Student Suicides in Higher Education | Mental Health, Entrance Exams & Campus Safety
Student suicides in higher educational institutions cannot be explained only through academic pressure or individual mental-health problems. Students entering IITs, medical colleges, central universities and other prestigious institutions suddenly encounter peers from vastly different social, economic, regional, linguistic and caste backgrounds. This transition can create difficulties of adjustment, loneliness, insecurity and social isolation, particularly when combined with intense competition, family expectations and fear of failure.
The editorial argues for a broader institutional approach. Entrance examinations could include scientifically designed psychological aptitude and adjustment assessments—not to exclude students, but to understand their support needs. Universities should establish permanent mental-health centres with trained counsellors, psychologists and access to psychiatrists, along with confidential crisis-support systems. Orientation, mentoring, safe accommodation, financial assistance and mechanisms against discrimination should form part of the same framework.
The central argument is that higher education must move beyond selecting academic talent to creating an environment in which that talent can survive, develop and flourish safely.
उच्च शिक्षा में छात्र आत्महत्या: प्रवेश से मानसिक सुरक्षा तक
आईआईटी मुंबई में एक छात्र की आत्महत्या ने एक बार फिर देश के सबसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों की चमक के पीछे छिपे उस अंधेरे को सामने ला दिया है, जिस पर सामान्यतः पर्याप्त चर्चा नहीं होती। ऐसी घटनाओं के बाद कुछ दिनों तक मानसिक स्वास्थ्य, परीक्षा के दबाव, काउंसलिंग और संस्थागत जिम्मेदारी की बातें होती हैं, लेकिन फिर व्यवस्था सामान्य रूप से चलने लगती है। अगली घटना तक।
सवाल यह है कि क्या उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत मानसिक समस्या मानकर उसका समाधान खोजा जा सकता है?
शायद नहीं।
उच्च शिक्षण संस्थान में प्रवेश पाने वाला विद्यार्थी केवल एक रैंक, एक अंक या एक प्रवेश-पत्र नहीं होता। वह एक युवा मन है, जो अपने परिवार की अपेक्षाओं, आर्थिक परिस्थितियों, सामाजिक पृष्ठभूमि और भविष्य के सपनों को लेकर संस्थान में आता है। देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में पहुँचने के बाद उसके सामने केवल कठिन पाठ्यक्रम नहीं होता, बल्कि एक बिल्कुल नया सामाजिक संसार भी खुलता है।
यहीं से समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।
आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल कॉलेजों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और दूसरे बड़े संस्थानों में देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी आते हैं। कोई महानगर से आता है, कोई छोटे शहर या गाँव से। किसी परिवार में उच्च शिक्षा पीढ़ियों से सामान्य बात रही है, तो किसी परिवार के लिए विश्वविद्यालय तक पहुँचना पहली बड़ी उपलब्धि है। किसी के पास आर्थिक संसाधनों की कमी नहीं होती, तो कोई छात्रवृत्ति, ऋण या परिवार की सीमित आय के सहारे यहाँ तक पहुँचता है।
इनके साथ भाषाई, प्रांतीय, जातीय, सांस्कृतिक और सामाजिक अंतर भी होते हैं।
अचानक ये सभी विद्यार्थी एक ही कक्षा, एक ही प्रयोगशाला और कई बार एक ही छात्रावास में रहने लगते हैं।
भारत की विविधता का यह सबसे प्रत्यक्ष रूप है, लेकिन एक युवा विद्यार्थी के लिए यह अपने आप में एक बड़ी समायोजन प्रक्रिया है।
जो विद्यार्थी अब तक अपने आसपास लगभग समान सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों के बीच रहा है, उसके लिए बिल्कुल अलग आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण से आए विद्यार्थियों के साथ रहना हमेशा आसान नहीं होता। भाषा में अंतर हो सकता है। पहनावे और खान-पान में अंतर हो सकता है। बातचीत और व्यवहार के तरीके अलग हो सकते हैं। किसी के लिए अंग्रेजी सहज माध्यम हो सकती है, जबकि दूसरे विद्यार्थी को उसमें अपनी बात रखने में संकोच हो सकता है।
आर्थिक अंतर भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है।
एक विद्यार्थी के लिए बाहर खाना, महँगे उपकरण खरीदना या किसी अतिरिक्त पाठ्यक्रम में शामिल होना सामान्य हो सकता है, जबकि दूसरा विद्यार्थी हर खर्च सोच-समझकर करता है। एक के परिवार में इंजीनियर, डॉक्टर या विश्वविद्यालय के शिक्षक हो सकते हैं, जबकि दूसरे के परिवार में वह पहला व्यक्ति हो सकता है जो उच्च शिक्षा तक पहुँचा है।
इन अंतर को हम अक्सर केवल सामाजिक विविधता कहकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन विद्यार्थी के स्तर पर यह कभी-कभी हीनता, अकेलेपन और सामाजिक असुरक्षा में बदल सकता है।
इसके साथ जातीय और सामाजिक पहचान भी काम करती है। यदि किसी विद्यार्थी को अपनी भाषा, क्षेत्र, जाति या आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण बार-बार अलग होने का अनुभव होता है, तो उसका असर केवल सामाजिक संबंधों पर नहीं पड़ता। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास और संस्थान से जुड़ाव भी प्रभावित हो सकता है।
इसलिए उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा केवल मानसिक बीमारी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सामाजिक समायोजन भी मानसिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसके बाद आता है प्रतिस्पर्धा का दबाव।
जो विद्यार्थी अपने स्कूल या शहर में हमेशा शीर्ष विद्यार्थियों में रहा था, वह जब देश के सबसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के बीच पहुँचता है तो पहली बार उसे अपने प्रदर्शन की सीमाएँ दिखाई दे सकती हैं। जिस विद्यार्थी के लिए 90 प्रतिशत अंक उपलब्धि थे, वह यहाँ स्वयं को औसत महसूस कर सकता है।
फिर एक कम अंक, एक असफल परीक्षा, बैकलॉग या किसी विषय में लगातार कठिनाई केवल पढ़ाई की समस्या नहीं रह जाती। विद्यार्थी उसे अपनी क्षमता, अपने भविष्य और कभी-कभी अपने पूरे अस्तित्व से जोड़ने लगता है।
यहीं असफलता का भय, पूर्णतावाद और आत्मसम्मान का संकट पैदा हो सकता है।
परिवार की अपेक्षाएँ इस दबाव को और बढ़ा सकती हैं। कई परिवारों के लिए बच्चे का किसी प्रतिष्ठित संस्थान में पहुँचना वर्षों के संघर्ष का परिणाम होता है। विद्यार्थी को लगता है कि उसके पीछे परिवार की आर्थिक कुर्बानी और सामाजिक उम्मीदें खड़ी हैं। ऐसे में असफलता उसे केवल अपनी नहीं, परिवार की असफलता लग सकती है।
और जब विद्यार्थी अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं करता, तो समस्या भीतर ही भीतर बढ़ती रहती है।
इसलिए प्रश्न यह है कि क्या हमारी प्रवेश व्यवस्था इस पूरे मानवीय पक्ष को समझती है?
वर्तमान प्रवेश परीक्षाएँ मुख्यतः अकादमिक क्षमता मापती हैं। विद्यार्थी ने कितना पढ़ा, कितने प्रश्न हल किए और परीक्षा में कितना अच्छा प्रदर्शन किया—इसी आधार पर चयन होता है।
लेकिन उच्च शिक्षा में सफलता के लिए क्या केवल अकादमिक क्षमता पर्याप्त है?
क्या यह जानना भी आवश्यक नहीं कि विद्यार्थी की उस विषय में वास्तविक रुचि क्या है? वह दबाव में कैसे प्रतिक्रिया करता है? असफलता को कैसे देखता है? नए सामाजिक वातावरण में उसका समायोजन कैसा हो सकता है? क्या वह आवश्यकता पड़ने पर सहायता माँगता है? क्या उसमें समस्या से निपटने की पर्याप्त क्षमता है?
इसीलिए प्रवेश परीक्षा में मनोवैज्ञानिक अभिरुचि और समायोजन क्षमता के वैज्ञानिक आकलन पर विचार किया जाना चाहिए।
लेकिन इसका उद्देश्य किसी विद्यार्थी को मानसिक रूप से 'योग्य' या 'अयोग्य' घोषित करना नहीं होना चाहिए। मनोवैज्ञानिक परीक्षण को चयन की कठोर छँटाई का उपकरण बनाना खतरनाक होगा। इसका उद्देश्य विद्यार्थी को समझना होना चाहिए।
यदि किसी विद्यार्थी में अत्यधिक तनाव से निपटने में कठिनाई दिखाई देती है, तो उसे प्रवेश से बाहर करने के बजाय संस्थान को यह पता होना चाहिए कि उसे अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
अर्थात प्रवेश परीक्षा का दर्शन थोड़ा बदलना होगा।
प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि “कौन प्रवेश पाने योग्य है?” बल्कि यह भी होना चाहिए कि “प्रवेश पाने वाले विद्यार्थी को सफल और सुरक्षित रखने के लिए संस्था को क्या जानना चाहिए?”
प्रवेश के बाद विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
हर बड़े उच्च शिक्षण संस्थान में स्थायी Student Mental Health Centre होना चाहिए। वहाँ प्रशिक्षित काउंसलर और मनोवैज्ञानिक नियमित रूप से उपलब्ध हों। गंभीर मामलों के लिए मनोचिकित्सक की विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध हो और आवश्यकता पड़ने पर अच्छे मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों से रेफरल की व्यवस्था हो।
बड़े आवासीय परिसरों में 24 घंटे की संकट-सहायता व्यवस्था भी होनी चाहिए।
लेकिन केवल कमरे में काउंसलर बैठा देना पर्याप्त नहीं है।
कई विद्यार्थी मानसिक परेशानी के बावजूद मदद लेने नहीं जाते। उन्हें डर होता है कि उन्हें कमजोर समझा जाएगा, उनकी निजता सार्वजनिक हो जाएगी या उनके भविष्य पर इसका असर पड़ेगा। इसलिए काउंसलिंग व्यवस्था गोपनीय, सहज और गैर-कलंककारी होनी चाहिए।
शिक्षकों, वार्डनों और छात्र-मेंटर्स को भी प्रारंभिक संकेत पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। किसी विद्यार्थी का अचानक सामाजिक रूप से अलग हो जाना, पढ़ाई में असामान्य गिरावट, लगातार निराश रहना या संकट के संकेत देना केवल अनुशासन अथवा अकादमिक समस्या मानकर छोड़ देना उचित नहीं है।
लेकिन यहाँ भी हमें सावधान रहना होगा।
हर परेशान विद्यार्थी मानसिक रोगी नहीं होता। कभी समस्या का कारण आर्थिक होता है, कभी आवास का, कभी पारिवारिक, कभी सामाजिक और कभी अकादमिक। इसलिए काउंसलिंग को हर समस्या का एकमात्र समाधान बनाना भी गलत होगा।
यदि विद्यार्थी आर्थिक कठिनाई से गुजर रहा है तो आर्थिक सहायता चाहिए। यदि हॉस्टल असुरक्षित या अनुपयुक्त है तो हॉस्टल व्यवस्था सुधारनी होगी। यदि भाषा या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण वह अलग-थलग पड़ रहा है तो उसे समायोजन और संवाद का अवसर देना होगा। यदि भेदभाव की शिकायत है तो उसकी निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए।
काउंसलिंग संस्थागत समस्याओं का विकल्प नहीं हो सकती।
विश्वविद्यालयों को यह भी स्वीकार करना होगा कि छात्रावास केवल रहने की जगह नहीं है। वह विद्यार्थियों के सामाजिक और मानसिक जीवन का बड़ा हिस्सा है। इसलिए अलग-अलग प्रदेशों, भाषाओं और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए विद्यार्थियों के बीच संवाद बढ़ाने वाले कार्यक्रम, मेंटरिंग और सहपाठी-सहायता व्यवस्था विकसित करनी होगी।
यहाँ भारत की विविधता को समस्या के रूप में नहीं, सीखने के अवसर के रूप में देखना होगा।
एक विद्यार्थी जब दूसरे प्रदेश के विद्यार्थी के साथ रहता है, उसकी भाषा सीखता है, उसके भोजन और संस्कृति को समझता है, तब विश्वविद्यालय केवल डिग्री नहीं दे रहा होता—वह एक व्यापक भारतीय समाज से परिचय करा रहा होता है।
लेकिन इसके लिए संस्थान को समायोजन की प्रक्रिया को स्वतः होने वाली चीज मानने के बजाय उसे शैक्षणिक और सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।
छात्र आत्महत्या की रोकथाम इसलिए केवल घटना के बाद की प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए। इसकी शुरुआत प्रवेश प्रक्रिया से होनी चाहिए।
पहला स्तर—प्रवेश।
अकादमिक योग्यता के साथ विद्यार्थी की रुचि और मनोवैज्ञानिक-सामाजिक समायोजन की आवश्यकताओं को समझने की व्यवस्था हो।
दूसरा स्तर—समायोजन।
नए विद्यार्थियों के लिए मजबूत ओरिएंटेशन, मेंटरिंग और सामाजिक-सांस्कृतिक संवाद की व्यवस्था हो।
तीसरा स्तर—निरंतर मानसिक स्वास्थ्य सहायता।
स्थायी काउंसलर, मनोवैज्ञानिक और आवश्यकता के अनुसार मनोचिकित्सक उपलब्ध हों।
चौथा स्तर—संस्थागत सुरक्षा।
आर्थिक सहायता, सुरक्षित आवास, भेदभाव-रोधी व्यवस्था और शिकायतों के निष्पक्ष समाधान की प्रणाली हो।
पाँचवाँ स्तर—संकट सहायता।
गंभीर संकट में तत्काल विशेषज्ञ और आपात सहायता उपलब्ध हो।
यह पूरी व्यवस्था एक बात को स्वीकार करने से शुरू होगी कि विश्वविद्यालय में प्रवेश केवल परीक्षा पास करना नहीं है। यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संक्रमण भी है।
एक युवा विद्यार्थी अपने घर, परिवार, शहर और पुराने सामाजिक संसार से निकलकर एक नए संसार में आता है। वह यहाँ केवल विषय नहीं पढ़ता; वह स्वयं को भी नए सिरे से बनाता है।
इसलिए उच्च शिक्षा संस्थानों की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने विद्यार्थी प्रवेश पाए, कितने पास हुए और कितनों को नौकरी मिली।
यह भी पूछा जाना चाहिए—
कितने विद्यार्थी इस यात्रा में सुरक्षित रहे? कितनों को संकट के समय सहायता मिली? और क्या किसी विद्यार्थी को यह महसूस हुआ कि वह इस विशाल संस्थान में बिल्कुल अकेला है?
आईआईटी जैसे संस्थान देश की प्रतिभा के बड़े केंद्र हैं। वहाँ पहुँचने वाले विद्यार्थियों से देश को बहुत उम्मीदें होती हैं। लेकिन प्रतिभा को केवल चुन लेना पर्याप्त नहीं है।
प्रतिभा की पहचान प्रवेश परीक्षा करती है; प्रतिभा का निर्माण शिक्षा करती है; लेकिन प्रतिभा को सुरक्षित रखना पूरे संस्थान की जिम्मेदारी है।
छात्र आत्महत्या की प्रत्येक घटना के बाद केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि उस विद्यार्थी के साथ क्या हुआ। हमें यह भी पूछना होगा कि हमारी व्यवस्था में ऐसा कौन-सा खाली स्थान था, जहाँ वह अपनी परेशानी लेकर पहुँच नहीं सका।
शायद यही प्रश्न भविष्य की उच्च शिक्षा को अधिक मानवीय बनाने की शुरुआत हो सकता है।
डॉ. अचल पुलस्तेय एक बहुविषयक विद्वान, लेखक, चिंतक और लोक अध्येता हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है।
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