Abstract
more efficient and cost-effective; however, several serious drawbacks are emerging at the operational level:
Exploitation of Employees: To cut costs, doctors, nurses, and Common Service Center operators are paid low salaries, which degrades the quality of services.
Abdication of Responsibility: Instead of treating complex cases, PPP hospitals frequently refer poor patients to government institutions, imposing an additional financial and mental burden on the patient.
Conflict of Interest: When doctors appointed in public institutions engage in private practice, attention and resources shift toward the private sector.
Privatized Profits, Socialized Risks: If a project succeeds, the profits belong to the private company; however, in cases of failure, employee distress, or complex patient care, the risk falls back on the public system and the citizens.
Marginalization of Citizens: In PPP contracts, citizens (patients/customers) are treated merely as paying units, while their voice and rights become invisible.
Rather than rejecting the PPP model outright, the government must play a strong regulatory role. Frameworks such as service guarantees, fair minimum wages, transparency, independent grievance mechanisms, outcome-based evaluations, and mandatory referral audits must be established to ensure that public services do not become mere tools for private profit.
Keywords:3P Model in India,Public Private Partnership Healthcare,3P Model Editorial, Referral Audit in Hospitals,CSC Banking Issues India,Privatization of Public Services,Healthcare Privatization Risks
सरकारें आजकल सार्वजनिक संस्थानों को अधिक दक्ष, कम खर्चीला और आधुनिक बनाने के नाम पर Public–Private Partnership (3P/PPP) मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। सिद्धांत में यह व्यवस्था आकर्षक दिखाई देती है—सरकार सार्वजनिक संसाधन और नियमन दे, निजी क्षेत्र पूंजी, तकनीक और प्रबंधन क्षमता लगाए और नागरिक को बेहतर सेवा मिले।
लेकिन किसी भी नीति की वास्तविक परीक्षा उसके दस्तावेजों में नहीं, जमीन पर नागरिक के अनुभव में होती है। यहीं से 3P मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
बैंकिंग के जनसेवा केन्द्रों से लेकर अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों तक, कई जगह यह अनुभव सामने आ रहा है कि जिस मॉडल से सेवा की गुणवत्ता और पहुंच बढ़नी थी, वहाँ स्वयं सेवा प्रदाता की आर्थिक और संस्थागत स्थिरता संकट में है। अनेक जनसेवा केन्द्र पर्याप्त आय न होने के कारण बंद हो रहे हैं। दूसरी ओर, दूरदराज का ग्राहक बैंक की नियमित शाखा से वंचित होकर ऐसे केन्द्र पर निर्भर है, जहाँ सेवा की वास्तविक लागत, अतिरिक्त शुल्क और शिकायत की जवाबदेही उसके लिए हमेशा स्पष्ट नहीं होती।
यह स्थिति केवल किसी छोटे कारोबारी की समस्या नहीं है। प्रश्न यह है कि जिस नागरिक को बैंकिंग व्यवस्था तक पहुँचाने के लिए जनसेवा केन्द्र बनाया गया था, क्या वह स्वयं उस व्यवस्था का सबसे कमजोर पक्ष बन गया है?
सेवा की कीमत कौन चुका रहा है?
PPP का मूल तर्क है कि निजी क्षेत्र दक्षता लाएगा। लेकिन दक्षता का अर्थ यदि केवल लागत घटाना है, तो सबसे आसान रास्ता है—कर्मचारी की लागत घटा देना।
यही संकट स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक गंभीर रूप में दिखाई देता है। मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों, तकनीशियनों और अन्य कर्मचारियों से अपेक्षाकृत कम वेतन पर काम लेना संस्थान की तत्काल लागत कम कर सकता है, लेकिन इससे स्वास्थ्य व्यवस्था की दीर्घकालीन गुणवत्ता खतरे में पड़ती है।
कम वेतन, अधिक काम और सीमित सामाजिक सुरक्षा से कर्मचारी असंतुष्ट होता है। हर कर्मचारी भ्रष्ट हो, यह निष्कर्ष गलत होगा; लेकिन ऐसी परिस्थितियाँ अनौपचारिक आय, कमीशन, अनावश्यक शुल्क और अन्य अनैतिक रास्तों के लिए वातावरण अवश्य बना सकती हैं।
जब मरीज आर्थिक और मानसिक रूप से विवश हो, तब छोटी-सी अनियमितता भी शोषण का रूप ले सकती है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि अस्पताल कितने खर्च में चल रहा है। सवाल होना चाहिए—वह किस कीमत पर चल रहा है?
अस्पताल है या रेफरल केन्द्र?
स्वास्थ्य क्षेत्र में PPP की सबसे गंभीर परीक्षा मरीज की जिम्मेदारी लेने की क्षमता है। यदि कोई निजी या PPP अस्पताल गंभीर अथवा जटिल मरीज को उच्च सरकारी संस्थान में भेज देता है, तो रेफरल चिकित्सा विज्ञान की आवश्यकता भी हो सकता है। लेकिन यदि संस्थान अपनी सीमित विशेषज्ञता, उपकरणों की कमी या लागत बचाने के कारण मरीज को उच्च संस्थान भेजता है, तो यह सेवा नहीं, जिम्मेदारी का स्थानांतरण है।
गरीब मरीज के लिए इसका अर्थ केवल एक कागजी रेफरल नहीं है। उसका अर्थ है—नया अस्पताल, नया खर्च, नई यात्रा, नई प्रतीक्षा और कई बार जीवन से जुड़ा नया जोखिम।
इसलिए PPP अस्पतालों का मूल्यांकन केवल बेडों की संख्या और भवन की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि यह देखकर होना चाहिए कि उन्होंने कितने मरीजों का वास्तविक उपचार किया और कितने मरीजों को क्यों रेफर किया।
डॉक्टर किसके प्रति उत्तरदायी है?
स्वास्थ्य व्यवस्था का एक और संवेदनशील प्रश्न है—नियुक्त चिकित्सकों को निजी प्रैक्टिस की अनुमति। निजी प्रैक्टिस अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन जब कोई चिकित्सक सार्वजनिक अथवा PPP संस्थान से वेतन प्राप्त करता है और उसी क्षेत्र में निजी चिकित्सा से अतिरिक्त आय भी अर्जित करता है, तब हितों के टकराव की संभावना पैदा होती है।
यदि सार्वजनिक अस्पताल में समय, सुविधा या ध्यान कम और निजी प्रैक्टिस में अधिक है, तो सार्वजनिक संस्था धीरे-धीरे डॉक्टर के लिए मुख्य कार्यस्थल के बजाय निजी प्रैक्टिस का सहायक आधार बन सकती है। यह स्थिति मरीज के अधिकार के विरुद्ध है।
डॉक्टर को उचित वेतन मिलना चाहिए, लेकिन उसके साथ उतनी ही स्पष्ट कार्य-जिम्मेदारी और जवाबदेही भी होनी चाहिए।
PPP में नागरिक कहाँ है?
यही सबसे बड़ा प्रश्न है। PPP के दो संस्थागत पक्ष दिखाई देते हैं—सरकार और निजी भागीदार। लेकिन तीसरा पक्ष, जिसके नाम पर पूरी व्यवस्था खड़ी की जाती है, अक्सर अदृश्य हो जाता है—नागरिक।
नागरिक बैंक का ग्राहक है। नागरिक अस्पताल का मरीज है। नागरिक सार्वजनिक धन का करदाता है। नागरिक उस भूमि और संसाधन का वास्तविक सामाजिक स्वामी है, जिस पर अनेक परियोजनाएँ खड़ी होती हैं।
फिर PPP के अनुबंध में उसकी आवाज कितनी है? क्या उसे सेवा की गुणवत्ता पर प्रश्न पूछने का अधिकार है? क्या वह अनुचित शुल्क की शिकायत कर सकता है? क्या उसे यह जानने का अधिकार है कि उसे रेफर क्यों किया गया? क्या वह जान सकता है कि सार्वजनिक संसाधन प्राप्त करने वाली निजी संस्था ने बदले में कितनी सार्वजनिक सेवा दी?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर अस्पष्ट हैं, तो PPP में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अनुपस्थित है।
लाभ निजी, जोखिम सार्वजनिक?
PPP की सबसे बड़ी आलोचना यह नहीं कि निजी क्षेत्र लाभ कमाता है। निजी निवेश बिना लाभ की संभावना के क्यों आएगा? समस्या तब शुरू होती है जब लाभ निजी और जोखिम सार्वजनिक हो जाए।
परियोजना सफल हुई तो लाभ निजी संस्था का। कर्मचारी की लागत घटानी हो तो कर्मचारी पर दबाव। मरीज जटिल हुआ तो सरकारी उच्च संस्थान। व्यवस्था विफल हुई तो सरकार से हस्तक्षेप की अपेक्षा। और नागरिक को अंततः सेवा के लिए भुगतान करना पड़े।
यह संतुलित साझेदारी नहीं हो सकती। साझेदारी तभी है जब लाभ, जोखिम और जवाबदेही तीनों का न्यायपूर्ण वितरण हो।
सरकार को क्या करना चाहिए?
PPP को पूरी तरह खारिज करना समाधान नहीं है। अनेक क्षेत्रों में निजी पूंजी और तकनीकी दक्षता सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूत कर सकती है। लेकिन इसके लिए सरकार को नियामक और उत्तरदायी पक्ष की अपनी भूमिका छोड़नी नहीं चाहिए।
PPP की हर परियोजना के लिए कम-से-कम पाँच अनिवार्य कसौटियाँ होनी चाहिए—
- नागरिक को सेवा की गारंटी।
- कर्मचारियों के लिए न्यूनतम सम्मानजनक वेतन और कार्य-शर्तें।
- निजी संस्था की आय, शुल्क और सार्वजनिक सहायता में पारदर्शिता।
- मरीज, ग्राहक और कर्मचारी के लिए स्वतंत्र शिकायत एवं अपील व्यवस्था।
- परियोजना की सफलता का मूल्यांकन लाभ से नहीं, सार्वजनिक परिणाम से।
और स्वास्थ्य संस्थानों के लिए एक छठी कसौटी अनिवार्य होनी चाहिए—रेफरल ऑडिट। किस अस्पताल ने कितने मरीज रेफर किए, क्यों किए, उनमें से कितने रेफरल चिकित्सकीय रूप से आवश्यक थे और कितने संस्थान की क्षमता की कमी के कारण—यह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना चाहिए।
अंततः सवाल मॉडल का नहीं, मंशा का है
3P को न तो विकास का जादुई सूत्र बनाया जा सकता है और न हर असफलता का दोषी ठहराया जा सकता है। मूल प्रश्न यह है कि सरकार 3P को किस उद्देश्य से अपना रही है?
यदि उद्देश्य है—निजी पूंजी से सार्वजनिक सेवा को बेहतर बनाना, तो यह उपयोगी हो सकता है। लेकिन यदि उद्देश्य धीरे-धीरे यह बन जाए कि—सरकार अपनी जिम्मेदारी से बाहर निकले, निजी संस्था लाभ कमाए और नागरिक दोनों के बीच अपनी सेवा खरीदने को विवश हो, तो यह सार्वजनिक नीति नहीं, सार्वजनिक जिम्मेदारी का बाजारकरण है।
सरकार को यह याद रखना होगा कि बैंकिंग, शिक्षा और स्वास्थ्य केवल बाजार की वस्तुएँ नहीं हैं। ये नागरिक जीवन की आधारभूत संस्थाएँ हैं।
जनता ग्राहक नहीं है।
मरीज ग्राहक नहीं है।
नागरिक केवल भुगतान करने वाली इकाई नहीं है।
लोकतंत्र में सरकार का काम केवल व्यवस्था को आर्थिक रूप से “viable” बनाना नहीं है। उसका काम यह सुनिश्चित करना है कि व्यवस्था न्यायपूर्ण, सुलभ, उत्तरदायी और मानवीय भी बनी रहे।
और इसलिए आज 3P पर सबसे जरूरी सवाल यही है—
“क्या हम सार्वजनिक सेवा को निजी दक्षता दे रहे हैं,
या निजी लाभ के लिए सार्वजनिक सेवा का चरित्र बदल रहे हैं?”
इस प्रश्न का उत्तर आने वाले वर्षों में केवल PPP का भविष्य तय नहीं करेगा; वह यह भी तय करेगा कि भारत में नागरिक और बाजार के बीच राज्य की भूमिका क्या रह जाएगी।
Dr. R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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