Abstract: India’s knowledge tradition extends far beyond the Sanskrit-based classical texts of the Vedas, Upanishads and philosophical schools. Shaiva, Shakta, Tantric, Nath, Siddha, Aghora, folk and regional traditions have preserved diverse forms of experiential, practical, ecological, medical, artistic and social knowledge. Much of this heritage exists in regional languages, oral traditions, manuscripts and community practices. The Indian Knowledge System (IKS) can become truly representative only by critically studying and documenting these diverse knowledge traditions alongside the classical Sanskrit corpus.
भारत की ज्ञान-संपदा केवल वेद, उपनिषद, दर्शन और संस्कृत के शास्त्रीय ग्रंथों में नहीं रही है। भारत में ज्ञान की अनेक धाराएं समानांतर रूप से विकसित हुई हैं। शैव, शाक्त, तांत्रिक, नाथ, सिद्ध, अघोर, लोक और अनेक क्षेत्रीय,आदिवासी परंपराओं ने भारतीय समाज के ज्ञान संसार को अलग-अलग स्तरों पर समृद्ध किया है। इन परंपराओं में दर्शन के साथ साधना, शरीर और चेतना की समझ, चिकित्सा, वनस्पति, धातु-कर्म, कृषि, शिल्प, संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन से जुड़े अनुभव भी संचित हुए हैं। इनमें से बहुत-सा ज्ञान लिखित ग्रंथों में है, लेकिन एक बड़ा हिस्सा गुरु-शिष्य परंपरा, मौखिक स्मृति, लोकाचार और समुदायों के अनुभव में सुरक्षित रहा है।
समस्या यह नहीं है कि वेदों, उपनिषदों या संस्कृत के शास्त्रीय ग्रंथों को भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रमुख स्थान क्यों दिया जा रहा है। वे भारतीय बौद्धिक इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समस्या तब पैदा होती है जब उन्हें ही भारतीय ज्ञान परंपरा का लगभग पर्याय बना दिया जाता है। भारत का ज्ञान इतिहास इससे कहीं अधिक व्यापक और बहु-केंद्रिक है। संस्कृत उसकी एक महत्वपूर्ण भाषा रही है, लेकिन भारत का ज्ञान केवल संस्कृत में नहीं बना। तमिल, बांग्ला, असमिया, ओड़िया, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, अवधी, ब्रज, मैथिली, अपभ्रंश और अनेक अन्य भाषाओं तथा बोलियों ने भी ज्ञान के निर्माण और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
तमिल सिद्ध परंपरा इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। सिद्ध साहित्य में चिकित्सा, औषधीय वनस्पतियों, शरीर, योग और रसायन संबंधी अनेक परंपरागत ज्ञान-सामग्रियां मिलती हैं। इसी तरह बंगाल और असम की शाक्त तथा तांत्रिक परंपराओं का अपना विस्तृत इतिहास है। कामाख्या जैसी परंपराएं केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं हैं; उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आयामों का भी अध्ययन किया जा सकता है। नाथ और सिद्ध परंपराओं ने संस्कृत से बाहर अपभ्रंश और विभिन्न लोकभाषाओं में भी अपनी वैचारिक और साधनात्मक अभिव्यक्ति विकसित की। यदि भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन करना है, तो इन स्रोतों को केवल धार्मिक या लोक-साहित्य की श्रेणी में रखकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा।
भारत के लोक समाज ने भी ज्ञान को केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि अपने जीवन में बचाए रखा। किसान मौसम, मिट्टी, बीज और जल के बारे में पीढ़ियों से अनुभवजन्य ज्ञान विकसित करते रहे। कारीगरों ने धातु, लकड़ी, पत्थर, वस्त्र और मिट्टी के साथ काम करते हुए ऐसी तकनीकें विकसित कीं जिनका ज्ञान अक्सर परिवार और समुदाय के भीतर हस्तांतरित होता रहा। आदिवासी और वनवासी समाजों ने वनस्पतियों, जलस्रोतों, जंगल और स्थानीय पारिस्थितिकी के बारे में व्यापक अनुभव अर्जित किया। इस ज्ञान को यदि केवल ‘लोककला’, ‘परंपरा’ या ‘हस्तशिल्प’ कहकर अलग कर दिया जाए, तो हम उसके भीतर मौजूद ज्ञान-प्रणाली को देखने से चूक जाते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। किसी परंपरा में मौजूद हर दावे को आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित मान लेना भी उचित नहीं होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्मूल्यांकन न तो अंध-गौरव के आधार पर होना चाहिए और न ही पूर्वाग्रह के आधार पर अस्वीकार करने से। आवश्यकता इस बात की है कि परंपरागत दावों, तकनीकों और अनुभवों का ऐतिहासिक, भाषायी, पुरातात्विक और वैज्ञानिक पद्धतियों से अध्ययन किया जाए। जहां प्रमाण मिलते हैं, वहां उनका दस्तावेजीकरण और आगे शोध हो; जहां दावे प्रमाणित नहीं होते, वहां उन्हें उसी रूप में समझा जाए। यही आलोचनात्मक दृष्टि भारतीय ज्ञान परंपरा को गंभीर अकादमिक अध्ययन का विषय बना सकती है।
भारतीय ज्ञान परंपरा के सामने दूसरी बड़ी चुनौती भाषायी है। राष्ट्रीय स्तर पर पाठ्यक्रम तैयार करते समय संस्कृत और अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को व्यवस्थित करना अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन असमिया, बांग्ला, तमिल, ओड़िया या मलयालम की पांडुलिपियों, मौखिक परंपराओं और स्थानीय ज्ञान-स्रोतों को खोजने, संरक्षित करने, अनुवाद करने और उनका संदर्भ सहित अध्ययन करने के लिए अलग संस्थागत प्रयास की आवश्यकता है। यदि यह काम नहीं किया गया तो IKS का राष्ट्रीय ढांचा अनजाने में भी उन्हीं परंपराओं को अधिक दृश्यता देगा जिनके पास पहले से व्यवस्थित लिखित और संस्थागत स्रोत उपलब्ध हैं।
तंत्र, शाक्त, अघोर और वाम परंपराओं के मामले में यह चुनौती और भी बड़ी है। इनके साथ आधुनिक समाज में अनेक पूर्वधारणाएं और सामाजिक संकोच जुड़े हुए हैं। इसलिए इनके अध्ययन को केवल रहस्य, चमत्कार या धार्मिक विवाद के रूप में देखने के बजाय इनके दार्शनिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, भाषायी और साधना-संबंधी पक्षों को अलग-अलग समझने की जरूरत है। इसी प्रकार नाथ और सिद्ध परंपराओं को केवल धार्मिक संप्रदाय के इतिहास तक सीमित करने के बजाय उनके साहित्य, योग, शरीर संबंधी अवधारणाओं, सामाजिक प्रभाव और भाषायी योगदान का अध्ययन किया जा सकता है।
दरअसल भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी एकरूपता नहीं, बल्कि उसकी विविधता रही है। भारत में एक ही समय में अनेक ज्ञान केंद्र और अनेक ज्ञान-पद्धतियां विकसित होती रही हैं। काशी और कांची, नालंदा और तंजावुर, कामाख्या और पुरी, मठ और आश्रम, शास्त्र और लोकगीत, विश्वविद्यालय और कारीगर की कार्यशाला—इन सभी को भारत के ज्ञान इतिहास के अलग-अलग हिस्सों के रूप में देखने की जरूरत है। किसी एक को केंद्र और बाकी को परिधि मान लेने से भारत की वास्तविक बौद्धिक संरचना समझ में नहीं आएगी।
इसलिए IKS का उद्देश्य केवल प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक पाठ्यक्रम में शामिल करना नहीं होना चाहिए। इसका बड़ा उद्देश्य भारत के विविध ज्ञान-स्रोतों की खोज, संरक्षण, आलोचनात्मक अध्ययन और नई पीढ़ी तक उनका हस्तांतरण होना चाहिए। इसके लिए क्षेत्रीय पांडुलिपियों का बड़े पैमाने पर डिजिटलीकरण, विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद, मौखिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण और विश्वविद्यालयों में क्षेत्र-विशेष के IKS अध्ययन केंद्र विकसित किए जा सकते हैं। असम की शाक्त और लोक परंपराओं से लेकर तमिल सिद्ध साहित्य, बंगाल के बाउल और तांत्रिक ज्ञान, ओड़िशा की परंपराओं और हिमालयी समुदायों के पारिस्थितिक ज्ञान तक—हर क्षेत्र को अपने ज्ञान-संसाधनों की पहचान और अध्ययन का अवसर मिलना चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का अर्थ अतीत की किसी एक छवि को राष्ट्र की एकमात्र सांस्कृतिक पहचान बना देना नहीं है। इसका अर्थ भारत के अतीत में मौजूद विविध ज्ञान-धाराओं को सामने लाना है। यदि IKS वास्तव में भारतीय है, तो उसमें शास्त्र के साथ लोक, संस्कृत के साथ क्षेत्रीय भाषाएं, लिखित ग्रंथ के साथ मौखिक परंपरा, दर्शन के साथ अनुभव और केंद्र के साथ परिधि की आवाज भी सुनाई देनी चाहिए।
भारत की ज्ञान परंपरा जितनी विशाल है, उसे उतने ही व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उसे किसी एक भाषा, संप्रदाय या शास्त्रीय परंपरा में समेटने के बजाय उसकी बहुलता को समझना ही भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ सबसे बड़ा न्याय होगा।
Dr. R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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