‘समय के साथ मुठभेड़ जारी रहेगी’: योगेंद्र पांडेय की कविता में भाषा, बिंब और प्रतिरोध

Book Review

Date : 06 अक्टूबर 2026
Reviewer :अचल पुलस्तेय*


Book Details

Title : काव्यसंग्रह | समय के साथ मुठभेड़ जारी रहेगी
Author : योगेन्द्र पान्डेय
Publisher : रश्मि प्रकाशन,लखनऊ
Year : 2026
Price : ₹299
ISBN : 978-8169539-5936-16-6


योगेंद्र पांडेय का काव्य-संग्रह ‘समय के साथ मुठभेड़ जारी रहेगी’ समकालीन सामाजिक यथार्थ से सीधा संवाद रचने वाली कविताओं का संग्रह है। जिसमें कवि का निजी अनुभव व्यापक सामाजिक अनुभव से जुड़कर केवल आत्माभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक चेतना और प्रतिरोध का माध्यम बन जाता है।

संग्रह के शीर्षक में प्रयुक्त ‘मुठभेड़’ शब्द ही इसके काव्य-दृष्टिकोण की आधारभूमि को स्पष्ट करता है—कवि अपने समय को निष्क्रिय रूप से देखने के बजाय उसकी विसंगतियों, अंतर्विरोधों और मानवीय संकटों के साथ सक्रिय संघर्ष करता है। संग्रह की कविताओं में बेरोजगारी, भूख, हिंसा, युद्ध, विस्थापन, जाति, लोकतंत्र, पर्यावरण और मजदूर-आदिवासी जीवन जैसे यथार्थपरक प्रश्न उपस्थित हैं, जिन्हें अभिव्यक्त करने के लिए कवि मुख्यतः सरल, संवादधर्मी और प्रत्यक्ष भाषा का प्रयोग करता है।

संग्रह की प्रमुख विशेषता इसकी सीधी और संप्रेषणीय भाषा है। जटिल दार्शनिक शब्दावली या संस्कृतनिष्ठता के स्थान पर कवि रोजमर्रा के जीवन से आए शब्दों—मजदूर, भूख, जंगल, पेड़, मकान, बुलडोजर, भिखारी, युद्ध—का प्रयोग करता है, जो अपने सामान्य अर्थ से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक अर्थ ग्रहण करते हैं। यहाँ भाषा का सरलीकरण केवल पाठकीय सुविधा का उपाय नहीं, बल्कि कवि की लोकतांत्रिक काव्य-दृष्टि का प्रमाण है। जिन पीड़ित वर्गों और समुदायों को कविता का विषय बनाया गया है, उनकी भाषा को ही माध्यम बनाना सामाजिक सरोकार को अधिक विश्वसनीय बनाता है। कवि पाठक के सामने कोई दूरस्थ बौद्धिक निष्कर्ष नहीं थोपता, बल्कि उसे उसी सामाजिक स्थिति के भीतर खड़ा कर देता है जहाँ से प्रश्न जन्म लेते हैं।

संग्रह की अनेक कविताओं में कथनात्मकता का गहरा प्रभाव दिखाई देता है, जहाँ स्थितियाँ और सामाजिक व्यवहार सीधे प्रस्तुत किए गए हैं। इससे कविता में वक्तव्यात्मक शक्ति पैदा होती है। समकालीन हिंदी कविता के सामने प्रायः यह चुनौती रहती है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएँ कहीं कोरी राजनीतिक टिप्पणी न बन जाएँ। योगेंद्र पांडेय की कविताओं में यह तनाव कई जगह दिखाई देता है। जहाँ बिंब और प्रतीक कथ्य को रूपांतरित करते हैं, वहाँ कविता अधिक काव्यात्मक और बहुस्तरीय बनती है; वहीं जहाँ निष्कर्ष सीधे व्यक्त होते हैं, वहाँ प्रभाव तात्कालिक हो जाता है। इसे सीमा के बजाय कवि की शैलीगत प्राथमिकता के रूप में देखा जाना चाहिए, जहाँ काव्यात्मक अस्पष्टता की तुलना में सामाजिक स्पष्टता को तरजीह दी गई है।

इस संग्रह में प्रश्नवाचक वाक्य एक महत्वपूर्ण काव्य-तकनीक के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। कवि जब अन्याय, बेरोजगारी या हिंसा के दौर में मनुष्य की भूमिका पर प्रश्न उठाता है, तो वह केवल सूचना प्राप्त करने का माध्यम नहीं रहता, बल्कि नैतिक और सामाजिक आत्मपरीक्षण का उपकरण बन जाता है। प्रश्नवाचकता वक्ता और पाठक के बीच की दूरी को समाप्त करती है। कथन की तुलना में प्रश्न पाठक को उत्तर देने के लिए बाध्य करता है, जिससे पाठक केवल कविता का उपभोक्ता न रहकर उसके विमर्श का सहभागी बन जाता है। इस प्रकार प्रश्न यहाँ सत्ता, सामाजिक रूढ़ि और स्थापित विचारों को सीधे चुनौती देकर प्रतिरोध की भाषिक संरचना निर्मित करते हैं।

संग्रह का बिंब-विधान मुख्यतः जीवन-जगत की परिचित वस्तुओं से निर्मित है। कवि अमूर्त सामाजिक अवधारणाओं को सीधे परिभाषित करने के बजाय उन्हें दृश्य वस्तुओं और परिस्थितियों में रूपांतरित करता है। 'परित्यक्त मकान' में मकान केवल वास्तु का विषय नहीं रह जाता, बल्कि उसकी दीवारें और पुरानी ईंटें स्मृति, परिवार और उजड़ने के व्यापक सामाजिक अर्थ को ग्रहण कर लेती हैं। इसी तरह 'जंगल' और 'पेड़' निष्क्रिय पृष्ठभूमि न होकर पर्यावरण संकट, जीवन की निरंतरता और अस्तित्व के अधिकार के प्रतीक बन जाते हैं। कवि सामान्य जीवन की वस्तुओं को सामाजिक प्रतीकों में बदलता है; जैसे 'बुलडोजर' निर्माण के उपकरण से बदलकर विकास की उस विनाशकारी प्रक्रिया का प्रतीक बनता है जिसमें विस्थापन छिपा है। 'भूख' केवल शारीरिक आवश्यकता न रहकर आर्थिक असमानता को दर्शाती है, जबकि 'मजदूर चौक' असुरक्षित श्रम और रोजी-रोटी के संघर्ष का दृश्य रूप बन जाता है।

'भिखारियों के खिलाफ आदेश', 'पेड़ पर लोकतंत्र' और 'बुलडोजर का झूठा विकासवाद' जैसे शीर्षक व्यंग्य और विडंबना की गहरी संरचना रचते हैं। दो परस्पर विरोधी अवधारणाओं को एक साथ रखकर कवि पाठक को प्रचलित राजनीतिक-सामाजिक शब्दावली की पुनर्व्याख्या करने के लिए प्रेरित करता है। यहाँ व्यंग्य का उद्देश्य उपहास उड़ाना नहीं, बल्कि भाषा और वास्तविकता के बीच के अंतर को उजागर करना है। इसी प्रकार 'एक आतंकवादी से संवाद' में संवाद-शैली का प्रयोग कविता को नाटकीयता देने के साथ-साथ हिंसा और मनुष्यता के बीच नैतिक प्रश्न खड़ा करता है। कवि हिंसक व्यक्ति से जीवन नष्ट करने के बजाय उसे बचाने का विकल्प चुनने का आग्रह करता है, जिससे संवाद नैतिक पुनर्विचार का माध्यम बन जाता है।

संग्रह में शब्दों, वाक्यांशों और प्रश्नों की पुनरावृत्ति पारंपरिक छंदात्मक छंदों के स्थान पर एक वैचारिक और भावात्मक लय उत्पन्न करती है। विशेष रूप से प्रतिरोध की कविताओं में बार-बार लौटने वाले कथन पाठक पर मानसिक दबाव बनाते हैं और केंद्रीय प्रश्न को स्मृति में अंकित कर देते हैं। यह तकनीक लोकभाषा और मौखिक परंपरा से जुड़कर कविता के प्रभाव को बढ़ाती है। शोधपरक दृष्टि से इस संग्रह को 'प्रत्यक्ष सामाजिक वक्तव्य और प्रतीकात्मक काव्य-अनुभूति के समन्वय' के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जहाँ कवि प्रत्यक्ष वक्तव्य देता है, वहाँ कविता सामाजिक रूप से स्पष्ट होती है; और जहाँ वह बिंबों तथा प्रतीकों का सहारा लेता है, वहाँ अर्थ की परतें अधिक विस्तृत हो जाती हैं। योगेंद्र पांडेय का मूल उद्देश्य केवल अपने समय का दस्तावेज तैयार करना नहीं, बल्कि पाठक को उस समय के प्रति प्रश्नाकुल बनाना है। इसीलिए इस संग्रह में 'मुठभेड़' शब्द एक राजनीतिक शब्दावली मात्र न रहकर कवि, कविता और पाठक—तीनों की सक्रिय चेतना की जीवंत प्रक्रिया बन जाता है।

अचल पुलस्तेय

*डॉ. अचल पुलस्तेय, एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, कवि और समीक्षक हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है।


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