तोरसा : लैंड पोर्ट बनाम लोग विकास की कीमत कौन चुकाएगा?

खूबसूरत चाय बागानों और गगनचुम्बी पेड़ों के बीच से गुजरती मेरी कार जब आगे बढ़ी तो इन्तजार में तोरसा नदी मिल गयी । एक नजर देखा तो मानो कह रही हो-मैं तोरसा,तिब्बत की चुम्बी घाटी से कम्बुमात नाम से निकलकर भूटान मे आमों छु बन जाती हूँ। 145 किमी भूटान पार कर भारत में तोरसा बन जाती हूँ। 113 किमी उछलती कूदती बड़ाझाड़ वन को सींचती बहन कालजानी के गले मिल जाती हूँ। तोरसा माने जंगल को रसमय करने वाली नदी हूँ पुलस्तेय ! अभी तक खुशनसीब हूँ कि तुम्हारे विकास की नजर मुझ पर नहीं पड़ी है, मेरे इलाके में आदमी कम और पेड़ अधिक हैं, इसीलिए निर्मल अविरल बह रही हूँ अन्यथा मेरी भी दशा गंगा,जमुना सी हो जाती ।
यह मेरी किताब “कुरूना से कामाख्या” में तोरसा नदी का संवाद है।
2023-24 में दो बार मैंने उत्तर प्रदेश से असम की यात्रा सड़क मार्ग किया। इस यात्रा में मैंने नदियों,वनों,पहाड़ों के नजर से दुनिया को देखने कोशिश किया। जो “कुरूना से कामाख्या” शीर्षक पुस्तक के रूप में अमेजन पर उपलब्ध है। इस यात्रा में 42 नदियों की संस्कृति,पर्यावरण पर लिखा है,जिसमें तोरसा नदी भी आती है। तोरसा माने जंगल को रसमय करने वाली नदी । उसी तोरसा के जल, जंगल, जमीन और लोगो पर आज विकास एक खतरा बन कर आया है।
भारत-भूटान सीमा पर तोरसा लैंड पोर्ट, आदिवासियों के विस्थापन, वन संरक्षण, नदी पारिस्थितिकी, भूमि अधिकारों और टिकाऊ विकास से जुड़े सवाल खड़े करता है। जो रिपोर्ट "पश्चिम बंग चा (चाय) मजूर समिति" के सिराज दत्ता के माध्यम से मिली है वह डराने वाली है।
Editorial Analysis
Published: September 26, 2026 | Editor in Chief
Torsa: Land Port vs People — The Cost of Development

Abstract: The proposed Jaigaon Land Port and Integrated Check Post (ICP) on the India-Bhutan border has brought into focus a complex intersection of border infrastructure, cross-border trade, land rights, community livelihoods and environmental conservation. The project is intended to strengthen customs, immigration, security, cargo handling and passenger facilities and involves approximately 122 acres of land in and around Torsa Tea Garden. According to the fact-finding report published by Paschim Banga Cha Majoor Samity on 6 September 2026, the proposed project area is inhabited and used by tribal and Gorkha families, many of whom have lived, cultivated land and sustained their livelihoods there for generations.
The dispute therefore extends beyond the question of land ownership and monetary compensation. For the affected communities, the land represents homes, agricultural activity, gardens, livestock, social relationships and intergenerational economic security. The report identifies approximately 80 worker families in the proposed project area, predominantly from Oraon, Munda, Santhal and Lohra communities, along with some Gorkha families. Their concerns include displacement, recognition of long-standing land use, adequate compensation, rehabilitation and protection of livelihoods.
The Torsa landscape also has significance beyond the immediate human settlement. The Torsa River passes through a forest-rich ecological region, connecting the river system with the wider natural landscape of the Dooars. The proposed transformation of land therefore raises an important environmental question: whether infrastructure development in such a landscape can be planned without causing avoidable damage to forests, trees, river ecology and the region’s natural character. The issue is not whether border trade and connectivity should be modernised, but whether the proposed location and scale of infrastructure are the only available options. The possibility of alternative sites, less ecologically sensitive locations or less disruptive forms of development therefore deserves transparent examination.
The dispute has also entered the judicial process. The report records a petition before the Calcutta High Court concerning protection from eviction, livelihood security, rehabilitation, transparency and due process before possession of the proposed land. It also records the government’s position that the land is government-owned and the assurance that affected people would not be removed while the matter remained under consideration.
The Torsa case consequently represents a wider development challenge: how can border infrastructure, economic connectivity, community rights and ecological conservation be addressed within a single planning framework? A sustainable approach requires transparent environmental and social assessment, meaningful consultation with affected communities, examination of alternatives, and a rehabilitation framework that protects both livelihood and social continuity. The editorial argues that the success of development should not be measured only by infrastructure created or trade facilitated, but also by the people, forests, rivers and natural heritage preserved for future generations.

Keywords: Torsa, Jaigaon Land Port, Jaigaon Integrated Check Post, Torsa Tea Garden, India Bhutan Border, Tribal Rights, Gorkha Community, Land Displacement, Land Rights, Environmental Protection, Torsa River, Dooars, Forest Conservation, Sustainable Development, Rehabilitation, Eastern Scientist

Sukhram Oraon temple and house

भारत-भूटान सीमा पर जयगाँव में प्रस्तावित लैंड पोर्ट और इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट को भारत-भूटान व्यापार, सीमा प्रबंधन, कस्टम, इमिग्रेशन, सुरक्षा, कार्गो और यात्री सुविधाओं को आधुनिक बनाने वाली परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। इसके लिए लगभग 122 एकड़ जमीन की पहचान की गई है। लेकिन जब विकास की यह रेखा तोरसा चाय बागान की उस दुनिया से टकराती है, जहाँ आदिवासी और गोरखा परिवार कई पीढ़ियों से रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं और अपनी आजीविका चला रहे हैं, तब सवाल केवल जमीन का नहीं रह जाता। सवाल यह भी बनता है कि विकास के नाम पर हम लोगों और प्रकृति—दोनों के लिए कितनी जगह बचा रहे हैं?

तोरसा केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं है। यह नदी, जंगल, चाय बागान, खेत, पेड़-पौधों और मनुष्यों से मिलकर बना एक जीवंत भूगोल है। यही कारण है कि तोरसा को केवल प्रस्तावित लैंड पोर्ट की जमीन के रूप में देखना इस पूरे प्रश्न को बहुत छोटा कर देना होगा।

तोरसा नदी का अपना एक लंबा प्राकृतिक सफर है। तिब्बत की चुम्बी घाटी से निकलकर भूटान से गुजरती हुई यह नदी भारत में तोरसा के रूप में प्रवेश करती है और बड़ाझाड़ के जंगलों को सींचते हुए कालजानी नदी में मिलती है। इस भूगोल की विशेषता यही है कि यहाँ आदमी कम और पेड़ अधिक हैं; इसी कारण नदी और उसका प्राकृतिक परिवेश आज भी अपेक्षाकृत निर्मल और अविरल दिखाई देता है। तोरसा नाम ही उस नदी की प्रकृति की ओर संकेत करता है जो जंगल को जीवन और रस देती है।

ऐसे प्राकृतिक भूगोल में किसी बड़े बुनियादी ढाँचे की परियोजना का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी जमीन उपलब्ध है और उस पर कितना निर्माण किया जा सकता है। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस निर्माण का पर्यावरणीय प्रभाव कितना होगा, जंगल और पेड़ों पर उसका क्या असर पड़ेगा, नदी के प्राकृतिक प्रवाह और स्थानीय पारिस्थितिकी पर उसका क्या प्रभाव होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक धरोहर में कितना बचा रहेगा।

पश्चिम बंग चाय मजूर समिति की 6 सितंबर 2026 की तथ्य-खोज रिपोर्ट ने तोरसा में पैदा हुए विवाद को सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित परिवार 23 जुलाई 2026 से अनिश्चितकालीन धरने पर हैं। उनकी मुख्य मांग प्रस्तावित परियोजना के लिए ली जा रही जमीन का उचित मुआवजा और अपने जमीन संबंधी अधिकारों की मान्यता है।

लेकिन इस विवाद को केवल मुआवजे के सवाल तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। जमीन पर लगभग 80 मजदूर परिवारों के रहने, खेती करने और जीवनयापन करने का उल्लेख रिपोर्ट में है। इनमें अधिकांश ओरांव, मुंडा, संथाल और लोहरा जैसे आदिवासी समुदायों से तथा कुछ गोरखा परिवारों से हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस भूभाग में खेती करते रहे हैं। उनके लिए जमीन घर है, खेत है, बगीचा है, पशुपालन का आधार है और अगली पीढ़ी की आर्थिक सुरक्षा भी है।

यहीं विकास की भाषा और जमीन पर रहने वाले लोगों की भाषा अलग-अलग दिखाई देती है। सरकारी पक्ष के अनुसार जमीन सरकारी है। प्रभावित परिवारों का सवाल है कि यदि वे दशकों से वहां रह रहे थे, खेती कर रहे थे और अपना जीवन बना रहे थे, तो उनके संबंध को केवल ‘कब्जा’ कहकर समाप्त कैसे किया जा सकता है? यह कानूनी प्रश्न अपनी जगह है, लेकिन लोकतांत्रिक विकास में सामाजिक और मानवीय प्रश्न को भी साथ रखना होगा।

मुआवजे का प्रश्न भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में कुछ घरों के लिए अलग-अलग राशि तय किए जाने और प्रभावित परिवारों के 70 योग्य सदस्यों को परियोजना में रोजगार में प्राथमिकता देने की बात दर्ज है। लेकिन प्रभावित परिवारों ने मुआवजे और पुनर्वास की पर्याप्तता पर सवाल उठाए हैं।

क्या घर का मुआवजा जीवन के मुआवजे के बराबर हो सकता है?

यदि किसी परिवार का घर चला जाता है, खेत चला जाता है, पेड़ चले जाते हैं, पूजा का स्थान चला जाता है और वह जमीन चली जाती है जिस पर अगली पीढ़ी का आर्थिक भविष्य टिका था, तो केवल मकान की कीमत तय कर देना पुनर्वास नहीं हो सकता। पुनर्वास का अर्थ केवल किसी परिवार को दूसरी जगह पहुँचा देना नहीं, बल्कि उसकी आजीविका, सामाजिक संबंध और जीवन की निरंतरता को सुरक्षित करना भी होना चाहिए।

लेकिन तोरसा का इससे भी बड़ा सवाल पर्यावरण का है। क्या हम हर प्राकृतिक भूभाग को केवल इसलिए विकास की संभावित जमीन मान लें क्योंकि वह किसी नक्शे पर खाली दिखाई देता है? क्या जंगल, पेड़, नदी, पहाड़ी भूगोल और प्राकृतिक सौन्दर्य की कोई आर्थिक कीमत नहीं होती? क्या किसी क्षेत्र की पर्यावरणीय उपयोगिता केवल तब समझ में आती है जब वहां कोई औद्योगिक परियोजना प्रस्तावित हो?

तोरसा का प्राकृतिक परिवेश केवल स्थानीय लोगों की संपत्ति नहीं है। जंगलों और नदियों का संरक्षण स्थानीय जीवन के साथ-साथ पूरे देश की पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। बड़ाझाड़ जैसे जंगल, तोरसा नदी और उसके आसपास का प्राकृतिक भूगोल उत्तर बंगाल और पूरे पूर्वोत्तर हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं। ऐसे क्षेत्रों में किसी भी बड़े निर्माण से पहले केवल जमीन की उपलब्धता नहीं, बल्कि पर्यावरणीय वहन क्षमता और दीर्घकालिक प्रभाव का सवाल भी सामने होना चाहिए।

क्या जयगाँव में लैंड पोर्ट के बिना अब तक भारत-भूटान व्यापार नहीं होता रहा? क्या सीमा पर आवागमन, व्यापार और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह ठप रही है? यदि ऐसा नहीं है, तो क्या लैंड पोर्ट का वर्तमान स्वरूप और उसका प्रस्तावित स्थान ही एकमात्र विकल्प है?

यह सवाल लैंड पोर्ट के विरोध का सवाल नहीं है। यह सवाल विकास के विकल्पों का है।

यदि व्यापार और सीमा प्रबंधन को आधुनिक बनाने की आवश्यकता है, तो क्या ऐसी जगह तलाशना संभव नहीं जहाँ कम से कम जंगल, नदी, खेती और आबादी प्रभावित हो? क्या मौजूदा बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाकर आवश्यकता पूरी नहीं की जा सकती? क्या परियोजना का आकार, डिजाइन या स्थान बदला जा सकता है? क्या पहले से विकसित या कम संवेदनशील क्षेत्र को प्राथमिकता दी जा सकती है?

इन सवालों के जवाब किसी आंदोलन या प्रशासनिक अनुमान से नहीं, बल्कि स्वतंत्र और पारदर्शी पर्यावरणीय तथा सामाजिक अध्ययन से मिलने चाहिए।

क्योंकि विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि जो प्राकृतिक रूप से सुंदर और अपेक्षाकृत सुरक्षित है, उसे सबसे पहले निर्माण के लिए चुन लिया जाए। आधुनिक शहरों की भीड़, प्रदूषण और कंक्रीट से बचा हुआ कोई प्राकृतिक क्षेत्र अपने आप में सार्वजनिक संपदा है। यदि किसी इलाके में जंगल और नदी अब भी अपनी प्राकृतिक लय में मौजूद हैं, तो उसे बचाए रखना भी विकास का एक रूप है।

तोरसा की खूबसूरती केवल पर्यटन की संभावना नहीं है। वह एक पारिस्थितिक विरासत है। ऐसी विरासत को बचाना आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।

रिपोर्ट में 10 जुलाई 2026 की घटना का उल्लेख है, जब पुलिस और स्थानीय प्रशासन के साथ JCB मशीनें प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र में पहुँचीं और घरों तथा पेड़ों को हटाने की कार्रवाई शुरू हुई। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ सुपारी के पेड़ काटे गए और एक छोटे मंदिर को भी आंशिक नुकसान पहुँचा। विरोध के बाद काम रुका और 23 जुलाई से प्रभावित परिवारों ने अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। यह घटनाक्रम बताता है कि किसी परियोजना को केवल मशीनों और प्रशासनिक आदेशों के जरिए आगे बढ़ाना समाधान नहीं है। जब जमीन पर लोगों की पीढ़ियों की स्मृतियाँ हों और उसी जमीन पर पेड़, खेत, घर, पूजा स्थल और प्राकृतिक जीवन मौजूद हो, तब संवाद प्रक्रिया का केंद्रीय हिस्सा होना चाहिए।

इस विवाद का न्यायिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित लोगों की ओर से कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है, जिसमें बेदखली रोकने, घर और आजीविका की सुरक्षा, उचित पुनर्वास, पारदर्शिता और 122 एकड़ जमीन का कब्जा लेने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन करने की मांग की गई है। सरकार का पक्ष है कि जमीन सरकारी है और उसे वापस लेने का अधिकार राज्य के पास है। न्यायिक कार्यवाही के दौरान सरकार के कानूनी अधिकारियों ने अदालत को यह आश्वासन भी दिया कि मामला सुलझने तक लोगों को वहां से नहीं हटाया जाएगा।

इसलिए इस समय सबसे जरूरी बात टकराव बढ़ाना नहीं, बल्कि कानून, संवाद, पारदर्शिता और पर्यावरणीय विवेक को साथ लेकर आगे बढ़ना है।

ईस्टर्न साइंटिस्ट का मानना है कि भारत-भूटान सीमा पर व्यापार और सीमा प्रबंधन की सुविधाओं को बेहतर बनाने की आवश्यकता हो सकती है। लेकिन किसी भी परियोजना की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी सड़क बनी, कितने ट्रक गुजरेंगे या कितने वर्गमीटर में निर्माण हुआ। उसकी कसौटी यह भी होनी चाहिए कि कितने लोगों का जीवन सुरक्षित रहा, कितनी प्राकृतिक संपदा बची और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमने क्या छोड़ा।

इसलिए तोरसा में निर्णय लेने से पहले तीन नहीं, चार सवालों का स्पष्ट उत्तर जरूरी है—जमीन पर पीढ़ियों से रह रहे लोगों के अधिकार क्या हैं? मुआवजे और पुनर्वास की गणना किस पारदर्शी आधार पर होगी? प्रभावित परिवारों की आजीविका और सामाजिक जीवन कैसे सुरक्षित रहेगा? और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या लैंड पोर्ट के लिए चुनी गई जगह पर्यावरणीय दृष्टि से वास्तव में अपरिहार्य है, या कम संवेदनशील कोई वैकल्पिक स्थान उपलब्ध हो सकता है?

यदि विकल्प मौजूद हैं, तो केवल इसलिए कि किसी स्थान पर जमीन उपलब्ध है, उसी स्थान को चुनना विकास की अनिवार्यता नहीं कही जा सकती।

प्रशासन को प्रभावित परिवारों, चाय बागान प्रबंधन, स्थानीय प्रतिनिधियों, परियोजना प्राधिकरण, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्वतंत्र संस्थाओं को एक साथ बैठाकर तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए। परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट, जमीन की सीमा, पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, मुआवजे की गणना और पुनर्वास की शर्तें स्थानीय लोगों की समझ की भाषा में सार्वजनिक होनी चाहिए।

तोरसा हमें विकास के एक बुनियादी प्रश्न के सामने खड़ा करता है—क्या जमीन केवल नक्शे पर खींची गई एक संख्या है, या वह किसी समुदाय का घर, खेत, स्मृति और भविष्य होने के साथ-साथ एक जीवित प्राकृतिक संसार भी है?

जयगाँव का लैंड पोर्ट बने, बदले या किसी वैकल्पिक स्थान पर बने—यह निर्णय सरकार, कानून और संबंधित संस्थाओं की प्रक्रिया से होगा। लेकिन निर्णय लेते समय यह सवाल अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या सीमा और व्यापार को आधुनिक बनाने के लिए प्रकृति और स्थानीय जीवन की कीमत उतनी ही आवश्यक है, जितनी परियोजना के नक्शे में दिखाई जा रही है।

तोरसा हमें यह भी याद दिलाता है कि देश केवल महानगरों, राजमार्गों और बंदरगाहों से नहीं बनता। देश उसकी नदियों, जंगलों, खेतों, पहाड़ों और उन लोगों से भी बनता है जो पीढ़ियों से इन प्राकृतिक भूभागों के साथ अपना जीवन जोड़कर रहते आए हैं।

विकास का अर्थ केवल सीमा पर आधुनिक लैंड पोर्ट खड़ा करना नहीं है। विकास का अर्थ यह भी है कि सीमा के भीतर रहने वाला नागरिक अपने भविष्य को सुरक्षित महसूस करे और उसके आसपास का जंगल, नदी और प्राकृतिक संसार भी सुरक्षित रहे।

तोरसा इसलिए केवल ‘लैंड पोर्ट बनाम लोग’ का विवाद नहीं है। यह उस विकास-दृष्टि की परीक्षा है जिसमें व्यापार और सीमा-सुरक्षा की जरूरतों के साथ मनुष्य और प्रकृति—दोनों के लिए जगह बची रहे।

और शायद आज तोरसा का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—

जिस प्राकृतिक धरोहर को हमने अभी तक बचाकर रखा है, उसे बदलने से पहले क्या हमने यह पर्याप्त रूप से पूछा है कि उसे बचाकर रखने का मूल्य क्या है?
Dr. R. Achal Pulastey

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

A multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, geopolitical dynamics, and Ayurveda.

ORCID iD ORCID: 0009-0002-8240-2689

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