Abstract:
The controversial 1997 attempt by Dr. Dhaniram Baruah and his team in Assam to transplant a pig’s heart into a human being has acquired a new significance in the light of recent advances in xenotransplantation. Nearly three decades later, gene-editing technologies such as CRISPR are enabling scientists to modify pig organs to reduce immune rejection and address some of the major biological barriers to transplantation.
The editorial examines the fundamental difference between the Assam experiment and contemporary xenotransplantation: the transformation from an extraordinary individual experiment to a highly regulated, multidisciplinary scientific process involving genetics, immunology, microbiology, animal science, bioethics and regulatory oversight.
The growing success of gene-edited pig organs also offers a potential solution to the global shortage of transplantable human organs. For India, with its enormous healthcare needs and limited availability of donor organs, xenotransplantation could become an important area of future biomedical research. However, India must develop its own national research and regulatory framework rather than merely becoming a consumer of technologies developed elsewhere.
The central lesson of the 1997 Assam episode is that scientific courage is essential for breaking new ground, but courage alone cannot make a medical experiment legitimate. Evidence, safety, ethics, informed consent and institutional oversight must accompany scientific innovation. Xenotransplantation therefore represents not merely a technological frontier, but a test of whether humanity can balance scientific ambition with responsibility.
1997 के असम प्रयोग से आज के जीन-संपादित सुअर के अंगों तक की यात्रा हमें बताती है कि विज्ञान में साहस जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है प्रमाण, प्रोटोकॉल और नैतिक अनुशासन।
चिकित्सा विज्ञान का इतिहास केवल सफलताओं का इतिहास नहीं है। कई बार किसी असफल, विवादास्पद या समय से आगे के प्रयास में भविष्य की किसी बड़ी वैज्ञानिक क्रांति का बीज छिपा होता है। जनवरी 1997 में असम के सोनापुर में डॉ. धनीराम बरुआ और उनकी टीम द्वारा सुअर के हृदय को मानव शरीर में प्रत्यारोपित करने का प्रयास इसी दृष्टि से आज फिर चर्चा का विषय बन सकता है。
लगभग तीन दशक बाद जेनोट्रांसप्लांटेशन—अर्थात दूसरी प्रजाति के जीव से मानव में अंग प्रत्यारोपण—अब विज्ञान-कथा नहीं रह गया है। जीन-संपादन तकनीक, विशेषकर CRISPR आधारित तकनीकों ने वैज्ञानिकों को सुअर के अंगों को मानव प्रतिरक्षा प्रणाली के अधिक अनुकूल बनाने की दिशा में वास्तविक प्रगति दी है। अमेरिका में जीन-संपादित सुअर के गुर्दे से जुड़े प्रयोगों में लंबे समय तक कार्यात्मक बने रहने के परिणाम सामने आए हैं。
यह परिवर्तन केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं है। यह विज्ञान के चरित्र में आए बदलाव की कहानी भी है。
1997 में सवाल था—क्या ऐसा किया जा सकता है? आज सवाल है—इसे कितनी सुरक्षित, नियंत्रित और नैतिक तरीके से किया जा सकता है?
यही अंतर आधुनिक विज्ञान की परिपक्वता को दर्शाता है。
असम की घटना को फिर से पढ़ने की जरूरत
1997 में उपलब्ध जैव-चिकित्सकीय तकनीक आज की तुलना में बहुत सीमित थी। सामान्य सुअर के अंग और मानव प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच जैविक असंगति एक बहुत बड़ी बाधा थी। मानव शरीर दूसरी प्रजाति के अंग को विदेशी मानकर उसके विरुद्ध तीव्र प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है。
आज जीन-संपादन ने इस चुनौती से निपटने के नए रास्ते खोले हैं। सुअर के जीनोम में ऐसे परिवर्तन किए जा सकते हैं जिनसे मानव शरीर द्वारा तत्काल अस्वीकृति की संभावना कम हो। कुछ प्रयोगों में मानव-संगत जीनों को जोड़ने और संक्रमण संबंधी जोखिमों को नियंत्रित करने पर भी काम हुआ है。
इसलिए 1997 और आज के बीच का अंतर केवल लगभग तीस वर्षों का नहीं है। यह बिना जीन-संपादन वाले अंग से जीन-इंजीनियर्ड अंग तक की वैज्ञानिक यात्रा है。
फिर भी इतिहास को वर्तमान की सफलता के आधार पर पुनर्लिखना उचित नहीं होगा। असम का प्रयोग अपने समय के वैज्ञानिक और नियामक मानकों से जुड़े गंभीर प्रश्नों को जन्म देता था। मानव पर किसी नई चिकित्सा प्रक्रिया का प्रयोग व्यक्तिगत साहस से वैध नहीं हो सकता। इसके लिए वैज्ञानिक प्रमाण, पूर्व-परीक्षण, स्वतंत्र समीक्षा, सूचित सहमति और नियामकीय स्वीकृति आवश्यक है। यहीं से इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण सबक निकलता है。
विज्ञान बनाम व्यवस्था नहीं, विज्ञान और व्यवस्था
अक्सर वैज्ञानिक स्वतंत्रता और नियमन को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह दृष्टिकोण गलत है。
नियमन का उद्देश्य विज्ञान को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञान की कीमत मानव जीवन से न चुकानी पड़े。
विशेषकर जेनोट्रांसप्लांटेशन जैसी तकनीक में जोखिम कई स्तरों पर हैं—अंग का अस्वीकार होना, प्रतिरक्षा संबंधी जटिलताएं, पशु से मानव में संक्रमण का संभावित हस्तांतरण और लंबे समय के अज्ञात प्रभाव。
इसलिए आज की जेनोट्रांसप्लांटेशन परियोजनाओं में केवल सर्जन या प्रत्यारोपण विशेषज्ञ ही पर्याप्त नहीं हैं। इसमें जेनेटिसिस्ट, माइक्रोबायोलॉजिस्ट, इम्यूनोलॉजिस्ट, पशु-विज्ञानी, बायोएथिक्स विशेषज्ञ और नियामक संस्थाओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है。
आधुनिक चिकित्सा में बड़ा प्रयोग वह नहीं है जो नियमों को तोड़ दे; बड़ा प्रयोग वह है जो कठोर नियमों के भीतर सुरक्षित रूप से नई सीमा तक पहुंच सके।
अंगों की कमी : मानवता के सामने वास्तविक संकट
जेनोट्रांसप्लांटेशन की आवश्यकता केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा के कारण नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण है—अंगों की भारी कमी。
दुनिया भर में ऐसे मरीजों की संख्या बहुत बड़ी है जिन्हें गुर्दे, यकृत, हृदय या अन्य अंगों के प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि उपलब्ध मानव अंग सीमित हैं। अनेक मरीज प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करते हुए जीवन खो देते हैं。
भारत के संदर्भ में यह चुनौती और महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां विशाल आबादी, गैर-संचारी रोगों का बढ़ता बोझ और अंग प्रत्यारोपण की बढ़ती आवश्यकता के बीच दाता-अंगों की उपलब्धता अभी भी बड़ी समस्या है。
यदि जेनोट्रांसप्लांटेशन भविष्य में सुरक्षित और प्रभावी सिद्ध होता है तो यह चिकित्सा व्यवस्था की पूरी संरचना बदल सकता है。
कल्पना कीजिए—किसी मरीज को उपयुक्त मानव दाता की अनिश्चित प्रतीक्षा न करनी पड़े और नियंत्रित जैविक परिस्थितियों में तैयार किया गया अंग उपलब्ध हो सके。
लेकिन इस संभावना के साथ उत्साह से अधिक जिम्मेदारी जुड़ी हुई है。
भारत को दर्शक नहीं, सहभागी बनना होगा
यहां भारत के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
जब अमेरिका और कुछ अन्य देश जीन-संपादित पशु-अंगों को मानव प्रत्यारोपण की दिशा में आगे ले जा रहे हैं, तब भारत की भूमिका क्या होगी?
क्या हम केवल विकसित देशों की तकनीक का इंतजार करेंगे?
या अपने वैज्ञानिक संसाधनों का उपयोग करके इस क्षेत्र में स्वयं शोध की अग्रिम पंक्ति में खड़े होंगे?
भारत के पास विशाल चिकित्सकीय आधार, उच्चस्तरीय जैव-चिकित्सकीय संस्थान, पशु-विज्ञान अनुसंधान, जीनोमिक्स की बढ़ती क्षमता और बड़ी संख्या में प्रशिक्षित वैज्ञानिक हैं। आवश्यकता है इन क्षमताओं को अलग-अलग संस्थागत द्वीपों में सीमित रखने के बजाय एक राष्ट्रीय अनुसंधान मिशन से जोड़ने की。
जेनोट्रांसप्लांटेशन के लिए भारत को राष्ट्रीय स्तर पर बहुविषयी अनुसंधान, जैव-सुरक्षा और नैतिकता का एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना चाहिए。
इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अनुसंधान केवल निजी व्यावसायिक हितों के अधीन न हो। मानव अंग जैसी जीवन-मूल्य से जुड़ी तकनीक में सार्वजनिक हित सर्वोच्च होना चाहिए。
पशु-अधिकार का प्रश्न भी अनदेखा नहीं किया जा सकता
जेनोट्रांसप्लांटेशन की चर्चा में एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—पशु नैतिकता。
यदि मनुष्य दूसरे जीव के अंगों का उपयोग करेगा तो यह प्रश्न भी उठेगा कि ऐसे पशुओं को किस प्रकार पाला जाएगा, उनके साथ कैसा व्यवहार होगा और कितने पशुओं का प्रयोग अनुसंधान में किया जाएगा。
इसलिए वैज्ञानिक प्रगति का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पशु कल्याण को नजरअंदाज कर दिया जाए। 3Rs—Replacement, Reduction और Refinement जैसे सिद्धांतों को अनुसंधान की आधारशिला बनाना होगा。
यहां भी आधुनिक विज्ञान का रास्ता संतुलन का है—मानव जीवन की रक्षा, वैज्ञानिक प्रगति और पशु कल्याण के बीच संतुलन。
1997 का असम और आज का अमेरिका
डॉ. धनीराम बरुआ के 1997 के प्रयास को आज की जीन-संपादित तकनीकों की सफलता का प्रत्यक्ष पूर्वाभ्यास कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। दोनों के बीच तकनीकी, नियामकीय और वैज्ञानिक परिस्थितियों में बहुत बड़ा अंतर है。
लेकिन दोनों घटनाओं को एक ही ऐतिहासिक धागे में देखा जा सकता है。
एक तरफ 1997 का प्रयास था, जिसमें एक अत्यंत साहसिक विचार को मानव चिकित्सा में लागू करने की कोशिश हुई। दूसरी तरफ आज का विज्ञान है, जो उसी व्यापक अवधारणा को जीनोमिक्स, इम्यूनोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, पशु-विज्ञान और कठोर नियामकीय प्रक्रियाओं के साथ आगे बढ़ा रहा है。
अंतर यह नहीं कि आज के वैज्ञानिक अधिक साहसी हैं। अंतर यह है कि आज साहस के पीछे कहीं अधिक मजबूत वैज्ञानिक आधार है।
भारत के लिए असली सबक
असम की घटना को लेकर हमें दो अतियों से बचना चाहिए。
एक ओर किसी विवादास्पद प्रयोग को महिमामंडित करना उचित नहीं है। दूसरी ओर उसके वैज्ञानिक प्रश्न को केवल इसलिए भुला देना भी उचित नहीं कि वह अपने समय में विवाद का कारण बना था。
विज्ञान का इतिहास हमें सिखाता है कि किसी विचार का मूल्यांकन व्यक्ति के साहस से नहीं, प्रमाण से होना चाहिए。
और प्रमाण के बाद भी चिकित्सा विज्ञान में अगली कसौटी है—क्या यह सुरक्षित है? क्या यह नैतिक है? क्या मरीज ने पूरी जानकारी के साथ सहमति दी है? और क्या समाज इसके संभावित परिणामों के लिए तैयार है?
यही वे प्रश्न हैं जो जेनोट्रांसप्लांटेशन के भविष्य को निर्धारित करेंगे。
भारत को इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन किसी दूसरे देश की सफलता की नकल करके नहीं। हमें अपनी वैज्ञानिक क्षमता, अपनी स्वास्थ्य आवश्यकताओं और अपनी नैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप मॉडल विकसित करना होगा。
1997 का असम हमें विज्ञान के साहस की याद दिलाता है। आज की जीन-संपादन तकनीक हमें विज्ञान की शक्ति दिखाती है। लेकिन इन दोनों के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण पुल है, वह है—वैज्ञानिक प्रमाण, नैतिकता और संस्थागत उत्तरदायित्व।
अंगों की कमी से जूझती मानवता को जेनोट्रांसप्लांटेशन से बड़ी उम्मीदें हैं। संभव है कि आने वाले दशकों में सुअर के जीन-संपादित अंग प्रत्यारोपण चिकित्सा का एक सामान्य हिस्सा बन जाएं。
लेकिन उस भविष्य तक पहुंचने के लिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चिकित्सा विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं。
उससे भी बड़ा प्रश्न है—
हमें क्या करना चाहिए, किस सीमा तक करना चाहिए और किसकी सुरक्षा की कीमत पर नहीं करना चाहिए।
यही 1997 के असम प्रयोग से लेकर आज के जेनोट्रांसप्लांटेशन तक विज्ञान की सबसे बड़ी सीख है。
Dr. R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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