Culture | संस्कृति |जिउतिया | जितिया | जिवितपुत्रिका | मातृका श्राद्ध
Date : October 02, 2026 | Author : डॉ. के. अनामिका
Abstract
Jitiya, or Jivitputrika, is widely observed by women for the well-being and longevity of their children. Beyond its popular religious identity, the festival carries a rich layer of folk memory, ancestral remembrance and ecological symbolism. Its pre-fast rituals, offerings to maternal ancestors, stories of Jimutavahana, and regional food traditions reveal a close relationship between the living, the dead and the continuity of generations. Rooted particularly in the Bhojpuri, Magahi and Maithili cultural belt, Jitiya has travelled across eastern and northeastern India and into Nepal through migration and cultural exchange. Its diverse traditions—from torai, dahi and chura to sidri fish and Mithila's machh-madua—show how local ecology and community customs shape a common cultural idea: remembering the past while praying for the protection and continuity of future generations.
Keywords: Jitiya, Jivitputrika, Jitiya Vrat, Jiutia, maternal ancestor worship, folk culture, Bhojpuri culture, Magahi culture, Maithili culture, Mithila, Jimutavahana, ancestral traditions, eastern India, fertility symbolism, folk traditions
जीवित्पुत्रिका, जिसे पूर्वी उत्तर भारत में जितिया या जिउतिया के नाम से जाना जाता है, सामान्यतः संतान की दीर्घायु और सुरक्षा के लिए रखा जाने वाला कठिन व्रत माना जाता है। लेकिन लोक-संस्कृति की गहराई में उतरकर देखें तो यह केवल एक मातृ-व्रत नहीं है। इसके भीतर पूर्वजों का स्मरण, मातृकुल के प्रति कृतज्ञता, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और संतति की निरंतरता की लोक-कामना एक साथ दिखाई देती है।
इसी दृष्टि से जितिया को ‘मातृका-श्राद्ध’ की लोकपरंपरा के रूप में समझने की एक महत्वपूर्ण व्याख्या सामने आती है। यह व्याख्या शास्त्रीय कर्मकांड की स्थापित परिभाषा से अधिक लोकाचार, मौखिक परंपरा और अनुष्ठानिक व्यवहार के अध्ययन पर आधारित है।
पितृपक्ष के बीच एक विशिष्ट अनुष्ठान
जितिया आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह काल पितृपक्ष का होता है—पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध का समय। ऐसे समय में संतान की मंगल-कामना से जुड़ा यह व्रत अपने आप में विशेष सांस्कृतिक संकेत देता है।
लोक-परंपरा में इसके पूर्व होने वाले नहाय-खाय और ओठगन या पारन के विधान को देखें तो पूर्वजों के प्रति अर्पण की भावना और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। अनेक क्षेत्रों में भोजन का एक हिस्सा चील और सियारिन के साथ दिवंगत सास, दादी-सास अथवा परिवार की दिवंगत स्त्रियों के नाम से भोजन और जल समर्पित किया जाता है।
इस प्रकार जीवित संतान के लिए किया जाने वाला यह अनुष्ठान मृत पूर्वजों के साथ पशु-पक्षी के मानवीय संबंधो की स्मृति से जुड़ जाता है। अतीत और भविष्य के बीच यही संबंध जितिया की सांस्कृतिक विशेषता है।
जिमूतवाहन की कथा और मातृ-चेतना
जितिया की मुख्य कथा राजा जिमूतवाहन से जुड़ी है। लोककथा में वे एक नाग-संतान के प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करने को तैयार होते हैं। कथा का केंद्रीय भाव है—दूसरे के जीवन की रक्षा के लिए आत्मत्याग। कहीं-कहीं इसे जिउतबंधन कथा भी कहते हैं
यही भाव जितिया के व्यापक लोक-दर्शन से जुड़ता है। संतान केवल जैविक उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि वंश, स्मृति और भविष्य की निरंतरता है। इसलिए व्रत रखने वाली माँ एक ओर पूर्वज मातृकाओं को स्मरण करती है और दूसरी ओर जीवित संतान की दीर्घायु की कामना करती है।
श्राद्ध की मूल भावना को ‘श्रद्धा’ से जोड़कर देखा गया है। सामान्य श्राद्ध में दिवंगतों की तृप्ति और शांति की कामना होती है; जितिया की लोक-व्याख्या में दिवंगत मातृकाओं के प्रति श्रद्धा के साथ जीवित संतति की सुरक्षा की कामना जुड़ जाती है। यही कारण है कि ‘जीवित्पुत्रिका’ नाम अपने भीतर ही जीवित संतति और पूर्वज-स्मृति का संबंध समेटे हुए दिखाई देता है। यह भाव वंश की निरंतरता का प्रतीक बन जाता है
जितिया की सांस्कृतिक नाभि कहाँ है?
आज जितिया बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सो, असम और नेपाल के तराई क्षेत्रों सहित अनेक स्थानों में मनाया जाता है। प्रवास के साथ यह महानगरों और विदेशों में बसे पूर्वांचली तथा मैथिल समुदायों तक भी पहुँचा है।
लेकिन इसके व्यापक भौगोलिक विस्तार के बावजूद इसकी मूल सांस्कृतिक चेतना को भोजपुरी, मगही और मैथिली लोक-संस्कृति के त्रिकोण में तलाशा जा सकता है। जितिया के लोकगीत, कथाएँ, भोजन और अनुष्ठान इस क्षेत्र की सामाजिक स्मृति से गहराई से जुड़े हैं।
‘चील-सियारिन’ की कथा हो या जिमूतवाहन या जिउतबंधन की लोककथा, इन्हें पीढ़ियों तक मौखिक परंपरा ने जीवित रखा है। व्रत की भाषा संस्कृत के शास्त्रीय कर्मकांड की भाषा नहीं, बल्कि घर-आँगन, खेत-खलिहान और लोकगीतों की भाषा है।
यही कारण है कि जितिया को केवल एक धार्मिक व्रत की दृष्टि से देखना उसके सांस्कृतिक विस्तार को सीमित कर देना होगा।
एक पर्व, अनेक भोजन-विधान
पर्व की शुरुआत अष्टमी को भोर में होती है, जब सूर्योदय के पहले स्नानादि के बाद नेनुआ के पत्ते पर दही,चूड़ा,(मथिली मगध में मडुये की रोटी,मछली आदि विविध पकवान) नेनुआ के पत्ती पर चील,सियारिन और पूर्वज मातृकाओं को समर्पित कर घर के बाहर या छत पर रखा जाता है। दिन भर निर्जल व्रत के बाद सायं काल नदी,पोखर या घर में स्नान कर नेनुआ के सात पत्तो पर सरसो खली,और सरसो का तैल तीन या पाँच या सात पीढ़ी की माताओं का नाम लेकर पानी में बहाया जाता है। इसके बाद बरियार(बला) के पौधे को अकवार देकर पुत्रों का नाम लेकर उनके उनके दीर्घ आयु की कामना की जाती है। इसके बाद जियुतबंधन या जिमूतवाहन की कथा किसी वरिष्ठ महिला द्वारा सुनी जाती है। रात्रि भर व्रत के बाद सुबह विविध पकवान बनाकर पितर मातृकाओं का अर्पित किया जाता है। इस समय लाल सूत्रों की एक माला में संतानों की संख्या के अनुसार गाँठ लगा कर अर्पित कर गले में पहना जाता है। कुछ लोग सोने या चाँदी की गाँठ भी बनवाते हैं। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश की विधान है, लेकिन यही मिथिला और मागधी में बदल जाता है।
जितिया की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि इसका भोजन-विधान हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं है। कहीं तोरई, दही, चूड़ा और नोनी का साग अर्पित किया जाता है, तो कहीं मछली का विधान मिलता है। कुछ परंपराओं में सिधरी मछली को पकाकर अर्पित किया जाता है, जबकि कुछ परिवारों में जीवित सिधरी मछली का दर्शन ही शुभ माना जाता है।
मिथिला में मड़ुए की रोटी और मछली के साथ जितिया का ओठगन करने की परंपरा है। इस विविधता को विरोधाभास नहीं,लोक-संस्कृति की स्वाभाविक विशेषता है। जिस भूगोल में जो खाद्य पदार्थ उपलब्ध था और जिस समुदाय की अपनी कुल-परंपरा विकसित हुई, उसने उसी को अनुष्ठान का हिस्सा बन गया ।
इसलिए एक ही पर्व में कहीं शाकाहारी विधान और कहीं मछली का प्रयोग दिखाई देता है। लोकधर्म का यही चरित्र उसे किसी एकरूप धार्मिक विधान से अलग करता है।
तोरई और सिधरी में छिपा लोक-संकेत
जितिया के भोजन में प्रयुक्त वस्तुओं को केवल भोजन मान लेना भी शायद पर्याप्त नहीं है। लोक-मानस अक्सर प्रकृति के गुणों को मानवीय आकांक्षाओं से जोड़ता है।
तोरई या सतपुतिया की बेल तेजी से फैलती है और गुच्छों में फल देती है। उसके भीतर असंख्य बीज होते हैं। लोक-प्रतीक की दृष्टि से यह बहुलता और वंश-विस्तार का संकेत बन सकती है।
इसी प्रकार सिधरी जैसी छोटी मछली की जीवंतता और उसकी प्रजनन क्षमता को भी संतति-वृद्धि से जोड़ा गया है। कुछ परंपराओं में जीवित मछली का दर्शन इसी जीवन-शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
नोनी का साग भी इस लोक-प्रतीक संसार का हिस्सा है। कठिन परिस्थितियों में भी इसके पनपने की क्षमता को स्वस्थ और दीर्घजीवी संतति की कामना से जोड़ा जा सकता है।
बरियार (बला) का पौधा भी आयुर्वेद के अनुसार बलदायक होता है। इसका बीज प्रजनन शक्ति वर्धक होता है।
नदी, खेत, पोखर और मातृ-स्मृति
जितिया की सांस्कृतिक सीमा को देखें तो यह गंगा के मैदान, कोसी और गंडक के क्षेत्रों से लेकर ब्रह्मपुत्र के मैदान और नेपाल के तराई तक फैली लोक-संस्कृति से जुड़ती दिखाई देती है। इन क्षेत्रों में जल, कृषि, मछली, वनस्पति और मातृ-शक्ति से जुड़ी अनेक लोक-परंपराएँ आज भी जीवित हैं।
इस दृष्टि से जितिया केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता। यह उस ग्रामीण सभ्यता की स्मृति भी है जिसमें जीवन की निरंतरता खेत, जल, पशु-पक्षी, वनस्पति और परिवार—सभी के परस्पर संबंध पर निर्भर थी।
चील और सियारिन जैसे जीवों के लिए भोजन निकालना भी इस व्यापक लोक-दृष्टि का हिस्सा माना जा सकता है। मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसी जीवन-चक्र का हिस्सा समझता था।
श्राद्ध और संतति के बीच एक सांस्कृतिक सेतु
जितिया का सबसे गहरा अर्थ शायद इसी विरोधाभास में छिपा है—यह पितृपक्ष में मनाया जाता है, लेकिन इसकी कामना जीवित संतान के लिए है।
एक ओर स्मृति है, दूसरी ओर भविष्य। एक ओर दिवंगत मातृकाएँ हैं, दूसरी ओर जीवित पुत्र या संतति। एक ओर अतीत के प्रति कृतज्ञता है, दूसरी ओर आने वाली पीढ़ी के लिए आशा। वंश की निरंतरता का प्रतीक है।
इसलिए जितिया को यदि लोक-संस्कृति की दृष्टि से पढ़ा जाए तो यह मृत्यु और जीवन के बीच एक सांस्कृतिक सेतु दिखाई देता है। पूर्वजों को स्मरण करके भविष्य की रक्षा की कामना—यह भारतीय लोकमानस की उस निरंतरता को व्यक्त करता है जिसमें परिवार केवल वर्तमान पीढ़ी का समूह नहीं, बल्कि अतीत और भविष्य को जोड़ने वाली जीवित परंपरा है।
जितिया का सांस्कृतिक सार: संतति केवल जन्म से नहीं चलती; वह स्मृति, श्रद्धा, प्रकृति और पीढ़ियों के बीच बने सांस्कृतिक संबंध से भी जीवित रहती है।
जितिया इसलिए केवल माताओं का कठिन निर्जला व्रत नहीं है। यह भोजपुरी, मगही और मैथिली लोक-संसार की वह सांस्कृतिक स्मृति है जिसमें मातृ-श्रद्धा, पूर्वज-स्मरण, प्रकृति, भोजन, जल, जीव-जगत और संतति की आकांक्षा एक ही अनुष्ठान में मिल जाते हैं।
इसी अर्थ में जितिया भारतीय लोक-संस्कृति की उस जीवंत परंपरा का उदाहरण है, जिसमें अतीत की मातृ-स्मृति से भविष्य की संतति का आशीर्वाद माँगा जाता है।
About the Author
डॉ. कीर्ति अनामिका — वर्तमान में University of Delhi के अंतर्गत Shyama Prasad Mukherji College for Women के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। आपने Banaras Hindu University से इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विषय में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। इतिहास और संस्कृति से संबंधित आपके अनेक शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

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