क्या 'एक देश–एक परीक्षा' मॉडल असफल हो चुका है? NEET, CUET और भारतीय शिक्षा व्यवस्था का विश्लेषण

क्या एक केंद्रीकृत प्रवेश परीक्षा व्यवस्था वास्तव में समान अवसर सुनिश्चित करती है, या अनजाने में लाखों छात्रों के भविष्य को एक ही परीक्षा पर निर्भर बना देती है? NEET और CUET के अनुभवों की पृष्ठभूमि में यह संपादकीय भारतीय शिक्षा नीति, संघीय ढाँचे और छात्र हितों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
Editorial Analysis
Published: July 23, 2026 | Editor in Chief
Abstract

Has India's One Nation One Examination Model Failed? A Critical Analysis of NEET, CUET and Higher Education Policy

India's adoption of centralized entrance examinations such as NEET and CUET was intended to promote transparency, uniformity, and equal opportunity in higher education admissions. However, recent controversies surrounding alleged examination paper leaks, student protests, and concerns over administrative efficiency have reignited debate about the sustainability of the "One Nation, One Examination" model.
This editorial argues that while a unified examination system reduces the burden of multiple entrance tests, it also concentrates risk. When a single examination is disrupted by technical failures, security breaches, or administrative errors, millions of students lose alternative pathways, often resulting in academic delays, financial burdens on families, psychological stress, and uncertainty. The article further examines the challenges faced by students from rural and digitally disadvantaged backgrounds, the complexity of the CUET admission process, and the implications of centralized admissions for university autonomy and India's federal structure.
The editorial does not advocate a return to the previous fragmented system but recommends a balanced admission framework combining national-level examinations with flexible state and institutional alternatives. It concludes that educational policy should prioritize student opportunity, institutional autonomy, examination integrity, and equitable access rather than excessive centralization.

Keywords:NEET, CUET, One Nation One Examination, Higher Education, Educational Policy, Federalism, Student Rights, Entrance Examination, NTA, India.

NEET Exam-26
भारत में पिछले कुछ वर्षों में उच्च शिक्षा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए "एक देश–एक परीक्षा" की अवधारणा को पारदर्शिता, समान अवसर और प्रशासनिक सरलता के नाम पर लागू किया गया। चिकित्सा शिक्षा के लिए NEET तथा विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए CUET इसी सोच के प्रमुख उदाहरण हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह प्रयोग अपने घोषित उद्देश्यों को पूरा कर पाया है, या इसने नई समस्याओं को जन्म दिया है? NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक के विरोध में छात्रों-युवाओं के आंदोलन, दिल्ली में हुए प्रदर्शन और उस दौरान हुए पुलिस लाठीचार्ज के बाद यह प्रश्न पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गया है। यह बहस केवल किसी मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं है; वास्तविक प्रश्न उस एकल परीक्षा व्यवस्था का है, जिस पर अपेक्षित गंभीर विमर्श अभी भी नहीं हो रहा है। सैद्धांतिक रूप से एक राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था आकर्षक प्रतीत होती है। इससे अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं का बोझ कम होता है, छात्रों को बार-बार परीक्षा नहीं देनी पड़ती और चयन प्रक्रिया में एकरूपता आती है। किंतु किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके व्यावहारिक परिणामों से होता है। यहीं पर "एक देश–एक परीक्षा" की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है। इसने छात्रों के सामने उपलब्ध विकल्पों को समाप्त कर दिया है।

जब किसी छात्र का पूरा भविष्य केवल एक परीक्षा पर निर्भर हो जाता है, तब किसी भी प्रशासनिक, तकनीकी अथवा सुरक्षा संबंधी विफलता का प्रभाव लाखों विद्यार्थियों पर एक साथ पड़ता है। यदि प्रश्नपत्र लीक हो जाए, परीक्षा रद्द हो जाए, परिणाम विवादित हो जाए या परीक्षा किसी कारणवश स्थगित करनी पड़े, तो छात्रों के सामने कोई वैकल्पिक मार्ग नहीं बचता। उन्हें पूरे एक वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। इस प्रतीक्षा की कीमत केवल समय नहीं होती; इसके साथ अभिभावकों पर आर्थिक बोझ, मानसिक तनाव, प्रतियोगी तैयारी का निरंतर दबाव और अनेक मामलों में अवसाद जैसी गंभीर परिस्थितियाँ भी जुड़ जाती हैं।

यह समस्या केवल NEET तक सीमित नहीं है। CUET के अनुभव भी अनेक प्रश्न खड़े करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कस्बों तथा सीमित डिजिटल संसाधनों वाले परिवारों के लिए इसकी आवेदन प्रक्रिया, विषय चयन और तकनीकी बाधाएँ—जैसे सर्वर डाउन होना—अक्सर गंभीर चुनौती बन जाती हैं। परिणामस्वरूप अनेक योग्य विद्यार्थी या तो आवेदन ही नहीं कर पाते, अथवा प्रक्रिया संबंधी त्रुटियों के कारण अपनी पसंद के विश्वविद्यालयों से वंचित रह जाते हैं। जब प्रक्रिया ही सभी के लिए समान रूप से सुलभ न हो, तब समान अवसर का दावा अधूरा रह जाता है।

पूर्व की व्यवस्था में छात्रों के पास विविध विकल्प उपलब्ध थे। चिकित्सा शिक्षा के लिए राज्यों, विभिन्न संस्थानों तथा अन्य प्रवेश प्रणालियों के विकल्प मौजूद थे। इसी प्रकार केंद्रीय विश्वविद्यालयों, राज्य विश्वविद्यालयों और अनेक स्वायत्त संस्थानों की अपनी-अपनी प्रवेश परीक्षाएँ होती थीं। यदि किसी छात्र का एक प्रयास असफल हो जाता या किसी परीक्षा में तकनीकी अथवा प्रशासनिक समस्या उत्पन्न हो जाती, तो अन्य परीक्षाओं के माध्यम से अवसर बने रहते थे। विविध राज्य स्तरीय पाठ्यक्रमों और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप चयन की भी पर्याप्त गुंजाइश रहती थी। इस बहुविकल्पीय व्यवस्था में जोखिम विभाजित रहता था, जबकि आज वह लगभग पूरी तरह केंद्रीकृत हो गया है।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उन छात्रों का है जो किसी अपरिहार्य कारण से परीक्षा नहीं दे पाते। बीमारी, दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा अथवा पारिवारिक संकट जैसी परिस्थितियाँ किसी के भी जीवन में आ सकती हैं। बहु-परीक्षा व्यवस्था में उनके पास दूसरा अवसर उपलब्ध रहता था। आज एक परीक्षा छूट जाने का अर्थ प्रायः पूरे शैक्षणिक वर्ष का नुकसान हो सकता है। क्या यह व्यवस्था वास्तव में छात्र-हितैषी कही जा सकती है?

CUET लागू होने के बाद अनेक विश्वविद्यालयों में बड़ी संख्या में सीटें रिक्त रहने की घटनाएँ भी सामने आई हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, किंतु अत्यधिक केंद्रीकरण और जटिल प्रवेश प्रक्रिया भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। यदि विश्वविद्यालय अपनी स्थानीय आवश्यकताओं और शैक्षणिक प्राथमिकताओं के अनुरूप प्रवेश प्रक्रिया में पर्याप्त लचीलापन नहीं रख सकते, तो उनकी स्वायत्तता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

यहीं यह बहस केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भारत के संघीय लोकतांत्रिक ढाँचे तक पहुँच जाती है। भारतीय संविधान में शिक्षा ऐसा विषय है जिसमें केंद्र और राज्य—दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि प्रवेश प्रणाली केंद्रीकृत हो जाए और राज्यों तथा विश्वविद्यालयों की निर्णय क्षमता लगातार सीमित होती जाए, तो यह संघीय संतुलन पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में प्रत्येक समस्या का समाधान पूर्ण केंद्रीकरण नहीं हो सकता।

इसका अर्थ यह नहीं कि पूर्व की व्यवस्था पूरी तरह दोषरहित थी। अनेक प्रवेश परीक्षाओं के कारण छात्रों पर आर्थिक और मानसिक दबाव भी पड़ता था। समाधान इसलिए पुरानी व्यवस्था की पूर्ण वापसी नहीं, बल्कि एक संतुलित और बहुविकल्पीय मॉडल हो सकता है। राष्ट्रीय स्तर की एक परीक्षा को प्रमुख आधार बनाया जा सकता है, लेकिन राज्यों और विश्वविद्यालयों को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पूरक या वैकल्पिक प्रवेश प्रणाली अपनाने की पर्याप्त स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। साथ ही, परीक्षा से वंचित रह जाने वाले छात्रों के लिए अतिरिक्त अवसर, मजबूत परीक्षा सुरक्षा तंत्र, सरल आवेदन प्रक्रिया तथा डिजिटल असमानताओं को कम करने के ठोस उपाय भी अनिवार्य हैं।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत में 10+2 शिक्षा प्रणाली पूरी तरह एकरूप नहीं है। विभिन्न राज्यों के अलग-अलग पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रणालियाँ और शिक्षण स्तर हैं। ऐसे में विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों का अचानक एक ही राष्ट्रीय परीक्षा के आधार पर मूल्यांकन करना अव्यवहारिक हो जाता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की संस्थागत क्षमता का भी है। वर्तमान व्यवस्था में इतनी विशाल और संवेदनशील परीक्षा प्रणाली का संचालन एक ऐसी संस्था के हाथों में है, जहाँ परीक्षा प्रबंधन की तुलना में प्रशासनिक ढाँचे की प्रधानता अधिक दिखाई देती है। परीक्षा संचालन के लिए बड़ी मात्रा में निजी एजेंसियों और आउटसोर्स व्यवस्था पर निर्भरता बढ़ जाती है, जिससे गोपनीयता, समन्वय और सुरक्षा संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैं। यदि देश के करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी परीक्षा प्रणाली का केंद्रीकरण किया जाता है, तो उसके अनुरूप संस्थागत क्षमता, तकनीकी संसाधन और जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए।

भारत की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल परीक्षाएँ आयोजित करना नहीं, बल्कि प्रतिभा को अवसर देना होना चाहिए। यदि कोई व्यवस्था लाखों छात्रों के भविष्य को केवल एक दिन, एक प्रश्नपत्र और एक परीक्षा पर निर्भर कर देती है, तो उसके प्रभावों का गंभीर और निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है। शिक्षा में दक्षता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण हैं लचीलापन, विकल्प, समान अवसर और न्यायपूर्ण पहुँच।

आज आवश्यकता किसी नारे की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा नीति की है जो प्रशासनिक सुविधा और छात्र-हित के बीच संतुलन स्थापित कर सके। छात्रों के आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न मानकर दबाने के बजाय उनके पीछे मौजूद नीतिगत चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और संवाद, किसी भी सुधार प्रक्रिया के अनिवार्य आधार होते हैं।

क्योंकि अंततः किसी देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी परीक्षा प्रणाली नहीं, बल्कि उसके युवाओं की संभावनाएँ होती हैं। इसलिए समय आ गया है कि "एक देश–एक परीक्षा" की अवधारणा का निष्पक्ष, तथ्याधारित और व्यापक पुनर्मूल्यांकन किया जाए, ताकि शिक्षा व्यवस्था प्रशासनिक सुविधा के बजाय विद्यार्थियों के भविष्य को केंद्र में रखकर विकसित हो सके।

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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