बालाघाट में आदिम वैद्य बैगा बच्चों की मौत: बीमारी या खनन-जनित पर्यावरण संकट?

आदिम वैद्य कहे जाने वाले बैगा समुदाय के बच्चों की मौतें बीमारी से आगे बढ़कर उस विकास मॉडल पर सवाल उठाती हैं, जिसने उनके जंगल, जल, भोजन और जीवन-परंपरा को संकट में डाल दिया है। Baiga: The Indigenous Healers Dying in the Shadow of Development  
Editorial Analysis
Published: September 15, 2026 | Editor in Chief
Baiga Tribal Children Deaths in Balaghat: Disease, Mining and Environmental Crisis

Abstract: The deaths of Baiga tribal children in Balaghat, Madhya Pradesh, raise a deeper question than the immediate causes of disease. The Baiga are traditionally associated with forests, medicinal plants, indigenous knowledge and a nature-centred way of life. Yet the community is now facing disease, malnutrition, contaminated water and inadequate healthcare. Balaghat’s mineral-rich landscape has also experienced extensive mining activity, making environmental health an essential part of the investigation. The crisis exposes a troubling contradiction: communities that preserved ecological and medicinal knowledge for generations are increasingly paying the human cost of a development model built on the extraction of their natural environment.

बैगा : आदिम वैद्य समुदाय की संतानो की मौत क्यों ?
मध्य प्रदेश के बालाघाट में बैगा आदिवासी समुदाय के बच्चों की लगातार हो रही मौतें केवल एक स्थानीय स्वास्थ्य संकट नहीं हैं। यह उस विकास मॉडल के सामने खड़ा एक असहज सवाल है, जिसे हम आधुनिक सभ्यता की उपलब्धि मानते हैं। अलग-अलग रिपोर्टों में मृत बच्चों की संख्या अलग बताई गई है—हालिया जनहित याचिका में 25 बच्चों की मौत का मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सामने आया है, जबकि कुछ मीडिया रिपोर्टें इससे अधिक संख्या का दावा कर रही हैं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब भी मांगा है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल केवल यह नहीं है कि कितने बच्चे मरे और किस बीमारी से मरे। असली सवाल यह है कि एक ऐसा समुदाय, जिसकी पहचान ही जंगल, प्रकृति और पारंपरिक उपचार-ज्ञान से जुड़ी रही है, आज इतनी असुरक्षित स्वास्थ्य स्थिति में क्यों पहुंच गया?

‘बैगा’ शब्द की उत्पत्ति को ‘वैद्य’ से जोड़ने की मान्यता मिलती है। मध्य प्रदेश पर्यटन भी इस समुदाय के बारे में लिखता है कि वे जंगल की वनस्पतियों और जीव-जगत के औषधीय गुणों का गहरा ज्ञान रखते हैं, संभव है आदिम शब्द ‘बैगा’ ही संस्कृति-हिन्दी में आकर वैद्य बन गया हो।

यानी जिस सभ्यता ने जंगल को केवल लकड़ी, खनिज या जमीन के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे जीवन और औषधि का स्रोत माना, उसी समुदाय के बच्चे आज संक्रमण, कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मर रहे हैं। यह विरोधाभास हमें बैगा संस्कृति को समझने के लिए मजबूर करता है।

बैगा जीवन प्रकृति से गहरे संबंध पर आधारित रहा है। जंगल उनके लिए केवल संसाधन नहीं, भोजन, औषधि, संस्कृति और जीवन का आधार है। कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज उनके पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहे हैं। मध्य प्रदेश पर्यटन भी बैगा खान-पान में कोदो और कुटकी की प्रमुखता तथा उनके वन-आधारित जीवन का उल्लेख करता है।

उनकी पारंपरिक कृषि पद्धति में जंगल और जमीन के साथ एक अलग तरह का संबंध दिखाई देता है। वे प्रकृति के साथ संघर्ष करने के बजाय उसके चक्र के भीतर जीवन खोजते रहे। यही कारण है कि बैगा संस्कृति को समझना केवल किसी आदिवासी समुदाय की संस्कृति को समझना नहीं है, यह भारतीय उपमहाद्वीप की उन पुरानी जीवन-पद्धतियों को समझना भी है, जिनमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं मानता था।

आज उसी बालाघाट में बच्चों की मौतें हो रही हैं।

रिपोर्टों में मलेरिया, खसरा, त्वचा संक्रमण, कुपोषण, दूषित पानी और कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे अनेक कारण सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रभावित गांवों में बड़ी संख्या में बच्चे अस्पताल पहुंचे हैं और स्वास्थ्य संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है।

लेकिन यहां एक और सवाल पूछा जाना चाहिए—इन बीमारियों के पीछे पर्यावरणीय बदलाव की कितनी भूमिका है? बालाघाट खनिज संपदा वाला क्षेत्र है। यहां लंबे समय से खनन गतिविधियां होती रही हैं। इसलिए यह जांच केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पानी की गुणवत्ता क्या है? मिट्टी में भारी धातुओं की स्थिति क्या है? खनन क्षेत्रों और प्रभावित गांवों के जलस्रोतों में क्या परिवर्तन आया है? स्थानीय भोजन, जंगल और वनस्पतियों की उपलब्धता कितनी बदली है? बच्चों और माताओं में पोषण की स्थिति क्या है? और क्या इन सभी परिवर्तनों का स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा है? इन सवालों का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए।

अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि खनन ही इन मौतों का प्रत्यक्ष कारण है। लेकिन यह कहना भी उतना ही गलत होगा कि पर्यावरण और खनन के सवाल को बीमारी की जांच से बाहर रखा जाए। यदि पानी दूषित है, यदि भोजन की विविधता कम हुई है, खनन से उड़ती धूल उनकी साँसों के कमजोर कर रही है, यदि जंगल पीछे हटे हैं और यदि पारंपरिक जीवन के आधार कमजोर हुए हैं, तो स्वास्थ्य संकट को केवल ‘संक्रमण’ कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ी विडंबना यही है कि विकास की कीमत हमेशा बराबर नहीं बंटती।

खनिज किसी दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल बनता है। बिजली, सड़क, कारखाने और शहर आधुनिक भारत की प्रगति के प्रतीक बनते हैं। लेकिन जिस भूगोल से यह संपदा निकलती है, वहां रहने वाले समुदाय को क्या मिलता है? यदि उसे सुरक्षित पानी, पोषण, अस्पताल, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन नहीं मिलता, तो फिर विकास किसके लिए है?

बैगा समुदाय के साथ यही सवाल खड़ा होता है।

एक तरफ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है और दूसरी तरफ एक दूरस्थ आदिवासी बस्ती में बच्चे ऐसे संक्रमणों से मर रहे हैं जिनसे समय पर उपचार और पर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के जरिए मौतों को रोका जा सकता था। यह केवल बीमारी की विफलता नहीं, व्यवस्था की विफलता है।

और यहां ‘आदिम वैद्य’ की विडंबना और गहरी हो जाती है। जिस समुदाय के पारंपरिक ज्ञान में जंगल की औषधीय वनस्पतियों की पहचान पीढ़ियों से सुरक्षित रही, वही समुदाय आज अपने बच्चों को बचाने के लिए आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के दरवाजे पर निर्भर है। उसे आधुनिक चिकित्सा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए—बल्कि आधुनिक चिकित्सा और उसके पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान, दोनों को सम्मान के साथ समझना चाहिए।

बैगा बच्चों की मौतों की जांच इसलिए केवल यह पता लगाने के लिए नहीं होनी चाहिए कि उन्हें कौन-सी बीमारी हुई। जांच को यह भी पता लगाना चाहिए कि बैगा बच्चों की मौतें हमें यही चेतावनी दे रही हैं। यह केवल बालाघाट की बीमारी नहीं है। यह उस विकास की बीमारी का संकेत हो सकती है जिसमें प्रकृति से लिया जाता है, लेकिन प्रकृति और उसके साथ रहने वाले लोगों को लौटाया बहुत कम जाता है।

आदिम वैद्य की संतानों को बचाना केवल बैगा समुदाय को बचाना नहीं है। यह उस भारत को बचाने का सवाल है, जिसने जंगलों से जीवन, भोजन और औषधि का ज्ञान सीखा था।

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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