अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : उत्सव नहीं, संघर्ष की स्मृति

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Print ISSN: 2581-7884 | Volume I | Issue 34 | January–March 2026 |

   Editorial    

हर वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस बड़े उत्साह, औपचारिक भाषणों और सम्मान समारोहों के साथ मनाया जाता है। सभागार सजते हैं, मंचों पर रोशनी होती है, कुछ प्रतिष्ठित महिलाओं को शाल-माला और स्मृति-चिह्न दिए जाते हैं और फिर यह घोषणा कर दी जाती है कि महिला सशक्तिकरण का पर्व सम्पन्न हुआ। परंतु प्रश्न यह है कि क्या सचमुच यही इस दिवस का उद्देश्य है?

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस किसी पौराणिक आदर्श स्त्री के गुणगान का अवसर नहीं है। इसका जन्म श्रम और संघर्ष की उस ऐतिहासिक पुकार से हुआ था जब 1908 में कामगार महिलाओं ने आठ घंटे के कार्यदिवस, उचित वेतन और मानवीय कार्य-स्थितियों की माँग को लेकर आंदोलन किया। यह दिवस उन श्रमिक स्त्रियों की स्मृति है जिन्होंने अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस किया। विडम्बना यह है कि आज के अधिकांश आयोजनों में इस इतिहास का उल्लेख तक नहीं होता।

आज मंचों पर देवी, नायिका और आदर्श स्त्री के प्रतीकों का गुणगान होता है, परन्तु उन स्त्रियों का नाम तक नहीं लिया जाता जो वास्तव में समाज की रीढ़ हैं। वे स्त्रियाँ जो ईंट-भट्टों पर तपती धूप में काम करती हैं, सड़कों और भवनों के निर्माण में अपना श्रम लगाती हैं, खेतों में मजदूरी करती हैं और फिर भी न्यूनतम मजदूरी, कुपोषण और शोषण से जूझती हैं। इसी तरह देश के अनेक आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं का जीवन विकास की मुख्यधारा से बहुत दूर है। जंगल, भूमि और आजीविका से जुड़े संघर्षों के बीच आदिवासी महिलाएँ दोहरे-तिहरे शोषण का सामना करती हैं—एक ओर गरीबी और विस्थापन का दबाव, दूसरी ओर सामाजिक असुरक्षा और उपेक्षा।

महिला शिक्षा और स्वतंत्रता के दावों के बीच भी वास्तविकता यह है कि महिला उत्पीड़न, बलात्कार, अपहरण और हत्या की घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं। हाल के वर्षों में मणिपुर की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था, जहाँ हिंसा और सामुदायिक तनाव के बीच महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार की तस्वीरें सामने आईं। यह केवल किसी एक प्रदेश की त्रासदी नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि संकट और हिंसा के समय सबसे पहले और सबसे अधिक असुरक्षित स्त्री ही होती है।

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। युद्धकालीन परिस्थितियों में दुनिया के अनेक हिस्सों में महिलाओं की स्थिति और भी भयावह हो जाती है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, युद्ध और संघर्षों के समय स्त्री-देह को अक्सर सत्ता, प्रतिशोध और दमन के औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। शरणार्थी शिविरों से लेकर युद्धग्रस्त क्षेत्रों तक महिलाओं को हिंसा, विस्थापन और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।

धन, प्रभाव और राजनीतिक संरक्षण के गठजोड़ में स्त्री-शोषण कई बार दबा भी दिया जाता है। तथाकथित एप्सटीन फ़ाइल्स जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रकरण यह संकेत देते हैं कि दुनिया की उच्चतम आर्थिक और राजनीतिक परतों तक में महिलाओं और किशोरियों के शोषण के आरोप किस प्रकार मौजूद रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्त्री की असुरक्षा केवल गरीबी की देन नहीं है; कई बार यह सत्ता और विशेषाधिकार की भी उपज होती है।

विडम्बना यह है कि महिला दिवस के अधिकांश आयोजन इन कठोर प्रश्नों से बचते दिखाई देते हैं। वहाँ संघर्ष की चर्चा कम और आत्मप्रशंसा अधिक होती है। यह दिवस धीरे-धीरे अभिजात, उच्च शिक्षित और पदासीन वर्ग का उत्सव बनता जा रहा है, जहाँ वास्तविक श्रमजीवी स्त्री, आदिवासी स्त्री और संघर्षरत स्त्री की उपस्थिति लगभग अदृश्य है।

यदि महिला दिवस सचमुच सार्थक बनना है तो उसे मंचों की रोशनी से निकलकर समाज की वास्तविकता में उतरना होगा। उसे उन स्त्रियों की आवाज बनना होगा जो खेतों, जंगलों, कारखानों, भट्टों और घरों के भीतर मौन श्रम कर रही हैं, और उन स्त्रियों की भी जो हिंसा, विस्थापन और युद्ध की त्रासदी झेल रही हैं।

जब तक समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ी स्त्री को सम्मानजनक जीवन, श्रम का उचित मूल्य और सुरक्षा का भरोसा नहीं मिलता, तब तक महिला दिवस का उत्सव अधूरा ही रहेगा। महिला दिवस की सच्ची श्रद्धांजलि मंचों पर दिए गये भाषण नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने की प्रतिबद्धता है जो आज भी स्त्री को बराबरी से दूर रखती है।

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