Abstract: The collapse of a student hostel in Delhi raises serious questions about the safety and affordability of accommodation for students. Thousands of young people from across India come to Delhi for university education and competitive examinations, often living in inexpensive and poorly maintained rented rooms, PGs and hostels. The responsibility cannot rest solely on students and their families. Universities, the Delhi government and local authorities must ensure safe and affordable student housing. At the same time, the larger question remains: why must students travel to Delhi for quality education? India needs stronger universities, academic infrastructure and competitive-exam ecosystems across its regions so that educational opportunity is not concentrated in a single metropolis.
सबसे पहला सवाल दिल्ली विश्वविद्यालय से है—क्या विश्वविद्यालय अपने छात्रों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है? विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने वाला छात्र केवल कक्षा और पुस्तकालय का विद्यार्थी नहीं होता। वह उसी विश्वविद्यालय की व्यवस्था का हिस्सा होता है। यदि उसके रहने की जगह ही असुरक्षित है तो शिक्षा की गुणवत्ता और संस्थान की प्रतिष्ठा पर गर्व करने का क्या अर्थ है? लेकिन सवाल केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है।।
देश के हजारों छात्र हर वर्ष सिविल सर्विसेज, न्यायिक सेवाओं, बैंकिंग, रेलवे, एसएससी और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिल्ली आते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन युवाओं की होती है जो निम्न-मध्यम आय या मध्यम आय वाले परिवारों से आते हैं। उनके पास महंगे निजी आवास या सुरक्षित अपार्टमेंट का विकल्प नहीं होता। वे किराए के छोटे कमरों, पुराने मकानों, पीजी और छात्रावासों में रहते हैं। और यहीं से एक दूसरा प्रश्न सामने आता है—क्या दिल्ली केवल उन युवाओं से उनकी प्रतिभा और आर्थिक गतिविधि लेने के लिए जिम्मेदार है, या उनके जीवन और सुरक्षा की भी कोई जिम्मेदारी उसकी है?।
इन छात्रों के आने से दिल्ली की अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। वे किराया देते हैं, भोजनालयों और दुकानों में खर्च करते हैं, परिवहन का उपयोग करते हैं और विभिन्न प्रकार के स्थानीय करों तथा आर्थिक गतिविधियों में योगदान देते हैं। जब किसी शहर की अर्थव्यवस्था में ये युवा योगदान करते हैं तो उनके लिए सुरक्षित और किफायती आवास की व्यवस्था को केवल निजी समस्या मान लेना उचित नहीं लगता। दिल्ली सरकार और स्थानीय निकायों को यह सोचना होगा कि राजधानी में आने वाले विद्यार्थियों के लिए सस्ती, सुरक्षित और नियमन के अधीन छात्र आवास व्यवस्था क्यों नहीं विकसित की जा सकती?।
हर छात्र को सरकारी आवास देना संभव नहीं होगा। लेकिन विश्वविद्यालयों, दिल्ली सरकार, नगर निकायों और निजी क्षेत्र के सहयोग से बड़े पैमाने पर सुरक्षित छात्रावास और किराए के आवास विकसित किए जा सकते हैं। पुराने और जर्जर भवनों की अनिवार्य सुरक्षा जांच हो सकती है। छात्रावासों और पीजी के लिए न्यूनतम सुरक्षा मानक निर्धारित किए जा सकते हैं। भवन की संरचनात्मक सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा और आपातकालीन निकासी जैसी व्यवस्थाओं की नियमित जांच होनी चाहिए। छात्र के लिए सस्ता कमरा, उसकी जान से सस्ता नहीं हो सकता। लेकिन इस पूरी बहस का सबसे बड़ा प्रश्न इससे भी आगे जाता है।।
आखिर देश का एक युवा अच्छी शिक्षा और बेहतर अवसर के लिए बार-बार दिल्ली आने को मजबूर क्यों है? दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और राजधानी के दूसरे संस्थानों ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी दिल्ली लंबे समय से एक बड़ा केंद्र बनी हुई है। इसका अर्थ यह है कि देश के अनेक हिस्सों में अभी भी ऐसी शैक्षणिक पारिस्थितिकी नहीं बन पाई है, जहाँ छात्र अपने घर के निकट ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पुस्तकालय, शोध-संसाधन, प्रशिक्षित शिक्षक और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की सुविधाएँ पा सकें। यह केवल दिल्ली की समस्या नहीं, देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की क्षेत्रीय असमानता का प्रश्न है।।
यदि बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, असम, पूर्वोत्तर, मध्य भारत, राजस्थान या दक्षिण भारत के किसी छोटे शहर का प्रतिभाशाली विद्यार्थी बेहतर शिक्षा के लिए हजार किलोमीटर दूर दिल्ली आने को विवश है, तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि दिल्ली में उसके रहने की व्यवस्था कैसी है। हमें यह भी पूछना चाहिए कि उसके अपने राज्य और क्षेत्र में वैसी शिक्षा व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई?।
शिक्षा का विकेंद्रीकरण केवल विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने से नहीं होगा। इसके लिए अच्छे शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम, शोध-संरचना, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ, डिजिटल संसाधन, छात्रावास और रोजगार से जुड़ी शिक्षा—सब कुछ स्थानीय स्तर पर विकसित करना होगा। देश की राजधानी को शिक्षा का अकेला चुंबक बनाकर हम लाखों युवाओं को अनावश्यक रूप से महंगे शहरों की ओर धकेल रहे हैं। परिणाम यह है कि शिक्षा पाने की लागत केवल फीस नहीं रह जाती; उसमें किराया, भोजन, परिवहन और असुरक्षित आवास का जोखिम भी जुड़ जाता है। इसलिए साउथ कैंपस की घटना को केवल एक भवन दुर्घटना मानकर भूल जाना खतरनाक होगा।।
यह घटना तीन अलग-अलग सवाल एक साथ हमारे सामने रखती है— क्या हमारे विश्वविद्यालय अपने छात्रों को सुरक्षित आवास दे रहे हैं? क्या हमारे महानगर उन युवाओं के लिए किफायती और सुरक्षित आवास की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं, जिनसे उनकी अर्थव्यवस्था लाभान्वित होती है? और सबसे महत्वपूर्ण— आखिर अच्छी शिक्षा के लिए देश के युवाओं को दिल्ली ही क्यों आना पड़ता है?।
जब तक इन तीनों सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक किसी छात्रावास का गिरना केवल एक इमारत का हादसा नहीं रहेगा। वह हमारी शिक्षा व्यवस्था, शहरी नियोजन और सामाजिक जिम्मेदारी—तीनों की परीक्षा लेता रहेगा। देश के हर युवा को शिक्षा के लिए राजधानी तक आने की जरूरत न पड़े—यही किसी संतुलित और लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था की असली सफलता होगी।
Dr. R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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