Delhi Student Lathi Charge: Indian Police System and Democracy
The recent police baton charge on students in Delhi has raised fundamental questions about the relationship between the police, the state, and democratic rights in India. This editorial argues that such incidents are not merely law-and-order issues but reflect the enduring legacy of the colonial Police Act of 1861, which emphasized control over public service.
At the same time, the article highlights that most police personnel come from ordinary and economically weaker families. Bound by institutional discipline, political pressures, and administrative orders, they often have limited discretion in the execution of their duties. Thus, both protesting students and frontline police officers frequently become victims of the same systemic structure.
The editorial concludes that meaningful police reforms, institutional autonomy, better working conditions, and greater reliance on dialogue rather than force are essential for building a democratic, citizen-centric policing system. A mature democracy is strengthened not by suppressing dissent, but by protecting constitutional rights while maintaining public order.
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| सोसल मीडिया से साभार |
लाठियाँ किस पर चल रही हैं?
दिल्ली में छात्रों पर हुए पुलिस लाठीचार्ज ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है। जब अपने अधिकारों, शिक्षा, रोजगार या किसी सार्वजनिक नीति के विरोध में आवाज़ उठाने वाले युवा पुलिस की लाठियों का सामना करते हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाता। यह प्रश्न उठता है कि लोकतांत्रिक भारत की पुलिस व्यवस्था का मूल चरित्र क्या है? क्या उसका पहला दायित्व नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है, या हर स्थिति में प्रशासनिक आदेशों को लागू करना?
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं, बल्कि उसकी जीवनशक्ति है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होकर अपनी बात रखने का अधिकार देता है। निस्संदेह यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है, परंतु किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इसी से आँकी जाती है कि वह विरोध का उत्तर संवाद से देता है या बल प्रयोग से।
यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा हो, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचे या आम नागरिकों का जीवन प्रभावित हो, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का वैधानिक दायित्व है। इसलिए किसी भी घटना का मूल्यांकन निष्पक्ष तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। जहाँ अनावश्यक बल प्रयोग हुआ हो, वहाँ जवाबदेही तय होनी चाहिए, और जहाँ प्रदर्शन हिंसक हुआ हो, वहाँ कानून अपना काम करे। लोकतंत्र पक्षधरता नहीं, न्याय की अपेक्षा करता है।
लेकिन इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय पुलिस व्यवस्था का ऐतिहासिक चरित्र है। वर्तमान पुलिस प्रणाली का आधार 1857 के विद्रोह के बाद लागू भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 है। यह कानून नागरिक सेवा के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन की सुरक्षा और जनता पर नियंत्रण के लिए बनाया गया था। स्वतंत्र भारत ने संविधान बदल दिया, किंतु पुलिस व्यवस्था की कार्य-संस्कृति में औपनिवेशिक सोच के अनेक अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। कई बार विरोध-प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय प्रशासनिक चुनौती मान लिया जाता है।
फिर भी पूरी जिम्मेदारी केवल पुलिस पर डाल देना उचित नहीं होगा। पुलिस की वर्दी पहनने वाला व्यक्ति भी इसी समाज का नागरिक है। भारतीय पुलिस बल का बड़ा हिस्सा सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं से बनता है। सीमित संसाधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे अक्सर उच्च शिक्षा या अपनी पसंद का करियर नहीं चुन पाते। नौकरी उनके लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूरे परिवार के जीवन-निर्वाह का आधार होती है।
ऐसे युवा जब पुलिस सेवा में आते हैं, तो वे नीति-निर्माता नहीं होते; वे आदेशों का पालन करने वाले कर्मचारी होते हैं। उनकी नौकरी कठोर अनुशासन से बंधी होती है। आदेश की अवहेलना उनके लिए निलंबन, विभागीय कार्रवाई या नौकरी समाप्त होने का कारण बन सकती है। इसलिए अनेक बार लाठी उठाने वाला हाथ व्यक्तिगत क्रूरता का नहीं, बल्कि संस्थागत क्रूरता का प्रतीक होता है। विडंबना यह है कि जिस छात्र पर लाठी पड़ती है और जो पुलिसकर्मी उसे चलाता है, दोनों ही अक्सर एक जैसे संघर्षशील परिवारों से आते हैं। व्यवस्था उन्हें आमने-सामने खड़ा कर देती है, जबकि दोनों ही उसी व्यवस्था की सीमाओं से जूझ रहे होते हैं।
भारतीय पुलिस स्वयं भी गंभीर संकटों से गुजर रही है। पुलिस बल में रिक्त पद, सीमित संसाधन, आधुनिक तकनीक का अभाव, बारह से सोलह घंटे तक की ड्यूटी, नियमित अवकाश की कमी और राजनीतिक हस्तक्षेप उसके पेशेवर व्यवहार को प्रभावित करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में संवेदनशील और नागरिक-केंद्रित पुलिसिंग की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है। यदि समाज पुलिस से मानवीय व्यवहार चाहता है, तो उसे भी मानवीय कार्य-परिस्थितियाँ उपलब्ध करानी होंगी।
इसी आवश्यकता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) मामले में व्यापक पुलिस सुधारों के निर्देश दिए थे। राज्य सुरक्षा आयोग, पुलिस प्रमुख का निश्चित कार्यकाल, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण और पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से अपेक्षाकृत मुक्त करने जैसे सुझाव आज भी अधिकांश राज्यों में पूरी तरह लागू नहीं हो सके हैं। जब तक पुलिस को संस्थागत स्वतंत्रता, आधुनिक संसाधन और उत्तरदायित्व के साथ कार्य करने का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी घटनाएँ बार-बार सामने आती रहेंगी।
दिल्ली की घटना हमें यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह संवाद, विश्वास और संवैधानिक मूल्यों से जीवित रहता है। पुलिस की लाठी कभी भी लोकतांत्रिक संवाद का विकल्प नहीं हो सकती। बल प्रयोग यदि अपरिहार्य हो, तो वह न्यूनतम, अनुपातिक और अंतिम उपाय होना चाहिए।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने की है जो छात्रों और पुलिसकर्मियों जैसे समाज के दो संघर्षशील वर्गों को आमने-सामने खड़ा कर देती है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति दमन में नहीं, बल्कि संवाद, न्याय और संस्थागत सुधारों में निहित है। यदि भारत को वास्तव में नागरिक-केंद्रित लोकतंत्र बनाना है, तो पुलिस सुधार अब विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता हैं। तभी पुलिस जनता के लिए भय का नहीं, बल्कि विश्वास और संवैधानिक संरक्षण का प्रतीक बन सकेगी।
Cite as:
Ojha,C. (2026). Politics of Numbers vs Federal Justice: Who Does the New Delimitation Favor?. Eastern Scientist, II(34).
Available at: https://www.easternscientist.in/2026/04/blog-post_17.html
डॉ. चतुरानन ओझा
सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, लेखक, विचारक, सह-संयोजक — समान शिक्षा अधिकार मंच, उत्तर प्रदेश यूनिट
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