विक्रम संवत्, अमान्त–पूर्णिमान्त परम्परा और भारतीय कालगणना (होली पर विशेष)

Research Article
Eastern Scientist Journal | Print ISSN: 2581-7884 |Volume I | Issue 34 | January-March 2026 | Paper ID: E33/06  
डॉ.आर.अचल पुलस्तेय
 ORCID ID/0009-0002-8240-2689

Abstract (Hindi)

होली केवल रंगों का पर्व नहींबल्कि पुराने वर्ष की विदाई और नवचक्र के स्वागत का प्रतीक है।पूर्णिमान्त परम्परा में फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष का अंतिम दिन हैऔर इसके बाद चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से नवचक्र आरम्भ होता है।अमान्त परम्परा में फाल्गुन अमावस्या के बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नववर्ष का प्रारम्भ है।जो आजकल प्रचारित किया जा रहा है लेकिन लोक आज होली के दिन ही चैत्र नववर्ष मनाया जाता है।इस दृष्टि से होली—बीते संवत के दुख कटुता जड़ता का दहन नवजीवन का आह्वान और समय-चक्र के पुनर्जन्म का उत्सव है।होली केवल रंग नहीं,समय-चक्र के पुनर्जन्म का उत्सव है।होली केवल रंग नहींयह भारतीय नववर्ष की दहलीज़ है।
भारतीय कालगणना प्रणाली विश्व की प्राचीनतम और वैज्ञानिक परम्पराओं में से एक है। विक्रम संवत्जिसका प्रारम्भ 57 ईसा पूर्व माना जाता हैभारतीय सांस्कृतिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसका नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है। यह प्रश्न उठता है कि क्या यह अमान्त गणना पर आधारित हैतथा विक्रम संवत् से पूर्व कौन-सी पद्धतियाँ प्रचलित थीं। प्रस्तुत शोध-निबंध में अमान्त और पूर्णिमान्त परम्पराओंवैदिक कालगणनामालव संवत्तथा खगोलीय आधारों का विश्लेषण किया गया है। भारतीय कालगणना की प्राचीन परम्परा में वर्ष का समापन फाल्गुन पूर्णिमा पर माना जाता था।
मुख्य शब्द-होली , नववर्ष ,विक्रमसंवत ,भारतीयसंस्कृति ,कालचक्र

Abstract (English)
Holi is not merely a festival of colors; it is a symbol of bidding farewell to the old year and welcoming the new cycle of time. In the Purnimanta tradition, the full moon of Phalguna marks the last day of the year, and the new cycle begins with Chaitra Krishna Pratipada. In the Amanta tradition, the new year commences with Chaitra Shukla Pratipada following the new moon of Phalguna. Although the latter system is widely propagated today, in popular tradition the Chaitra New Year is often associated with the day of Holi itself.
From this perspective, Holi signifies the burning of the sorrows, bitterness, and inertia of the departing Samvat, an invocation of new life, and the celebration of the rebirth of the cycle of time. Holi is not merely about colors; it is the threshold of the Indian New Year.
The Indian calendrical system is among the most ancient and scientific traditions in the world. The Vikram Samvat, traditionally believed to have begun in 57 BCE, holds a significant place in Indian cultural life. Its New Year starts with Chaitra Shukla Pratipada. This raises important questions: Is it based on the Amanta system of calculation? And which calendrical systems were prevalent before the Vikram Samvat?
The present research essay analyzes the Amanta and Purnimanta traditions, Vedic time-reckoning, the Malava Samvat, and their astronomical foundations. In the ancient Indian calendrical tradition, the year was considered to conclude on the full moon of Phalguna.
Keywords: Holi, New Year, Vikram Samvat, Indian Culture, Cycle of Time.

1. प्रस्तावना
भारतीय सभ्यता में “काल” केवल गणना का विषय नहीं, बल्कि दार्शनिक चिन्तन का भी केन्द्र रहा है। वेदों में ‘काल’ को ब्रह्म का ही एक आयाम माना गया है। कालचक्र की यह अवधारणा भारतीय पंचांग-निर्माण का आधार बनी।
वर्ष, ऋतु, मास, पक्ष और तिथि— इन सबकी गणना चन्द्रमा और सूर्य की गतियों के समन्वय से की गई। इसी पृष्ठभूमि में विक्रम संवत् का उद्भव और उसका नववर्ष-निर्धारण समझा जाना चाहिए।
2. वैदिक काल में वर्षारम्भ
ऋग्वेद और यजुर्वेद में वर्ष (संवत्सर) का उल्लेख मिलता है। वैदिक काल में वर्ष का सम्बन्ध मुख्यतः ऋतुचक्र से था।तैत्तिरीय संहिता (1.4.14) तथा शतपथ ब्राह्मण में वसन्त को यज्ञों का प्रारम्भिक काल कहा गया है। इससे संकेत मिलता है कि वर्षारम्भ वसन्त से सम्बद्ध था।वसन्त ऋतु का प्रारम्भ चैत्र मास से माना जाता था। इस प्रकार चैत्र को वर्ष का प्रथम मास स्वीकार करने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है।

3. चान्द्र मास की दो पद्धतियाँ : अमान्त और पूर्णिमान्त-भारतीय चान्द्र गणना में दो प्रमुख परम्पराएँ विकसित हुईं—
(क) अमान्त पद्धति

-मास का अंत अमावस्या को।
-अमावस्या के अगले दिन (शुक्ल प्रतिपदा) से नया मास आरम्भ।
-दक्षिण और पश्चिम भारत में अधिक प्रचलित।

यदि फाल्गुन अमावस्या को वर्ष समाप्त हो और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष आरम्भ हो, तो यह अमान्त पद्धति है।
(ख) पूर्णिमान्त पद्धति

-मास का अंत पूर्णिमा को।
-पूर्णिमा के अगले दिन (कृष्ण प्रतिपदा) से नया मास।
-उत्तर भारत में परम्परागत रूप से प्रचलित।
-इस पद्धति में फाल्गुन पूर्णिमा (होली) के बाद चैत्र कृष्ण से नया मास आरम्भ होता है।

4. विक्रम संवत् का उद्भव
इतिहासकारों के अनुसार विक्रम संवत् का प्रारम्भ 57 ईसा पूर्व हुआ। प्रारम्भिक अभिलेखों में इसे “मालव संवत्” कहा गया है।
सम्राट विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता पर विद्वानों में मतभेद है, परन्तु लोकपरम्परा में यह विश्वास दृढ़ है कि उनका राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ। इसी कारण इस तिथि को नवसंवत्सर माना गया।
बाद में इस संवत् का नाम “विक्रम संवत्” हुआ और यह उत्तर भारत का प्रमुख कालमान बन गया।
5. फाल्गुन पूर्णिमा और वर्ष-समापन का प्रश्न
कुछ प्राचीन परम्पराओं में वर्ष का समापन फाल्गुन पूर्णिमा पर माना गया। इसका कारण स्पष्ट है—

-फाल्गुन पूर्णिमा शीत ऋतु के अंत और वसन्त के आगमन का प्रतीक है।
-होली उत्सव सामाजिक और कृषिगत नवचक्र का संकेत देता है।

पूर्णिमान्त परम्परा में फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष के अंतिम मास का समापन बिंदु है। इसके बाद चैत्र कृष्ण से नवचक्र प्रारम्भ होता है।
परन्तु अमान्त परम्परा में फाल्गुन अमावस्या के साथ वर्ष समाप्त होता है और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नया वर्ष प्रारम्भ।
6. खगोलीय आधार
भारतीय पंचांग केवल धार्मिक आस्था पर आधारित नहीं, बल्कि खगोलीय गणनाओं पर आधारित है।
सूर्यसिद्धांत
सूर्यसिद्धांत में चन्द्र और सूर्य की गतियों के समन्वय से मास और वर्ष की गणना का विस्तृत विवरण है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के समय—

  • सूर्य प्रायः मीन राशि में होता है और शीघ्र ही मेष संक्रांति की ओर अग्रसर होता है।
  • वसन्त विषुव (Spring Equinox) के आसपास का समय होता है।
इस प्रकार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा खगोलीय दृष्टि से भी नवचक्र का प्रतीक है।
7. विक्रम संवत् और अमान्त गणना का सम्बन्ध
वर्तमान में विक्रम संवत् का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ माना जाता है।
यदि वर्ष का समापन फाल्गुन अमावस्या पर स्वीकार किया जाए, तो यह स्पष्टतः अमान्त परम्परा है।
किन्तु उत्तर भारत में प्रचलित पंचांगों में पूर्णिमान्त मास भी प्रचलित रहे हैं। अतः विक्रम संवत् स्वयं किसी एक पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रानुसार अमान्त और पूर्णिमान्त दोनों रूपों में प्रयुक्त हुआ है।
8. विक्रम संवत् से पूर्व की प्रमुख गणनाएँ
  1. कलियुग संवत् (3102 ई.पू.)ज्योतिषीय गणनाओं में।
  1. सप्तर्षि संवत् (लौकिक संवत्)कश्मीर में प्रचलित।
  1. शक पूर्व राजकीय वर्ष-गणनाएँनन्द, मौर्य आदि के काल में।
इन सबमें चैत्र का महत्व बना रहा।
9. सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को—
  • सृष्टि-आरम्भ का दिन (ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचना)
  • मर्यादा पुरुषोत्तम राम का राज्याभिषेक (कुछ परम्पराओं में)
  • युगादि, गुड़ी पड़वा, नवसंवत्सर
के रूप में मनाया जाता है।
यह केवल कालगणना का आरम्भ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जन्म का प्रतीक है।
10. निष्कर्ष
*विक्रम संवत् का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होना प्राचीन वैदिक-वसन्तीय परम्परा का विस्तार है।
*अमान्त पद्धति में फाल्गुन अमावस्या वर्ष का अंत है, जो विक्रम नववर्ष से संगत है।
*पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों परम्पराएँ भारतीय कालगणना की समानान्तर धाराएँ हैं।
*विक्रम संवत् ने इन परम्पराओं को समन्वित कर सांस्कृतिक एकता का रूप प्रदान किया।

संदर्भ ग्रन्थ

  1. सूर्यसिद्धांत
  2. शतपथ ब्राह्मण
  3. तैत्तिरीय संहिता
  4. धर्मशास्त्र (मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति)
  5. डॉ. पी.वी. काणे – History of Dharmashastra
  6. बी.एन. नारायण – Indian Astronomy
  7. ए.एल. बाशम – The Wonder That Was India

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