आरक्षण -2: गरीबी उन्मूलन नहीं, सामाजिक प्रतिनिधित्व का संवैधानिक माध्यम

आरक्षण का मूल उद्देश्य गरीबी मिटाना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक वंचना को दूर कर शासन और सार्वजनिक संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था।
Public Discourse
Published: August 31, 2026 | Author: डॉ. चतुरानन ओझा

Reservation in India: Social Representation, EWS and Constitutional Purpose

Reservation in India was conceived primarily as an instrument of social justice, adequate representation and institutional participation for historically disadvantaged communities—not simply as a measure for poverty alleviation. Article 16(4) reflects this emphasis on adequate representation in public services. The introduction of EWS reservation through the 103rd Constitutional Amendment brought economic disadvantage into the reservation framework, creating a new debate over whether poverty and historical social exclusion should be addressed through the same mechanism. This article examines the distinction between economic deprivation and social backwardness and argues that poverty requires comprehensive welfare and economic policies, while reservation addresses the deeper question of who is represented in education, public employment, governance and decision-making institutions.

आरक्षण : गरीबी उन्मूलन नहीं, सामाजिक प्रतिनिधित्व का संवैधानिक माध्यम

भारत में आरक्षण पर बहस जितनी पुरानी है, उतनी ही बार उसे एक ही सवाल के इर्द-गिर्द सीमित करने की कोशिश होती रही है—क्या गरीब व्यक्ति को आरक्षण मिलना चाहिए?

सवाल महत्वपूर्ण है, लेकिन समस्या यह है कि इस सवाल के भीतर ही आरक्षण की मूल अवधारणा को बदल दिया जाता है। भारतीय संविधान में आरक्षण की बुनियादी कल्पना केवल गरीबी दूर करने की योजना के रूप में नहीं हुई थी। इसका केंद्रीय उद्देश्य था—ऐसे सामाजिक समूहों को सत्ता, शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व देना, जो ऐतिहासिक रूप से इन अवसरों से वंचित रहे थे।

यही अंतर आरक्षण और गरीबी उन्मूलन की योजनाओं के बीच मूलभूत अंतर पैदा करता है।

गरीबी का समाधान आर्थिक सहायता, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, आवास और सामाजिक सुरक्षा की नीतियों से किया जा सकता है। लेकिन यदि किसी समुदाय को उसकी सामाजिक पहचान के कारण पीढ़ियों तक शिक्षा, सम्मान, सार्वजनिक पदों और निर्णय लेने की संस्थाओं से दूर रखा गया हो, तो केवल आर्थिक सहायता उस ऐतिहासिक बहिष्कार को समाप्त नहीं कर सकती।

इसीलिए आरक्षण को केवल गरीब व्यक्ति की सहायता के रूप में देखना उसके संवैधानिक उद्देश्य को छोटा कर देना है।

संविधान ने 'पर्याप्त प्रतिनिधित्व' को क्यों महत्व दिया?

संविधान का अनुच्छेद 16 समान अवसर की बात करता है। लेकिन संविधान निर्माताओं के सामने एक कठिन प्रश्न था—यदि समाज में अवसर समान नहीं रहे हों, तो केवल 'समान अवसर' की घोषणा क्या वास्तव में समानता पैदा कर सकती है?

अनुच्छेद 16(4) राज्य को ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियों या पदों में आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति देता है, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

यहां ध्यान देने योग्य शब्द है—प्रतिनिधित्व।

संविधान का यह प्रावधान केवल इस आधार पर नहीं बनाया गया था कि कौन व्यक्ति आर्थिक रूप से गरीब है। इसका संबंध उन सामाजिक समूहों की संस्थागत भागीदारी से था जिनका सार्वजनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रहा।

यानी प्रश्न केवल यह नहीं था कि कौन गरीब है?

प्रश्न यह भी था—

कौन निर्णय ले रहा है?
कौन प्रशासन चला रहा है?
कौन नीति बना रहा है?
कौन विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहा है?
कौन राज्य की संस्थाओं में मौजूद है?

यही आरक्षण के सामाजिक प्रतिनिधित्व वाले चरित्र को समझने की कुंजी है।

गरीबी और सामाजिक पिछड़ापन एक ही चीज नहीं

एक गरीब व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बदल सकती है। वह शिक्षा प्राप्त कर सकता है, नौकरी पा सकता है, व्यवसाय कर सकता है और अगली पीढ़ी आर्थिक रूप से मजबूत हो सकती है।

लेकिन सामाजिक भेदभाव का चरित्र अलग हो सकता है।

यदि किसी समुदाय को लंबे समय तक सामाजिक प्रतिष्ठा, शिक्षा, भूमि, प्रशासन, संस्थागत शक्ति और सार्वजनिक निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा गया हो, तो उसकी स्थिति केवल उस समय की आय देखकर नहीं समझी जा सकती।

यही कारण है कि आर्थिक पिछड़ापन और सामाजिक पिछड़ापन एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

एक व्यक्ति आर्थिक रूप से गरीब हो सकता है, लेकिन सामाजिक रूप से प्रभावशाली वर्ग से आता हो। दूसरी ओर कोई व्यक्ति अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति में होते हुए भी अपने सामाजिक समूह की ऐतिहासिक वंचना और भेदभाव की संरचनाओं का सामना कर सकता है।

इस अंतर को मिटा देना आरक्षण के उद्देश्य को बदल देता है।

अगर उद्देश्य गरीबी मिटाना होता तो रास्ता दूसरा होता

कल्पना कीजिए कि आरक्षण का उद्देश्य केवल गरीबी दूर करना होता।

तब सरकार गरीब परिवारों को छात्रवृत्ति देती, मुफ्त या सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराती, स्वास्थ्य सुविधाएं देती, रोजगार कार्यक्रम चलाती, आवास और खाद्य सुरक्षा देती तथा आर्थिक सहायता प्रदान करती।

लेकिन आरक्षण को सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने के पीछे एक अलग विचार था।

वह विचार था—राज्य की संस्थाओं में समाज की विविधता दिखाई दे।

एक लोकतंत्र में प्रशासन केवल कानून लागू करने वाली मशीन नहीं है। प्रशासन समाज की वास्तविकताओं को समझने वाली संस्था भी है।

जब समाज के अलग-अलग अनुभवों से आए लोग प्रशासन, शिक्षा, राजनीति और सार्वजनिक संस्थाओं में पहुंचते हैं, तो निर्णय प्रक्रिया में अनुभवों की विविधता बढ़ती है।

इस अर्थ में आरक्षण केवल एक व्यक्ति को नौकरी देने की व्यवस्था नहीं है। वह संस्थाओं के सामाजिक चरित्र को बदलने का एक माध्यम भी है।

जब आरक्षण का आधार बदलने लगा

यहीं से आरक्षण की वर्तमान बहस का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सामने आता है।

यदि आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक वंचना को दूर करना था, तो फिर आर्थिक आधार को आरक्षण के भीतर लाने का प्रश्न केवल गरीबों की सहायता का प्रश्न नहीं रह जाता। यह आरक्षण की मूल अवधारणा और दिशा का प्रश्न बन जाता है।

2019 में 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों—EWS—के लिए 10 प्रतिशत तक आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया गया। इसके साथ आर्थिक कमजोरी आरक्षण के एक स्वतंत्र आधार के रूप में सामने आई।

यहां एक गंभीर वैचारिक प्रश्न खड़ा होता है—

क्या गरीबी और सामाजिक वंचना को एक ही नीति के माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिए?

गरीबी निश्चित रूप से गंभीर समस्या है। गरीब नागरिक को राज्य की सहायता मिलनी चाहिए। लेकिन गरीबी का समाधान केवल आरक्षण में नहीं है। उसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आवास, खाद्य सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक अवसरों का विस्तार जरूरी है।

आरक्षण का प्रश्न इससे अलग है।

यदि कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से गरीब है, तो उसकी सहायता आवश्यक है; लेकिन यदि कोई सामाजिक समूह ऐतिहासिक रूप से सत्ता और सार्वजनिक संस्थाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का शिकार रहा है, तो उसकी समस्या केवल आय की समस्या नहीं है।

यहीं आर्थिक आधार पर आरक्षण को लेकर मूल वैचारिक आपत्ति सामने आती है।

गरीबी मिटाने के लिए आरक्षण का इस्तेमाल आरक्षण के मूल सामाजिक-प्रतिनिधित्व वाले उद्देश्य को धुंधला कर सकता है।

यहां गरीबों की सहायता का विरोध नहीं है। प्रश्न यह है कि गरीबी उन्मूलन के लिए आरक्षण को ही माध्यम क्यों बनाया जाए?

यदि आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों की सहायता करनी है, तो राज्य के पास उससे कहीं व्यापक और अधिक प्रभावी आर्थिक नीतियां हो सकती हैं। लेकिन आरक्षण का ऐतिहासिक औचित्य उस सामाजिक असमानता से जुड़ा है, जिसमें कुछ समूहों की संस्थाओं में उपस्थिति ही नगण्य या अपर्याप्त रही।

इसलिए आर्थिक आधार को आरक्षण के समान धरातल पर रखने से आरक्षण की मूल अवधारणा में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है—सामाजिक प्रतिनिधित्व से आर्थिक सहायता की ओर।

डीएम, एसपी और अधिकारी कौन हों—यह भी लोकतंत्र का सवाल है

भारत जैसे विशाल और विविध देश में शासन की गुणवत्ता केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि अधिकारी कितना योग्य है। यह भी महत्वपूर्ण है कि शासन करने वाली संस्थाओं में समाज की विविधता कितनी दिखाई देती है।

एक जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी, शिक्षक, विश्वविद्यालय का प्रोफेसर या नीति-निर्माता जब समाज के किसी विशेष अनुभव से आता है, तो वह उन समस्याओं को अलग दृष्टि से देख सकता है जिन्हें कोई दूसरा व्यक्ति शायद केवल आंकड़ों में देखे।

इसका अर्थ यह नहीं कि किसी वर्ग से आया व्यक्ति केवल अपने वर्ग का प्रतिनिधि बनकर काम करेगा। संवैधानिक पद पर व्यक्ति पूरे समाज के प्रति उत्तरदायी होता है।

लेकिन संस्थाओं में विविध अनुभवों की मौजूदगी स्वयं लोकतांत्रिक शक्ति है।

इसीलिए प्रतिनिधित्व का प्रश्न महज नौकरी का प्रश्न नहीं है। यह राज्य की संस्थाओं के सामाजिक चरित्र का प्रश्न है।

आरक्षण बनाम आर्थिक सहायता : गलत तुलना

अक्सर पूछा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति गरीब है तो उसे आरक्षण क्यों मिले और यदि कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से समृद्ध है तो उसे क्यों मिले?

यह सवाल आरक्षण की प्रकृति को केवल व्यक्ति की आय तक सीमित कर देता है।

आरक्षण का एक महत्वपूर्ण आयाम व्यक्ति के साथ-साथ समुदाय की संस्थागत स्थिति भी है।

यदि किसी वर्ग का उच्च शिक्षा, सरकारी सेवाओं या सार्वजनिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व लगातार कम है, तो समस्या केवल यह नहीं है कि उस वर्ग के कितने लोग गरीब हैं। समस्या यह भी है कि उस वर्ग की संस्थागत उपस्थिति कितनी है।

इसलिए आरक्षण की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि इससे कितने गरीब परिवार आर्थिक रूप से ऊपर उठे।

एक दूसरा सवाल भी पूछा जाना चाहिए—

क्या इससे उन संस्थाओं में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ा, जिनमें ऐतिहासिक रूप से कुछ समूहों की मौजूदगी बहुत कम थी?

यही वह प्रश्न है जो आरक्षण की मूल संवैधानिक भावना के अधिक निकट है।

समानता का अर्थ हमेशा एक जैसा व्यवहार नहीं

भारतीय संविधान की समानता की अवधारणा केवल यह नहीं कहती कि सभी लोगों के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार किया जाए।

कई बार वास्तविक समानता के लिए असमान परिस्थितियों को ध्यान में रखना पड़ता है।

जो व्यक्ति दौड़ में बहुत पीछे से शुरू कर रहा है, उसे केवल यह कह देना कि "अब से सभी समान दूरी दौड़ेंगे", वास्तविक समानता पैदा नहीं करता।

इसीलिए सकारात्मक भेदभाव की संवैधानिक अवधारणा सामने आई।

आरक्षण का औचित्य इसी व्यापक विचार में है कि समान अवसर का अर्थ केवल प्रवेश-द्वार खोल देना नहीं है; यह भी देखना होगा कि समाज के विभिन्न समूह उस द्वार तक पहुंच भी पा रहे हैं या नहीं।

अब बहस को सही प्रश्न की जरूरत है

आरक्षण पर भारत में बहस अक्सर दो अतियों में फंस जाती है।

एक ओर इसे हर सामाजिक और आर्थिक समस्या का समाधान मान लिया जाता है।

दूसरी ओर इसे केवल गरीबी के आधार पर मिलने वाली सहायता समझकर खारिज कर दिया जाता है।

दोनों दृष्टियां अधूरी हैं।

आरक्षण गरीबी उन्मूलन की संपूर्ण नीति नहीं है।

और न ही यह गरीबी का विकल्प है।

यह मुख्यतः सामाजिक न्याय, समान अवसर और सार्वजनिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व से जुड़ा संवैधानिक उपकरण है।

इसलिए भारत को आरक्षण पर बहस करते समय एक अधिक वैज्ञानिक और संवैधानिक प्रश्न पूछना चाहिए—

किस वर्ग का प्रतिनिधित्व कहां और कितना है?

इसके बाद प्रश्न होना चाहिए—

किस वर्ग की आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है?

और फिर—

गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की असमानता दूर करने के लिए राज्य को कौन-सी अलग नीतियां बनानी चाहिए?

इन तीनों प्रश्नों को एक ही टोकरी में डाल देना नीति और संविधान दोनों के साथ अन्याय होगा।

भारत में सामाजिक न्याय का लक्ष्य केवल यह नहीं हो सकता कि हर नागरिक को किसी तरह आर्थिक सहायता मिल जाए। लोकतंत्र का लक्ष्य यह भी है कि राज्य की संस्थाएं उस समाज की विविधता को प्रतिबिंबित करें जिसके लिए वे काम करती हैं।

इस अर्थ में आरक्षण किसी गरीब को राहत देने भर की योजना नहीं है।

यह उस ऐतिहासिक प्रश्न का संवैधानिक उत्तर है—

सत्ता, अवसर और निर्णय लेने की संस्थाओं में आखिर कौन मौजूद है?

और यदि आर्थिक आधार को आरक्षण का प्रमुख औचित्य बना दिया जाता है, तो खतरा केवल नीति बदलने का नहीं है। खतरा यह है कि आरक्षण जिस सामाजिक प्रश्न का उत्तर था, वही प्रश्न धीरे-धीरे उसकी बहस से गायब हो जाए।

गरीबी के लिए कल्याणकारी राज्य चाहिए।

लेकिन सामाजिक बहिष्कार के लिए प्रतिनिधित्व का न्याय चाहिए।

दोनों को एक मान लेना ही आरक्षण की मूल अवधारणा को भटका देता है।

Cite as:
Ojha, C. (2026). Centralization vs. Autonomy: The Yakṣa Question of Higher Education Reform in India. Eastern Scientist, II(34). Available at: https://www.easternscientist.in/2026/06/blog-post_03.html

Dr. Chaturanand Ojha

डॉ. चतुरानन ओझा

सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, लेखक, विचारक, सह-संयोजक — समान शिक्षा अधिकार मंच, उत्तर प्रदेश यूनिट

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