Abstract (Hindi)
होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि पुराने वर्ष की विदाई और नवचक्र के स्वागत का प्रतीक है।पूर्णिमान्त परम्परा में फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष का अंतिम दिन है, और इसके बाद चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से नवचक्र आरम्भ होता है।अमान्त परम्परा में फाल्गुन अमावस्या के बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नववर्ष का प्रारम्भ है।जो आजकल प्रचारित किया जा रहा है लेकिन लोक आज होली के दिन ही चैत्र नववर्ष मनाया जाता है।इस दृष्टि से होली—बीते संवत के दुख कटुता जड़ता का दहन नवजीवन का आह्वान और समय-चक्र के पुनर्जन्म का उत्सव है।होली केवल रंग नहीं,समय-चक्र के पुनर्जन्म का उत्सव है।होली केवल रंग नहीं, यह भारतीय नववर्ष की दहलीज़ है।
भारतीय कालगणना प्रणाली विश्व की प्राचीनतम और वैज्ञानिक परम्पराओं में से एक है। विक्रम संवत्, जिसका प्रारम्भ 57 ईसा पूर्व माना जाता है, भारतीय सांस्कृतिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसका नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है। यह प्रश्न उठता है कि क्या यह अमान्त गणना पर आधारित है, तथा विक्रम संवत् से पूर्व कौन-सी पद्धतियाँ प्रचलित थीं। प्रस्तुत शोध-निबंध में अमान्त और पूर्णिमान्त परम्पराओं, वैदिक कालगणना, मालव संवत्, तथा खगोलीय आधारों का विश्लेषण किया गया है। भारतीय कालगणना की प्राचीन परम्परा में वर्ष का समापन फाल्गुन पूर्णिमा पर माना जाता था।
मुख्य शब्द-होली , नववर्ष ,विक्रमसंवत ,भारतीयसंस्कृति ,कालचक्र
1. प्रस्तावना
भारतीय
सभ्यता में “काल” केवल गणना का विषय नहीं, बल्कि
दार्शनिक चिन्तन का भी केन्द्र रहा है। वेदों में ‘काल’ को ब्रह्म का ही एक आयाम
माना गया है। कालचक्र की यह अवधारणा भारतीय पंचांग-निर्माण का आधार बनी।
वर्ष, ऋतु, मास,
पक्ष और तिथि— इन सबकी गणना चन्द्रमा और
सूर्य की गतियों के समन्वय से की गई। इसी पृष्ठभूमि में विक्रम संवत् का उद्भव और
उसका नववर्ष-निर्धारण समझा जाना चाहिए।
2. वैदिक काल में वर्षारम्भ
ऋग्वेद
और यजुर्वेद में वर्ष (संवत्सर) का उल्लेख मिलता है। वैदिक काल में वर्ष का
सम्बन्ध मुख्यतः ऋतुचक्र से था।तैत्तिरीय संहिता (1.4.14) तथा
शतपथ ब्राह्मण में वसन्त को
यज्ञों का प्रारम्भिक काल कहा गया है। इससे संकेत मिलता है कि वर्षारम्भ वसन्त से
सम्बद्ध था।वसन्त
ऋतु का प्रारम्भ चैत्र मास से माना जाता था। इस प्रकार चैत्र को वर्ष का प्रथम मास
स्वीकार करने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है।
3. चान्द्र मास की दो पद्धतियाँ :
अमान्त और पूर्णिमान्त-भारतीय
चान्द्र गणना में दो प्रमुख परम्पराएँ विकसित हुईं—
(क) अमान्त पद्धति
-मास का अंत
अमावस्या को।
-अमावस्या के
अगले दिन (शुक्ल प्रतिपदा) से नया मास आरम्भ।
-दक्षिण और
पश्चिम भारत में अधिक प्रचलित।
यदि
फाल्गुन अमावस्या को वर्ष समाप्त हो और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष आरम्भ हो, तो यह अमान्त पद्धति है।
-मास का अंत
पूर्णिमा को।
-पूर्णिमा के
अगले दिन (कृष्ण प्रतिपदा) से नया मास।
-उत्तर भारत में
परम्परागत रूप से प्रचलित।
-इस
पद्धति में फाल्गुन पूर्णिमा (होली) के बाद चैत्र कृष्ण से नया मास आरम्भ होता है।
4. विक्रम संवत् का उद्भव
इतिहासकारों
के अनुसार विक्रम संवत् का प्रारम्भ 57 ईसा
पूर्व हुआ। प्रारम्भिक अभिलेखों में इसे “मालव संवत्” कहा गया है।
5. फाल्गुन पूर्णिमा और
वर्ष-समापन का प्रश्न
कुछ
प्राचीन परम्पराओं में वर्ष का समापन फाल्गुन पूर्णिमा पर माना गया। इसका कारण
स्पष्ट है—
-फाल्गुन
पूर्णिमा शीत ऋतु के अंत और वसन्त के आगमन का प्रतीक है।
-होली उत्सव
सामाजिक और कृषिगत नवचक्र का संकेत देता है।
पूर्णिमान्त
परम्परा में फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष के अंतिम मास का समापन बिंदु है। इसके बाद
चैत्र कृष्ण से नवचक्र प्रारम्भ होता है।
परन्तु
अमान्त परम्परा में फाल्गुन अमावस्या के साथ वर्ष समाप्त होता है और चैत्र शुक्ल
प्रतिपदा से नया वर्ष प्रारम्भ।
6. खगोलीय आधार
भारतीय
पंचांग केवल धार्मिक आस्था पर आधारित नहीं, बल्कि
खगोलीय गणनाओं पर आधारित है।
सूर्यसिद्धांत
में चन्द्र और सूर्य की गतियों के समन्वय से मास और वर्ष की गणना का विस्तृत विवरण
है।
चैत्र
शुक्ल प्रतिपदा के समय—
- सूर्य प्रायः मीन राशि में होता है और शीघ्र ही मेष संक्रांति की ओर अग्रसर होता है।
- वसन्त विषुव (Spring
Equinox) के आसपास का समय होता है।
7. विक्रम संवत् और अमान्त गणना का सम्बन्ध
वर्तमान में विक्रम संवत् का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ माना जाता है।
यदि वर्ष का समापन फाल्गुन अमावस्या पर स्वीकार किया जाए, तो यह स्पष्टतः अमान्त परम्परा है।
- कलियुग
संवत् (3102 ई.पू.) – ज्योतिषीय गणनाओं में।
- सप्तर्षि
संवत् (लौकिक संवत्) – कश्मीर में प्रचलित।
- शक
पूर्व राजकीय वर्ष-गणनाएँ – नन्द, मौर्य आदि के काल में।
9. सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को—
- सृष्टि-आरम्भ का दिन (ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचना)
- मर्यादा पुरुषोत्तम राम का राज्याभिषेक (कुछ परम्पराओं में)
- युगादि, गुड़ी पड़वा, नवसंवत्सर
यह केवल कालगणना का आरम्भ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जन्म का प्रतीक है।
संदर्भ ग्रन्थ
- सूर्यसिद्धांत
- शतपथ ब्राह्मण
- तैत्तिरीय
संहिता
- धर्मशास्त्र
(मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति)
- डॉ. पी.वी.
काणे – History of Dharmashastra
- बी.एन. नारायण
– Indian
Astronomy
- ए.एल. बाशम – The Wonder That Was India
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