नागपंचमी: इतिहास, पर्यावरण और लोकपरंपरा में नागों का महत्व

नागपंचमी केवल नाग-पूजन का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस समन्वयकारी दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें इतिहास, लोकआस्था, कृषि, जैव-विविधता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की चेतना एक साथ दिखाई देती है।

Culture | संस्कृति |नागपंचमी

Date : August 17, 2026   |   Author : डॉ.दुष्यंत कुमार शाह

नागपंचनी की विविध परम्परायें
Nag Panchami: History, Ecological Relevance & Tradition

Abstract

Nag Panchami, celebrated on the fifth day of the bright fortnight of the month of Shravana, represents a unique confluence of ancient Indian history, ecological wisdom, and living traditions. Beyond its religious rituals, the festival bears deep historical roots linked to the ancient Nagavanshi dynasties—such as the Takshak, Karkotak, and Bharashiva clans—whose territorial influence spanned across key regions of the Indian subcontinent. Historically, scriptural narratives like the cessation of King Janamejaya's Sarpa Satra (snake sacrifice) by Sage Astika symbolize a pivotal peace accord and cultural synthesis between Vedic communities and indigenous Nagavanshi tribes.
From an ecological perspective, Nag Panchami acts as a traditional framework for biodiversity conservation. Falling during the monsoon season, when snakes emerge from flooded burrows, the festival highlights their role as essential secondary consumers in agricultural food chains. By regulating rodent populations, snakes protect crops, earning the traditional title of Kshetrapal (crop guardians). Furthermore, traditional taboos against digging soil or plowing fields on this day serve to protect burrowing fauna and their eggs during their breeding season. Across India, the festival manifests in diverse regional customs—from living snake veneration in Maharashtra to Manasa Puja in Eastern India—fostering community harmony and promoting environmental coexistence over conflict.

Keywords:Nag Panchami history, Nagavanshi dynasty, Nag Panchami ecological importance, Nag Panchami cultural significance, snake conservation India

भारतीय पर्व-परंपरा की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि उनमें धर्म और लोकआस्था के साथ-साथ मानव सभ्यता का इतिहास, कृषि-जीवन, पर्यावरण-बोध और सामाजिक संबंध भी अंतर्निहित दिखाई देते हैं। अनेक भारतीय पर्व स्थानीय नामों, मान्यताओं और अनुष्ठानों में भिन्न होते हुए भी दक्षिण एशिया के विस्तृत भूभाग में किसी न किसी रूप में मनाए जाते हैं। नागपंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। सतही दृष्टि से यह नाग-पूजन का पर्व प्रतीत होता है, लेकिन इसके सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों का सूक्ष्म अध्ययन करें तो इसमें तीन महत्वपूर्ण धाराएँ एक साथ दिखाई देती हैं—प्राचीन सांस्कृतिक स्मृति, कृषि एवं पारिस्थितिकी का लोकज्ञान और विविध भारतीय लोकपरंपराएँ।

भारतीय चिंतन में प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में देखने के बजाय उसके साथ सह-अस्तित्व की भावना विकसित हुई। नागपंचमी इसी दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण लोक-अभिव्यक्ति है।

नाग : मिथक, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति

भारतीय पुराणों और महाकाव्यों में नागों का व्यापक उल्लेख मिलता है। कश्यप और कद्रू की कथा से जुड़े नागों में अनंत या शेष, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, कुलिक और शंख आदि के नाम विभिन्न ग्रंथों में मिलते हैं। इन कथाओं को केवल धार्मिक आख्यान मानकर छोड़ देना भी पर्याप्त नहीं है और उन्हें सीधे-सीधे प्रमाणित ऐतिहासिक राजवंशों का विवरण मान लेना भी सावधानी की मांग करता है। इनके भीतर प्राचीन समुदायों, जनजातीय समूहों और राजनीतिक शक्तियों की सांस्कृतिक स्मृतियाँ सुरक्षित होने की संभावना पर इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों ने विचार किया है।

भारतीय इतिहास में नाग नाम से जुड़े अनेक राजवंशों और राजनीतिक समूहों के प्रमाण भी मिलते हैं। मध्य भारत में नाग शासकों की राजनीतिक उपस्थिति, पद्मावती जैसे केंद्रों से उनका संबंध तथा भारशिव नागों का उल्लेख इतिहास में मिलता है। इसी प्रकार कश्मीर के इतिहास में कर्कोटक वंश और उत्तर-पश्चिमी भारत की सांस्कृतिक स्मृतियों में तक्षक का नाम विशेष महत्त्व रखता है।

इस प्रकार नाग भारतीय सभ्यता में केवल सर्प का प्रतीक नहीं रहे; वे अनेक स्तरों पर सांस्कृतिक प्रतीक, समुदाय और राजनीतिक शक्ति के रूप में भी उपस्थित रहे हैं।

जनमेजय का सर्पयज्ञ : संघर्ष से समन्वय तक

महाभारत में राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के कारण होने और उसके बाद राजा जनमेजय द्वारा सर्पसत्र किए जाने का प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार जनमेजय ने नागों के विनाश के उद्देश्य से यज्ञ आरंभ किया। इसी अवसर पर आस्तीक ने हस्तक्षेप करके यज्ञ को रुकवाया और नागों के संपूर्ण विनाश को टाल दिया।

इस आख्यान को इतिहास की प्रमाणित घटना के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में सुरक्षित संघर्ष और समन्वय के प्रतीकात्मक आख्यान के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है। यह कथा हमें यह संकेत देती है कि विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक समूहों के बीच संघर्ष के बाद सह-अस्तित्व और समन्वय की प्रक्रिया भी सभ्यता-विकास का हिस्सा रही होगी।

नागपंचमी की परंपरा को इसी व्यापक सांस्कृतिक स्मृति से जोड़कर देखने पर यह पर्व केवल सर्प-पूजा न रहकर मानव और प्रकृति के बीच संबंध तथा विविध समुदायों के सह-अस्तित्व का प्रतीक बन जाता है।

कृषि पारिस्थितिकी में नागों की भूमिका

नागपंचमी का सबसे व्यावहारिक पक्ष कृषि और पारिस्थितिकी से जुड़ा हुआ है। भारतीय कृषि समाज में सर्पों को खेतों का रक्षक मानने की परंपरा रही है। अधिकांश सर्प मनुष्यों के लिए विषैले नहीं होते और अनेक प्रजातियाँ चूहों तथा अन्य छोटे जीवों का शिकार करती हैं। इसलिए कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

धान और अन्य फसलों वाले क्षेत्रों में कृंतक फसलों को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं। सर्प खाद्य-जाल में इनकी संख्या को नियंत्रित करने में योगदान देते हैं। इस अर्थ में नागों की उपस्थिति कृषि-पर्यावरण में एक प्राकृतिक जैविक नियंत्रण की भूमिका निभा सकती है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक सावधानी भी आवश्यक है। प्रत्येक सर्प को केवल “द्वितीयक उपभोक्ता” कहना पारिस्थितिकी की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है, क्योंकि विभिन्न प्रजातियों की आहार-स्थिति अलग-अलग हो सकती है। फिर भी अनेक साँपों द्वारा कृंतकों और अन्य छोटे जीवों का शिकार किया जाना कृषि पारिस्थितिकी में उनकी उपयोगिता को स्पष्ट करता है।

लोकज्ञान ने इसी पारिस्थितिक भूमिका को अपने तरीके से अभिव्यक्त किया और नाग को ‘क्षेत्रपाल’ अथवा खेत के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया।

नागपंचमी और धरती के प्रति संवेदनशीलता

नागपंचमी से जुड़ी अनेक लोकपरंपराओं में इस दिन खेत जोतने, मिट्टी खोदने अथवा भूमि को अनावश्यक रूप से क्षति पहुँचाने से बचने की मान्यता मिलती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके स्वरूप भिन्न हैं।

वर्षा ऋतु में भूमि के भीतर और आसपास रहने वाले अनेक जीव सक्रिय होते हैं। मिट्टी में रहने वाले जीवों, सरीसृपों और सूक्ष्मजीवों के जीवन-चक्र पर कृषि गतिविधियों का प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए वर्षा ऋतु में कुछ दिनों के लिए भूमि-उत्खनन और अनावश्यक हस्तक्षेप से बचने की परंपराओं को लोकपर्यावरणीय अनुशासन के रूप में भी समझा जा सकता है।

यह आवश्यक नहीं कि इस परंपरा के पीछे वही वैज्ञानिक कारण मूल रूप से रहा हो जिसे आज हम आधुनिक पारिस्थितिकी की भाषा में समझते हैं। लेकिन यह अवश्य विचारणीय है कि कृषि-प्रधान समाजों ने मौसम, जीव-जगत और कृषि-गतिविधियों के बीच संबंधों को अनुभव केआधार पर अपनी लोकसंस्कृति में स्थान दिया।

भय से संरक्षण की ओर

साँप मनुष्य के लिए भय का स्वाभाविक कारण रहे हैं। विषैले सर्पों के कारण उत्पन्न भय अनेक बार उन्हें देखते ही मार देने की प्रवृत्ति में बदल जाता है। नागपंचमी की सांस्कृतिक भूमिका का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने सर्प के प्रति भय को पूजा, सम्मान और संरक्षण के भाव में रूपांतरित किया।

आधुनिक वन्यजीव संरक्षण के संदर्भ में यह दृष्टिकोण आज भी उपयोगी है। सर्पों की अनेक प्रजातियाँ पारिस्थितिक तंत्र के लिए महत्त्वपूर्ण हैं और उनके संरक्षण से जैव-विविधता तथा खाद्य-जाल का संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है।

हालाँकि आधुनिक संरक्षण की दृष्टि से एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि जीवित साँपों को पकड़कर, उन्हें दूध पिलाकर या भीड़ के बीच प्रदर्शित करना संरक्षण का वैज्ञानिक तरीका नहीं है। नागपंचमी की मूल भावना को जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान और उनके प्राकृतिक आवास के संरक्षण से जोड़ना अधिक उपयुक्त होगा।

लोकजीवन में नागपंचमी

नागपंचमी की वास्तविक शक्ति इसकी विविध लोकपरंपराओं में दिखाई देती है। अनेक क्षेत्रों में घरों के द्वार अथवा दीवारों पर नाग की आकृतियाँ बनाई जाती हैं। गोबर, गेरू, मिट्टी, हल्दी अथवा अन्य स्थानीय पदार्थों का प्रयोग होता है। दूध, अक्षत, पुष्प और धान के लावे आदि से प्रतीकात्मक पूजा की जाती है।

इन परंपराओं में धार्मिक विश्वास के साथ स्थानीय कृषि-संस्कृति और मानसून का जीवन भी प्रतिबिंबित होता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में नागपंचमी के रूप भी अलग-अलग हैं। महाराष्ट्र का बत्तीस शिराला नागपूजा की विशिष्ट लोकपरंपरा के लिए प्रसिद्ध है। उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में इस अवसर पर कुश्ती, कबड्डी और अन्य ग्रामीण खेलों का आयोजन होता रहा है। कुछ क्षेत्रों में महिलाओं और बालिकाओं से जुड़ी पुतली या गुड़िया की लोकपरंपराएँ भी मिलती हैं।

पूर्वी भारत, विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम में नाग-परंपरा का संबंध मनसा देवी की आराधना से जुड़ता है। दक्षिण भारत में नाग-शिलाओं या नागर कल्लु की पूजा की परंपरा दिखाई देती है। कर्नाटक सहित दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में नागदेवता से जुड़े पवित्र उपवन और नाग-शिलाएँ स्थानीय जैव-विविधता संरक्षण की परंपराओं से भी जुड़ी रही हैं।

इन विविधताओं में एक साझा सूत्र दिखाई देता है—मनुष्य, भूमि, जल, कृषि और जीव-जगत के बीच संबंध।

सामाजिक समरसता का लोकपर्व

नागपंचमी का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसका सामुदायिक चरित्र भी है। ग्रामीण समाज में पर्व केवल पूजा का अवसर नहीं होता था; वह सामूहिक जीवन के पुनर्संगठन का अवसर भी होता था। मेले, खेल, लोकगीत, पारंपरिक भोजन और सामुदायिक अनुष्ठान सामाजिक संबंधों को मजबूत करते थे।

इस दृष्टि से नागपंचमी धर्म और लोकजीवन के बीच की उस सीमा को भी धुंधला करती है, जिसे आधुनिक दृष्टि अक्सर अलग-अलग खाँचों में देखती है। यहाँ आस्था सामाजिकता में बदलती है और सामाजिकता प्रकृति के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी में।

आधुनिक समय में नागपंचमी का संदेश

आज जब जैव-विविधता पर संकट बढ़ रहा है, प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं और कृषि-तंत्र रासायनिक तथा यांत्रिक हस्तक्षेपों के कारण तेजी से बदल रहा है, नागपंचमी की पर्यावरणीय व्याख्या विशेष महत्त्व रखती है।

इस पर्व को केवल अंधविश्वास बनाम विज्ञान की बहस में सीमित कर देना भारतीय लोकज्ञान की जटिलता को समझने में बाधक होगा। दूसरी ओर, हर लोकमान्यता को वैज्ञानिक तथ्य घोषित करना भी उचित नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि परंपरा के भीतर मौजूद पर्यावरणीय ज्ञान की वैज्ञानिक जाँच की जाए और उपयोगी तत्वों को आधुनिक संरक्षण-नीति से जोड़ा जाए।

नागपंचमी का आधुनिक संदेश इसलिए यह हो सकता है कि सर्पों से भय के कारण उनकी अंधाधुंध हत्या न की जाए, उनके प्राकृतिक आवास सुरक्षित रखे जाएँ और मानव-सर्प संघर्ष को वैज्ञानिक उपायों से कम किया जाए। ग्रामीण समाज में जैविक कीट नियंत्रण और खाद्य-जाल की भूमिका को समझते हुए कृषि नीति में भी जैव-विविधता को महत्त्व दिया जाए।

नागपंचमी भारतीय सभ्यता की उस दृष्टि का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसके व्यापक जीवन-जाल का एक अंग मानता है। इसके भीतर नागों से जुड़े मिथक हैं, प्राचीन समुदायों और राजवंशों की सांस्कृतिक स्मृतियाँ हैं, कृषि समाज का अनुभवजन्य ज्ञान है और लोकजीवन की असंख्य परंपराएँ हैं।

इस पर्व की सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद यही है कि यह हमें प्रकृति पर विजय के बजाय प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की ओर देखने का अवसर देता है।

आज के वैज्ञानिक युग में नागपंचमी की सार्थकता साँपों की पूजा करने में कम और उस पारिस्थितिक चेतना को समझने में अधिक है, जिसने सदियों पहले मनुष्य को यह सिखाया था कि खेत केवल अन्न पैदा करने की जगह नहीं है; वह असंख्य जीवों का साझा आवास भी है।

यदि भारतीय पर्वों को उनके व्यापक ऐतिहासिक, सामाजिक और पारिस्थितिक संदर्भों में पढ़ा जाए, तो वे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाते। वे सभ्यता की स्मृति और भविष्य के लिए पर्यावरणीय चेतावनी—दोनों बन जाते हैं। नागपंचमी इसी जीवंत परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

डॉ. दुष्यंत कुमार शाह
डॉ. दुष्यंत कुमार शाह किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। इतिहास, पुरातत्व और संस्कृति के प्रतिष्ठित विद्वान होने के साथ साहित्य, समीक्षा एवं यात्रिकी लेखन में आपका महत्वपूर्ण योगदान है। आप "महान गणराज्य गढ़मण्डला-आदिवासी इतिहास" पुस्तक के सह-लेखक हैं तथा "कोरोनाकाल कथा-स्वर्ग में सेमीनार" उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद (Seminar in Heaven: A Global Chronicle of the Pandemic) कर चुके हैं। आपके अनेक शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

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