A Historical and Archaeological Study of Sarnath: From Rishipattana to a Buddhist Pilgrimage Site
Abstract
Sarnath was previously a dense forest where deer used to roam. At that time, it was known as 'Rishipattan' and 'Mrigadav'. After attaining enlightenment, Gautam Buddha delivered his first sermon here. During the reign of Emperor Ashoka, significant construction work took place at this site. The national emblem of India, featuring the lion capital, was adopted from the top of the Ashoka Pillar at Sarnath. The 'Dhamek Stupa' located here continues to reflect the antiquity of Sarnath to this day. Over time, due to foreign invasions and mutual religious conflicts, the significance of Sarnath declined. The place came to be called Sarnath due to the presence of the Sarangnath Mahadev Temple in Rishipattan. Its ancient name was Rishipattan (Isipatana or Mrigadav, meaning 'Deer Park'). The term Rishipattan literally means 'the fall of a sage', referring to the place where a previous Buddha attained Nirvana upon realizing the future enlightenment of Gautam Buddha.
सारांश
सारनाथ में पहले घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन' और 'मृगदाव' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण कार्य हुए। सिंहों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धामेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था। ऋषिपत्तन में सारंगनाथ महादेव मन्दिर होने के कारण इस स्थान का नाम सारनाथ पड़ा। इसका प्राचीन नाम ऋषिपत्तन (इसिपतन या मृगदाव) (हिरनों का जंगल) था। ऋषिपत्तन से तात्पर्य 'ऋषि का पतन' से है जिसका आशय है वह स्थान जहाँ किसी एक बुद्ध ने गौतम बुद्ध भावी संबोधि को जानकर निर्वाण प्राप्त किया था।
1. प्रस्तावना : भौगोलिक स्थिति एवं धार्मिक महत्त्व
सारनाथ में पहले घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन' और 'मृगदाव' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण कार्य हुए। सिंहों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धामेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था।
2. नामकरण की पृष्ठभूमि एवं प्राचीन परंपराएँ
3. प्रथम उपदेश: धर्मचक्रप्रवर्तन
4. सारनाथ के प्रमुख स्तूप
4.1 धमेख स्तूप
सर्वप्रथम अलेक्जेण्डर कनिंघम द्वारा सारनाथ उत्खनन कार्य करवाया गया था। यहां घने जंगलों के बीच धमेख स्तूप प्राप्त हुआ। यह स्तूप ठोस गोलाकार बुर्ज की भाँति है जिसका व्यास 28.35 मीटर तथा ऊँचाई 39 मी० है। यह स्तूप सम्पूर्ण अवस्था में स्थित है। स्तूप के चारों ओर समान दूरी पर आठ आले हैं जिसमें पहले बुद्ध मूर्तियां रखी हुयी थी। आज भी उनके आसन परिलक्षित होते हैं। उत्खनन में ऐसी मूर्तियाँ पायी गयी हैं जो आसन रहित हैं। स्तूप का निचला भाग सुन्दर खुदे प्रस्तरों से आच्छादित हैं तथा ऊपरी भाग ईट का बना है। यह स्तूप उस स्थान पर बना है जहां बुद्ध ने प्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन किया था। यद्यपि इस स्तूप से धातु अवशेष अब तक प्राप्त नहीं हुए हैं किन्तु छठीं और सातवीं की लिपि में अंकित एक लेख शीर्ष भाग के तीन फुट नीचे प्राप्त हुआ था जिसमें यह गाथा उल्लिखित हैं- "ये धम्मा हेतुप्पभवा, हेतुतेसं तथागतो आह। तेसं च यो निरोधो, एवंवादी महासमनो।।" अभिलेख से यह भी स्पष्ट है कि चौथी से सातवीं सदी तक सारनाथ सर्वास्तवादी भिक्षुओं की प्रमुखता थी।
4.2 धर्मराजिका स्तूप
यह स्तूप भी सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था। इस स्तूप का केवल निचला स्तर अर्थात केवल नींव ही बचा हुआ है। इस स्तूप में भगवान बुद्ध के अस्थि कलश विद्यमान थे। इतिहासकारों का मानना है कि इस स्तूप की मरम्मत कुषाण काल में हुआ था। पाल वंश के शासक महीपाल ने भी इसका जीर्णोद्धार कराया था। सारनाथ में बोधिसत्व की दो प्रसिद्ध मूर्तियां है। एक मूर्ति कनिष्क के द्वारा बनवाया गया था एवं दूसरी विश्व प्रसिद्ध मूर्ति धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में है जो गुप्तकालीन है।
4.3 चौखण्डी स्तूप
यह स्तूप सारनाथ से दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित है। पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि यह स्तूप किसी समय बडा स्तूप था किन्तु अब अठकोने घर के साथ 84 फूट ऊँचा है।
5. विहार
5.1 विहार संख्या प्रथम
कन्नौज की महारानी कुमार देवी (गहड़वाल राजा गोविन्दचन्द्र की पत्नी) ने धर्मचक्र जिन विहार का निर्माण करवाया था। इस विहार से नारी मूर्तियां मिली हैं। विहार के प्रांगण में कुआं होने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त उनके चीवर रखने के खम्भे भी प्राप्त हुए हैं।
5.2 विहार संख्या द्वितीय
यह विहार संख्या प्रथम के पश्चिमोत्तर दिशा पर स्थित है इसके मध्य में बड़ा प्रांगण है। इसमें 9 बड़े कोठरी के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त यहां पर कुआं भी प्राप्त हुए हैं।
5.3 विहार संख्या तृतीय
यह विहार धर्मचक्र जिन विहार के ठीक पूरब दिशा में स्थित था। इसमें दक्षिण एवं पश्चिम की ओर कोठरियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
5.4 विहार संख्या चतुर्थ
यह विहार संख्या तृतीय के दक्षिण-पूर्व एवं द्वितीय प्रांगण के मध्य स्थित था। दोनों प्रवेश द्वारों के मध्य चतुर्थ विहार स्थित था। इसमें उत्तर पूर्व की ओर तीन-तीन कोठरियां होने के अवशेष विद्यमान हैं।
5.5 विहार संख्या पंचम
इस प्रांगण के चारों ओर 82 फीट लम्बी एवं 8 फीट चौड़ी कोठरियां भिक्षु संघ के लिए बनी थी, एक कुआं भी भिक्षुओं के उपयोग के लिए था। यह विहार मूलगंधकुटी विहार से सम्बन्धित था।
5.6 विहार संख्या षष्ठम
धमेख स्तूप के पास पश्चिम दिशा में यह विहार स्थित था। किट्टो के द्वारा इस विहार का उत्खनन कार्य प्रारम्भ कराया गया था तथा इस विहार को औषधालय बताया गया है क्योंकि कुछ औषधि कूटने के पात्र प्राप्त हुए हैं।
5.7 विहार संख्या सप्तम
यह विहार पंचम विहार के पश्चिम और धर्मराजिका स्तूप से दक्षिण दिशा में स्थित था। इसमें विशाल प्रांगण के अतिरिक्त कुआं का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
5.8 मूलगंध कुटी विहार
बुद्ध ने सारनाथ में पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश देने के उपरान्त जिस स्थान पर स्वयं निवास किया उस स्थान को ही 'मूलगन्धकुटी विहार' कहा जाता है।
6. संदर्भ
- सारनाथ का इतिहास, भिक्षुधर्म रक्षित, पृ०-1
- ललित विस्तर पृ०-1
- संयुक्त निकाय, खण्ड-4, पृ०-144
- सारनाथ का इतिहास, शांति स्वरूप बौद्ध, पृ० - 68
- सारनाथ का इतिहास, दया राम साहनी, पृ०-5-9
- बौद्ध महातीर्थ, मदन मोहन नागर, पृ०-27
- स्टडीज इन अर्ली बुद्धिस्ट आर्किटेक्चर ऑफ इण्डिया, एच० सरकार, पृ०-58
- सारनाथ का इतिहास, दया राम साहनी, पृ०-88
- वही, पृ०-64
- ह्वेनसांग की भारत यात्रा, ठाकुर प्रसाद शर्मा, पृ०-333
- भारतीय कला की भूमिका, भगवती शरण उपाध्याय, पृ०-24
- धम्मपदअट्ठकथा, 169
- सुत्तनिपातअट्ठकथा, 1-3
- सारनाथ का इतिहास, दया राम साहनी, पृ0-182
- सारनाथ का इतिहास, भिक्षु धर्मरक्षित, पृ०-191
- सारनाथ का इतिहास, वासुदेव शरण अग्रवाल, पृ०-7
- ए गाइड टू सारनाथ, बी० मजुमदार, पृ०-39
- सारनाथ का इतिहास, शांति स्वरूप बौद्ध, पृ०-67
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