लोकतांत्रिक विरोध का बदलता परिदृश्य: जंतर-मंतर से उठते सवाल

क्या जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन है, या यह भारतीय लोकतंत्र में जनभागीदारी, गांधीवादी सत्याग्रह और बदलते राज्य-सामाजिक संबंधों के गहरे संकट का संकेत है? डॉ. आनंद तेलतुंबड़े का यह विश्लेषण आंदोलन की रणनीति, लोकतांत्रिक राजनीति और विरोध के बदलते स्वरूप पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
Public Discourse
Published: July 24| 2026 | डॉ.चतुरानन ओझा

Changing Dynamics of Democratic Protest: Why the Jantar Mantar Movement Failed to Become a Mass Movement

This article by Dr. Anand Teltumbde examines why the prolonged protest at Delhi's Jantar Mantar—centered on examination scandals, youth unemployment, and the demand for the resignation of the Union Education Minister—failed to evolve into a nationwide people's movement despite affecting millions of students and families.
The author argues that the movement's principal weakness lay in its strategy. By focusing on the resignation of a single minister, the protest personalized what is fundamentally a structural crisis involving examination integrity, commercialization of education, institutional failures, and chronic unemployment. Replacing an individual, he contends, cannot resolve systemic problems.
The article further questions the continued effectiveness of Gandhian methods such as indefinite hunger strikes in contemporary India. While fasting once served as a powerful political instrument, its success historically depended on broader mass mobilization, public sympathy, institutional responsiveness, and political costs imposed on those in power. Gandhi's fasts succeeded not because fasting itself possessed inherent political force, but because they were embedded within a massive national movement supported by public opinion, political organizations, and an international audience.
Drawing on historical examples—including Potti Sriramulu, Irom Sharmila, Swami Sanand (G.D. Agrawal), and recent movements such as the farmers' protest—the author argues that moral sacrifice alone rarely compels governments to act. Political concessions generally occur only when sustained mass mobilization creates significant electoral, administrative, or political costs.
A central theme of the article is the transformation of the Indian state over the past decade. According to the author, increasing centralization of executive authority, weakening institutional checks and balances, concentration of political communication, and the systematic delegitimization of dissent have fundamentally altered the relationship between the state and democratic protest. Governments have become increasingly capable of absorbing prolonged criticism while avoiding meaningful engagement with protesters.
The article also explores why ordinary citizens hesitate to participate in protests. Beyond fear of surveillance, legal action, or state repression, widespread economic insecurity, unemployment, inflation, and precarious livelihoods leave many people without the resources or confidence to engage in sustained political action. Repeated experiences of unsuccessful movements have also weakened public belief that collective action can produce meaningful political change.
The author concludes that the real crisis is not merely the failure of a particular protest but the growing disconnect between public grievances and collective democratic action. Democratic resistance has not become obsolete; however, inherited methods of protest can no longer be assumed to be universally effective. Each historical period requires strategies suited to its own political conditions.
Ultimately, the article argues that India's youth face a challenge far greater than demanding the resignation of a minister. They must develop new forms of organization, solidarity, and political imagination capable of responding to the realities of a transformed democratic landscape. Moral courage remains essential, but without innovative strategy and broad social mobilization, even the most sincere acts of sacrifice are unlikely to generate lasting political change.

दिल्ली लाठी चार्ज
सोसल मीडिया से साभार

भारतीय राज्य और लोकतांत्रिक विरोध का बदलता संबंध

डॉ. आनंद तेलतुंबड़े के इस लेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि शिक्षा, बेरोज़गारी और परीक्षा घोटालों जैसे करोड़ों युवाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन व्यापक जनसमर्थन क्यों प्राप्त नहीं कर सका। लेखक का मानना है कि यह केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे या किसी एक आंदोलन की विफलता का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, राज्य और विरोध की राजनीति में आए गहरे परिवर्तन का संकेत है।

लेखक प्रारंभ में स्पष्ट करते हैं कि वे मनमानी सत्ता के विरुद्ध हर लोकतांत्रिक संघर्ष के समर्थक हैं, किंतु किसी आंदोलन की नैतिकता उसे रणनीतिक समीक्षा से मुक्त नहीं करती। उनके अनुसार केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग एक संरचनात्मक संकट को व्यक्ति विशेष तक सीमित कर देती है। परीक्षा-पत्र लीक होना, भर्ती घोटाले, शिक्षा का व्यवसायीकरण और बढ़ती बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ किसी एक मंत्री की विफलता नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक और संस्थागत ढाँचे की उपज हैं। ऐसे में यदि मंत्री बदल भी जाएँ, तो समस्याओं की जड़ें यथावत बनी रहेंगी।

लेख में आंदोलन की रणनीति की भी आलोचना की गई है। प्रारंभ में आंदोलन ने "क्या होगा यदि सभी तिलचट्टे एक साथ आ जाएँ?" जैसे रचनात्मक नारे के माध्यम से बेरोज़गार युवाओं के अपमान को सामूहिक प्रतिरोध में बदलने का प्रयास किया था। इसने व्यापक सामाजिक एकजुटता की संभावना पैदा की थी, किंतु बाद में आंदोलन पारंपरिक गांधीवादी आमरण अनशन तक सीमित हो गया। लेखक के अनुसार सरकार अब इस प्रकार के विरोध से निपटने के लिए पहले से तैयार रहती है, इसलिए इस रणनीति की प्रभावशीलता कम हो गई है।

लेखक सोनम वांगचुक के अनशन का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि उनके स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति के बावजूद सरकार पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ा। इसी प्रकार प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल के गंगा संरक्षण आंदोलन और लंबे किसान आंदोलन का उल्लेख करते हुए लेखक कहते हैं कि वर्तमान शासन लंबे समय तक नैतिक दबाव और सार्वजनिक आलोचना को सहन करने की क्षमता विकसित कर चुका है। किसान आंदोलन में भी सरकार तभी पीछे हटी जब व्यापक राजनीतिक और चुनावी दबाव उत्पन्न हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि केवल नैतिक अपील अब पर्याप्त नहीं रह गई है।

लेख का एक महत्वपूर्ण भाग गांधीवादी सत्याग्रह की ऐतिहासिक समीक्षा है। लेखक के अनुसार गांधी के उपवास अपने-आप में प्रभावशाली नहीं थे, बल्कि वे पहले से चल रहे विशाल राष्ट्रीय आंदोलन, कांग्रेस संगठन, राष्ट्रवादी प्रेस, अंतरराष्ट्रीय जनमत और गांधी की असाधारण नैतिक प्रतिष्ठा से समर्थित थे। ब्रिटिश शासन भी अंतरराष्ट्रीय छवि और लोकतांत्रिक वैधता को लेकर संवेदनशील था, इसलिए गांधी के अनशन राजनीतिक दबाव का माध्यम बन सके। इस ऐतिहासिक संदर्भ को नज़रअंदाज़ कर आज के भारत में उन्हीं तरीकों को यथावत अपनाना एक रणनीतिक भूल है।

स्वतंत्र भारत के अनेक उदाहरण भी लेखक प्रस्तुत करते हैं। पोट्टी श्रीरामुलु के अनशन से तत्काल आंध्र राज्य नहीं बना; उनकी मृत्यु के बाद उत्पन्न व्यापक जनआक्रोश और प्रशासनिक संकट ने सरकार को निर्णय लेने के लिए बाध्य किया। इसी प्रकार दर्शन सिंह फेरुमान, इरोम शर्मिला और प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल के लंबे अनशन अपने घोषित उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सके। इन उदाहरणों से लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि अनशन तभी प्रभावी होता है जब उसके पीछे व्यापक सामाजिक लामबंदी हो, अन्यथा वह केवल व्यक्तिगत बलिदान बनकर रह जाता है।

लेख का दूसरा प्रमुख तर्क भारतीय राज्य के चरित्र में आए परिवर्तन से संबंधित है। लेखक के अनुसार स्वतंत्रता के बाद का भारतीय लोकतंत्र भी अनेक कमियों से ग्रस्त था, लेकिन वह संसद, न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस और जनमत के प्रति अपेक्षाकृत उत्तरदायी था। चुनावी प्रतिस्पर्धा सरकारों को जनआंदोलनों के प्रति संवेदनशील बनाए रखती थी। परंतु पिछले दशक में राजनीतिक संचार का केंद्रीकरण, कार्यपालिका की बढ़ती शक्ति, संस्थागत संतुलन का कमजोर होना और असहमति को लगातार बदनाम करने की प्रवृत्ति ने इस लोकतांत्रिक संरचना को बदल दिया है। अब सत्ता का लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि राजनीतिक वातावरण को इस प्रकार नियंत्रित करना भी है कि विरोध की क्षमता न्यूनतम हो जाए।

लेखक एंटी-सीएए आंदोलन, पहलवानों के आंदोलन, अग्निपथ विरोध, परीक्षा घोटालों के खिलाफ आंदोलनों तथा लद्दाख के प्रश्न पर सोनम वांगचुक के संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि सरकार का सामान्य रवैया संवाद स्थापित करने के बजाय आंदोलनों को टालने, विभाजित करने या उन्हें बदनाम करने का रहा है। किसान आंदोलन इसका अपवाद प्रतीत होता है, किंतु वहाँ भी सरकार ने केवल तब निर्णय बदला जब लंबे समय तक चले आंदोलन ने महत्वपूर्ण राजनीतिक लागत उत्पन्न कर दी। इससे स्पष्ट होता है कि आज की परिस्थितियों में नैतिक आग्रह की अपेक्षा संगठित राजनीतिक शक्ति अधिक प्रभावी है।

लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि जंतर-मंतर का आंदोलन जनआंदोलन इसलिए नहीं बन सका क्योंकि केवल संगठनात्मक कमजोरी ही इसका कारण नहीं है। समाज में भय, आर्थिक असुरक्षा और राजनीतिक निराशा गहराई से फैल चुकी है। बेरोज़गारी, अस्थायी रोजगार, बढ़ती महँगाई, कर्ज़ और जीवनयापन की कठिनाइयों ने लोगों को निरंतर संघर्ष में उलझा दिया है। साथ ही कानूनों, जाँच एजेंसियों, निगरानी व्यवस्था और दमनात्मक कार्रवाइयों के कारण सार्वजनिक आंदोलनों में भाग लेना अधिक जोखिमपूर्ण प्रतीत होने लगा है। परिणामस्वरूप लोग समस्याओं को समझते हुए भी सक्रिय भागीदारी से बचते हैं।

लेख का सबसे गंभीर निष्कर्ष यह है कि नागरिकों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास कमजोर पड़ता जा रहा है। जब लोग बार-बार बड़े आंदोलनों को निष्फल होते देखते हैं, तो उनके भीतर यह धारणा बनती है कि विरोध करने से परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं। यह राजनीतिक उदासीनता नहीं, बल्कि राजनीतिक पराजय की भावना है। ऐसी स्थिति में समाज निजी जीवन तक सीमित होने लगता है और लोकतांत्रिक सहभागिता घटती चली जाती है।

अंततः लेखक का निष्कर्ष है कि लोकतांत्रिक विरोध समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसे अपने तरीकों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। गांधी को त्यागने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनकी राजनीतिक सृजनात्मकता से सीख लेने की आवश्यकता है। प्रत्येक युग अपने अनुरूप संघर्ष की नई रणनीतियाँ विकसित करता है। आज की परिस्थितियों में केवल नैतिक साहस पर्याप्त नहीं; उसके साथ प्रभावी संगठन, व्यापक सामाजिक एकजुटता और नई राजनीतिक रणनीतियाँ भी आवश्यक हैं। यदि लोकतंत्र को पुनः सशक्त बनाना है तो विरोध की नई भाषाएँ, नए संगठनात्मक ढाँचे और नई जनसक्रियता विकसित करनी होगी, जो बदल चुके राज्य-सामाजिक संबंधों के अनुरूप हों। लेखक के अनुसार जंतर-मंतर का सबसे बड़ा सबक यही है कि वर्तमान भारत में लोकतांत्रिक आंदोलनों की सफलता केवल परंपरागत प्रतीकों और पुराने तरीकों पर निर्भर नहीं रह सकती; उन्हें नए युग की राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुसार स्वयं को रूपांतरित करना होगा।

Cite as:
Ojha,C. (2026). Politics of Numbers vs Federal Justice: Who Does the New Delimitation Favor?. Eastern Scientist, II(34). Available at: https://www.easternscientist.in/2026/04/blog-post_17.html

Dr. Chaturanand Ojha

डॉ. चतुरानन ओझा

सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, लेखक, विचारक, सह-संयोजक — समान शिक्षा अधिकार मंच, उत्तर प्रदेश यूनिट


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