पद-पेशा और लिंग बोधक भेद: क्या हिंदी व्याकरण में सुधार की जरूरत है ?

आज जब हमारे देश के सर्वोच्च संवैधानिक, न्यायिक और प्रशासनिक पदों पर यह लिंग-रहित व्यवस्था पूरी तरह स्वाभाविक, व्यावहारिक, सम्मानजनक और तर्कसंगत लगती है, तो फिर सामाजिक और शैक्षणिक जीवन में 'अध्यापक-अध्यापिका', 'संचालक-संचालिका', 'लेखक-लेखिका', 'कवि-कवयित्री' या 'चित्रकार-चित्रकारिन' जैसी परंपरानुकूल भाषाई विभाजक व्यवस्था को ढोते रहने का क्या औचित्य रह जाता है?
Public Discourse
Published: Septenber 04, 2026 | Author: अचल पुलस्तेय

Language, Designation, and Gender: Is it Time for a Grammatical Reform?

This analytical essay addresses the deep-seated gender bias embedded in language, specifically concerning occupational titles and designations. Inspired by a real-life observation at a literary symposium—where a female host was deliberately addressed with the gendered term 'Sanchalika' (female coordinator) instead of the generic title 'Sanchalak'—the author questions the necessity of attributing biological gender to professional positions in contemporary society.
The article highlights that key constitutional and administrative titles in India, such as 'President' (Rashtrapati), 'Prime Minister' (Pradhanmantri), 'Judge' (Nyayadhish), and 'Doctor' (Chikitsak), function perfectly as gender-neutral designations without diminishing their authority or clarity. However, conventional terms like Adhyapak/Adhyapika (teacher) or Lekhak/Lekhika (writer) stem from a historically patriarchal framework where default terms belonged to men, and feminine suffixes were later appended to denote women as 'exceptions'.
Drawing parallels with global linguistic trends—such as the transition in English from Chairman to Chairperson or the universal use of Actor and Author—the essay advocates for institutionalizing gender-neutral titles in Hindi. By keeping the designation neutral and reflecting gender solely through verb inflections (e.g., "The teacher is taking her class"), language can align with modern values of equality, inclusivity, and professional dignity.

हाल ही में देश के एक प्रतिष्ठित साहित्यिक आयोजन में सम्मिलित होने का अवसर मिला। मंच पर प्रकांड विद्वान, साहित्यकार, भाषाविद् और विश्वविद्यालयीन प्राध्यापक उपस्थित थे। संपूर्ण कार्यक्रम का अत्यंत सुचारू, गरिमामय और बौद्धिक संचालन एक विदुषी महिला द्वारा किया जा रहा था। आयोजन अपने विचार-प्रवाह के साथ आगे बढ़ रहा था, तभी मंच पर आए एक वरिष्ठ वक्ता ने अपने संबोधन के दौरान महिला संचालक का आभार व्यक्त करते हुए 'संचालिका' शब्द पर विशेष और मुखर बल दिया।

श्रोतादीर्घा में बैठे-बैठे यह शब्द मन में एक गहरा खटका पैदा कर गया। विचार आया कि जब हम इक्कीसवीं सदी के एक आधुनिक, समतामूलक और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण का दावा कर रहे हैं, तब भी हम किसी व्यक्ति के प्रशासनिक, बौद्धिक या सार्वजनिक दायित्व को उसके जैविक लिंग से जोड़कर देखने के इतने आग्रही क्यों हैं? आखिर क्यों किसी व्यक्ति की विशेषज्ञता और भूमिका के ऊपर उसकी लिंग-आधारित पहचान को हावी कर दिया जाता है? यह प्रश्न केवल एक शब्द के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी भाषाई संरचना, सामाजिक पूर्वाग्रहों और व्याकरण के समकालीन नवीनीकरण की आवश्यकता से जुड़ा हुआ एक अत्यंत गंभीर विमर्श है।

किसी भी संस्था, आयोजन, व्यवस्था या व्यवसाय में 'पद' (Office or Designation) का सीधा संबंध उस दायित्व को निभाने वाली योग्यता, क्षमता, उत्तरदायित्व और अधिकार से होता है—व्यक्ति के स्त्री या पुरुष होने से नहीं। यदि हम अपनी प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था पर दृष्टि डालें, तो हम पाते हैं कि भारतीय संविधान और राजभाषा प्रणाली ने कई महत्वपूर्ण पदों को पूरी तरह लिंग-निरपेक्ष (Gender-Neutral) और उभयलिंगी रूप में स्वीकार किया है। उदाहरण के लिए— 'राष्ट्रपति', 'प्रधानमंत्री', 'न्यायाधीश', 'थानेदार', 'जिलाधिकारी', 'चिकित्सक', 'संपादक' या 'पुलिस' जैसे शब्द किसी लिंग विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करते। जब श्रीमती इंदिरा गांधी देश की शीर्ष राजनीतिक सत्ता पर आसीन हुईं, तो उनके पद के लिए 'प्रधानमंत्रिणी' जैसा कोई कृत्रिम शब्द नहीं गढ़ा गया। इसी प्रकार, जब आदरणीय द्रौपदी मुर्मू जी ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की शपथ ली, तो उन्हें 'राष्ट्रपति' ही संबोधित किया गया, 'राष्ट्रपत्नी' नहीं।

यदि हमारे देश के सर्वोच्च संवैधानिक, न्यायिक और प्रशासनिक पदों पर यह लिंग-रहित व्यवस्था पूरी तरह स्वाभाविक, व्यावहारिक, सम्मानजनक और तर्कसंगत लगती है, तो फिर सामाजिक और शैक्षणिक जीवन में 'अध्यापक-अध्यापिका', 'संचालक-संचालिका', 'लेखक-लेखिका', 'कवि-कवयित्री' या 'चित्रकार-चित्रकारिन' जैसी परंपरानुकूल भाषाई विभाजक व्यवस्था को ढोते रहने का क्या औचित्य रह जाता है?

व्याकरणिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से देखें, तो हिंदी तथा संस्कृत से उत्पन्न कई अन्य भारतीय भाषाएँ पारंपरिक रूप से लिंग-आधारित (Gendered Languages) रही हैं। इतिहास के एक लंबे कालखंड तक सार्वजनिक, वैचारिक, राजनीतिक और व्यावसायिक क्षेत्रों पर केवल पुरुषों का वर्चस्व रहा। परिणामस्वरूप, भाषा में जो 'मूल शब्द' (Default Terms) बने, वे पुरुषों को ध्यान में रखकर गढ़े गए थे। कालांतर में जब महिलाओं ने अपनी मेधा और संघर्ष के बल पर इन बंद दरवाजों को तोड़ा और सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रवेश किया, तो हमारी भाषा-व्यवस्था ने उन्हें मूल पद का हिस्सा मानने के बजाय एक 'अपवाद' या 'विशेष स्थिति' के रूप में देखा। इसी मानसिकता के तहत मुख्य शब्दों के पीछे प्रत्यय (जैसे -इका, -इत्री, -ई) जोड़कर कृत्रिम स्त्रीलिंग शब्द गढ़े गए।

परिणाम यह हुआ कि जब आज भी हम समाज में 'महिला डॉक्टर', 'महिला वैज्ञानिक', 'महिला पायलट' या 'लेखिका' जैसे शब्दों का सचेत प्रयोग करते हैं, तो अवचेतन रूप से हम यह रूढ़िवादी संदेश प्रसारित कर रहे होते हैं कि मूल पद (डॉक्टर, वैज्ञानिक, पायलट, लेखक) वास्तव में पुरुषों की जागीर है और महिला का उस पद पर होना एक अनूठी या अपवादात्मक घटना है। यह भाषाई विभाजन, अनजाने में ही सही, समाज में पहले से व्याप्त लिंग-भेद की परंपरा और पुरुष-प्रधान सोच को निरंतर खाद-पानी देने का काम करता है।

आज वैश्विक परिदृश्य पर भाषाओं का तेजी से पुनरावलोकन हो रहा है। विश्व भर की आधुनिक भाषाओं में समावेशी भाषा (Inclusive Language) और लिंग-निरपेक्ष शब्दावली को संस्थागत रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। अंग्रेजी भाषा का ही उदाहरण लें, तो वहाँ Chairman के स्थान पर Chairperson, Spokesman के स्थान पर Spokesperson, और Policecat/Policeman के स्थान पर Police Officer का प्रयोग सर्वस्वीकार्य मानक बन चुका है। यहाँ तक कि अभिनय और लेखन के क्षेत्र में भी Actress या Authoress जैसे शब्दों को त्यागकर Actor और Author का प्रयोग सभी लिंगों के लिए समान रूप से किया जाने लगा है।

भाषा कोई स्थिर, जड़ या अपरिवर्तनीय शिला नहीं होती; वह एक बहती हुई जीवंत नदी के समान है, जो समाज के मूल्यों, विचारों और विकास यात्रा के साथ अपने व्याकरणिक मार्ग बदलती रहती है। जब समाज में लिंग के आधार पर भेद करना अनैतिक, असंवैधानिक और अप्रासंगिक माना जा रहा है, तो भाषा के व्याकरण को भी उस प्रगतिशील चेतना का दर्पण बनना होगा।

इस भाषाई विसंगति को दूर करने के लिए हमें कुछ व्यावहारिक और संस्थागत कदम उठाने की आवश्यकता है:

  • पदों का मानकीकरण: केंद्रीय राजभाषा विभाग, हिंदी अकादमियों और शिक्षा बोर्डों को प्रशासनिक व व्यावसायिक शब्दावली में स्पष्ट रूप से यह नियम घोषित करना चाहिए कि 'शिक्षक', 'संचालक', 'लेखक', 'संपादक', 'मैनेजर' आदि केवल पदनाम (Designations) हैं, जो पूरी तरह उभयलिंगी हैं।
  • सचेत भाषाई व्यवहार: भाषा का वास्तविक परिवर्तन केवल व्याकरण की पुस्तकों से नहीं, बल्कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग, साहित्यकारों, पत्रकारों और मंच-संचालकों के सचेत प्रयोग से आता है। मंचों और लेखों में 'संचालक' या 'शिक्षक' शब्द का प्रयोग बिना किसी लिंग-भेद के सहज रूप से किया जाना चाहिए।
  • संज्ञा और क्रिया का व्याकरणिक संतुलन: हिंदी भाषा में यह अद्भुत सामर्थ्य है कि वह मुख्य संज्ञा (पदनाम) को अपरिवर्तित रखते हुए भी क्रिया (Verb) और विशेषण के माध्यम से लिंग की स्पष्ट अभिव्यक्ति कर सकती है। जैसे— "न्यायाधीश फैसला सुना रही हैं" या "अध्यापक कक्षा में पढ़ा रही हैं"। इस प्रयोग से पद का तटस्थ और निष्पक्ष रूप भी बना रहता है और वाक्य संरचना भी सटीक रहती है।
  • भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का एक माध्यम मात्र नहीं है, बल्कि वह हमारे सोचने के ढर्रे और सामाजिक दृष्टिकोण का निर्माण भी करती है। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक भेद-रहित, न्यायसंगत और समतामूलक समाज सौंपना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा को भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होगा। किसी भी पद का एकमात्र पैमाना योग्यता, निष्ठा और कार्य-कुशलता होना चाहिए, न कि व्यक्ति का लिंग। अब समय आ गया है कि भाषाविद्, साहित्यकार और नीति-निर्धारक एक मंच पर आएँ और हिंदी व्याकरण को आधुनिक युग की माँग के अनुरूप अधिक व्यावहारिक, समावेशी और लिंग-निरपेक्ष बनाएँ।

    यह लेख किनके लिए है? (Target Audience)

    साहित्यकार, भाषाविद्, शोधकर्ता, छात्र, प्रशासनिक अधिकारी,पत्रकार,संपादक एवं और सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श में रुचि रखने वाले पाठक।

    About the Author

    डॉ. अचल पुलस्तेय एक बहुविषयक विद्वान, लेखक, चिंतक और लोक अध्येता हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है।

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