न हिस्सों में जमीन, जंगल और आजीविका से जुड़े सवालों पर आंदोलन चल रहे हैं। बुलडोजर कार्रवाई के नाम पर हजारों लोगों के घर और कारोबार उजाड़े जाने की घटनाओं ने कानून के शासन और नागरिक अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

इन परिस्थितियों में स्वाभाविक अपेक्षा होती है कि जनता का असंतोष चुनावों में भी राजनीतिक अभिव्यक्ति पाएगा। लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को अपने दम पर बहुमत न मिलना इसी राजनीतिक असंतोष का एक संकेत था। लेकिन इसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में भाजपा की चुनावी सफलताओं ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। क्या जनता का असंतोष केवल आंदोलनों तक सीमित रह गया है? क्या चुनावी राजनीति में ऐसे कारक प्रभावी हो गए हैं, जो जनता की रोजमर्रा की समस्याओं और उसके राजनीतिक निर्णय के बीच दूरी पैदा कर रहे हैं?

बुलडोजर से उजड़े घर, आंदोलनों से भरी सड़कें और चुनावी जनादेश

इस विरोधाभास को समझने के लिए बुलडोजर राजनीति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश के अनेक राज्यों में अतिक्रमण हटाने और अपराध के विरुद्ध कार्रवाई के नाम पर घरों और दुकानों को ध्वस्त करने की घटनाएं सामने आई हैं। कई मामलों में न्यायिक प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। सर्वोच्च न्यायालय को भी नवंबर 2024 में बुलडोजर कार्रवाई के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने पड़े।

सवाल यह है कि जिस व्यवस्था में किसी नागरिक का घर उसकी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही ध्वस्त हो सकता है, वहां उसके संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा? और जब ऐसी कार्रवाइयों के विरुद्ध विरोध और असंतोष सामने आता है, तो उसका चुनावी प्रभाव कहां दिखाई देता है?

इसी तरह किसान, युवा, कर्मचारी, आदिवासी और अन्य सामाजिक समूह अपनी मांगों को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इन आंदोलनों को केवल कुछ संगठनों का विरोध बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। ये समाज के भीतर मौजूद असंतोष और नीतिगत असहमति के संकेत हैं। फिर भी चुनावी परिणामों में सत्ता के पक्ष में दिखाई देने वाली निरंतरता लोकतांत्रिक विमर्श के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा करती है।

चुनावी प्रक्रिया पर उठते सवाल

इस विरोधाभास के बीच चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर उठे सवालों को और गंभीरता से देखने की जरूरत है। राहुल गांधी ने महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में मतदाता सूचियों तथा मतदान के आंकड़ों में कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए। नवंबर 2025 में उन्होंने हरियाणा चुनाव को लेकर कथित फर्जी मतदाताओं और वोटों में हेरफेर के आंकड़े भी सार्वजनिक किए। इन आरोपों पर निर्वाचन आयोग ने आपत्ति जताई, लेकिन इससे चुनावी आंकड़ों की पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की मांग समाप्त नहीं हो जाती।

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर भी देश के विभिन्न हिस्सों में विवाद हुआ है। मतदाता सूची से नाम हटने, पात्र नागरिकों को दस्तावेज प्रस्तुत करने की कठिनाइयों और पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों तथा नागरिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं। मताधिकार केवल मतदान केंद्र तक पहुंचने का अधिकार नहीं है; इसमें मतदाता सूची में नाम बने रहने और बिना किसी अनुचित बाधा के मतदान करने का अधिकार भी शामिल है।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठने का एक कारण यह भी है कि चुनावों में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच संसाधनों की असमानता, सरकारी प्रचार तंत्र के इस्तेमाल तथा प्रशासनिक प्रभाव को लेकर लगातार बहस होती रही है। जब विपक्षी दलों को केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाइयों, चुनावी प्रचार में सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और प्रशासनिक निष्पक्षता पर आपत्ति होती है, तब इन सवालों का संस्थागत समाधान जरूरी हो जाता है।

यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि चुनावी जीत अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। लेकिन चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले गंभीर सवालों को केवल राजनीतिक पराजय की हताशा बताकर खारिज करना भी लोकतांत्रिक जवाबदेही से बचना है।

सत्ता का वर्चस्व या लोकतंत्र की वास्तविक सहमति?

चुनावों में किसी दल की लगातार सफलता के पीछे संगठन, नेतृत्व, सामाजिक समीकरण, विपक्ष की कमजोरी, कल्याणकारी योजनाएं और राजनीतिक प्रचार जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। लेकिन जब जनता की आर्थिक परेशानियां, सामाजिक असंतोष और आंदोलनों का विस्तार दिखाई दे रहा हो, तब केवल चुनावी जीत को सरकार की नीतियों के प्रति व्यापक जनस्वीकृति मान लेना भी उचित नहीं है।

यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है। आधुनिक चुनावी राजनीति में केवल जनता के काम करना ही पर्याप्त नहीं रह गया है; जनता की धारणा को प्रभावित करना भी सत्ता की राजनीति का बड़ा हिस्सा बन गया है। प्रचार तंत्र, मीडिया पर प्रभाव, संसाधनों की असमानता और राजनीतिक विमर्श को नियंत्रित करने की क्षमता चुनावी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि चुनावी सफलता जनसमर्थन का परिणाम है या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की असमान परिस्थितियों का भी उसमें योगदान है।

लोकतंत्र में असहमति को जगह मिलना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि सत्ता के विरुद्ध उठने वाली आवाजों को चुनावी प्रक्रिया में भी समान अवसर मिले। यदि आंदोलन करने वाला नागरिक चुनाव के समय अपने मताधिकार को लेकर ही आशंकित हो, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

जनता के भरोसे की असली परीक्षा

चुनाव आयोग और सरकार दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल चुनाव संपन्न कराने से कायम नहीं होती। मतदाता सूचियों की पारदर्शिता, मतदान और मतगणना के आंकड़ों की उपलब्धता, शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा तथा सरकारी मशीनरी की राजनीतिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

विपक्ष को भी अपने आरोपों के समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत करने चाहिए। लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी उन संस्थाओं की है, जिन पर निष्पक्षता बनाए रखने का संवैधानिक दायित्व है। उन्हें अपनी विश्वसनीयता केवल अपने स्पष्टीकरण से नहीं, बल्कि पारदर्शी कार्रवाई से साबित करनी होगी।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं कि कोई सरकार जनता के असंतोष के बावजूद चुनाव जीत जाए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जनता की नाराजगी सड़कों पर दिखाई दे रही हो, तब चुनावी जनादेश में उसकी आवाज कितनी और किस तरह दर्ज हो रही है?

यदि जनता के आंदोलनों, उसकी आर्थिक परेशानियों और नागरिक अधिकारों से जुड़े सवालों का जवाब केवल चुनावी जीत से दिया जाएगा, तो लोकतंत्र के मूल उद्देश्य पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा। आखिर चुनाव सत्ता में बने रहने का प्रमाणपत्र नहीं, जनता के प्रति जवाबदेही का माध्यम हैं। जनता का वोट सत्ता को अधिकार देता है, लेकिन उस अधिकार की सबसे बड़ी शर्त जनता के विश्वास की रक्षा करना है।

प्रश्न 1. चुनाव आयोग अधिनियम 2023 की धारा 16 क्या है?

यह धारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित कार्यों के लिए दीवानी और आपराधिक न्यायिक कार्यवाही से संरक्षण प्रदान करती है।

प्रश्न 2. क्या चुनाव आयोग के पदाधिकारी कानून से ऊपर हैं?

नहीं। धारा 16 का संरक्षण आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित निर्धारित दायरे में है। इसकी संवैधानिक वैधता और सीमा न्यायिक समीक्षा का विषय है।

प्रश्न 3. चुनावी निष्पक्षता लोकतंत्र के लिए क्यों जरूरी है?

क्योंकि चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास ही निर्वाचित सरकार की लोकतांत्रिक वैधता का आधार है।

प्रश्न 4. चुनाव आयोग की जवाबदेही क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि चुनाव आयोग पर सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को निष्पक्ष चुनावी अवसर उपलब्ध कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

Dr. R. Achal Pulastey

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

A multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, geopolitical dynamics, and Ayurveda.

ORCID iD ORCID: 0009-0002-8240-2689

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