बकरीद पर कुर्बानी विवाद की आड़ में लोक-संस्कृति व शाक्त परम्परा पर वैष्णवीकरण की कोशिश

Public Discourse
Published: May 27 2026 | डॉ.दुष्यंत कुमार शाह

An Attempt at the 'Vaishnavization' of Folk Culture and the Shakta Tradition Under the Guise of the Bakrid Sacrifice Controversy


The ongoing controversy surrounding animal sacrifice (Qurbani) during Eid-ul-Adha (Bakrid) extends far beyond the religious practices of a single community. Framed by modern legal systems, urban sanitation, and a specific puritanical discourse, this selective activism poses a direct threat to India’s ancient, pre-Vedic folk-culture, Shaktism, and indigenous traditions. Attempts to impose a universal ban based on a Puranic, vegetarian-centric model overlook the fact that nearly two-thirds of the broader Hindu population historically practices animal sacrifice. Scholars like Vasudev Sharan Agrawal note that goddess worship stems from indigenous tribes (Nishadas, Kiratas), where offering living sacrifice (Jiwa Bhava) is central.
Local traditions—spanning from Mithila, Bengal, Assam, and Odisha to Kashmir and Southern states—rely on meat and liquor offerings (*Tapaavan*) for clan deities (*Kuldevis*). Forced assimilation into a ruling-class Vaishnavite framework threatens to dissolve these multi-cultural identities. Furthermore, animal husbandry economics depends heavily on meat, not just milk. When the debate touches upon bovine sacrifice, it ignores the dietary habits of Christians, Vajrayana Buddhists, and Northeast tribes, targeting Muslims exclusively.
This hypocrisy is evident in how the urban elite ignores commercial meat in five-star hotels and India's position as a leading global meat exporter, revealing a political motive to mentally harass communities rather than promote animal welfare. The legal demand for *Essential Religious Practices* threatens unwritten folk shrines (Thaans) whose histories live in folk songs (*Pachra*), not texts. Ironically, prominent Shakta scriptures and Vedic literature explicitly validate sacrifice. Recent state interventions, like banning sacrifices in Uttar Pradesh or filing an FIR against a tribal *Baiga* in Chhattisgarh, represent an aggressive institutional push toward a monolithic 'Vaishnavization.' Sacrifice in folk memory is not cruelty, but a symbolic surrender to nature. Imposing external legal force disrupts the organic, self-evolving human-nature relationship and inflicts irreparable damage on the cultural rights of India’s indigenous populations.

बकरीद पर पशु-कुर्बानी को लेकर उठने वाले समसामयिक विवाद और प्रशासनिक हस्तक्षेप केवल एक समुदाय विशेष के धार्मिक आचार तक सीमित नहीं हैं; इनके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव अत्यंत गहरे और व्यापक हैं। जब आधुनिक न्यायशास्त्र, नगरीय स्वच्छता और एक खास तरह के शुद्धतावादी विमर्श के तहत जीव-बलि पर प्रतिबंध या कड़े नियम लागू करने का प्रयास किया जाता है, तो इसका सीधा आघात भारत की उस प्राचीन प्राक्-वैदिक लोक-संस्कृति और शाक्त परंपरा पर पड़ता है, जो सदियों से लोकआस्था के रूप में स्वतंत्र अस्तित्व बनाए हुए है।

आधुनिक विधिक व्यवस्था, पशु-अधिकार संगठन और वैष्णव आग्रह से युक्त कथित सनातन-हिंदू या जैन धर्म से प्रभावित समूह जब बकरीद की कुर्बानी को लेकर कानूनी और सामाजिक बहस छेड़ते हैं, तो वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि सनातन या हिन्दू का दो तिहाई हिस्सा भी पशु बलि की परम्परा का पालन करता है। लोक-संस्कृति के प्रामाणिक शोधों और वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे मनीषियों के निष्कर्षों के अनुसार, देवी पूजा मूलतः निषाद, किरात और आदिम जातियों की प्राक्-वैदिक परंपरा है, जहाँ मातृशक्ति को 'जीवा भाव' यानी बलि अर्पित करना आस्था का केंद्रीय तत्व रहा है। यदि 'पशु-क्रूरता' या 'छद्म नागरिक बोध'या वैष्णव हिन्दुत्व के नाम पर जीव-बलि के विरुद्ध कोई सार्वभौमिक दंडात्मक विमर्श स्थापित होता है, तो इसकी सीधी आंच देश के अनेक शक्तिपीठों व अवैदिक लोक-आस्थाओं पर पड़ेगी; जहाँ चैत्र नवरात्रि की नवमी को 'बलिदान मेलों' के आयोजन और बकरे-सुअर की बलि की अनादि कालीन परंपरा जीवित है। इस प्रथा में आस्था रखने वाली देश की एक बड़ी आबादी है, जो वृहत्तर हिंदू समुदाय का अभिन्न हिस्सा है।

इसके साथ ही, एक संकीर्ण राजनैतिक विचारधारा और आधुनिक पशुप्रेमी—जो मुख्यतः वैष्णव पौराणिक और शाकाहारी ढांचे से संचालित हैं—जब बकरीद की कुर्बानी का एकतरफा विरोध करते हैं, तो वे अनजाने में हिंदू लोक-धर्म के भीतर की उस बहुलता को भी कटघरे में खड़ा कर देते हैं जहाँ कुलदेवियों को महुए की शराब का तर्पण (तपावन) और मांस-बलि देना अनिवार्य माना गया है। डॉ. आर. अचल पुलस्तेय की पुस्तक ‘रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़’ के अनुसार—राजभर, चमार, निषाद, पासी, अहीर जैसी विविध जातियों की अपनी लोक-देवियाँ (जैसे शीतला माई, बनसप्ती, चमरिया, बुढ़ियाँ माई आदि) ऐतिहासिक संकटों से लड़ने की सामूहिक जीवटता का प्रतीक रही हैं। राष्ट्रीय संदर्भ में मिथिला, बंगाल, असम, उत्तरांचल, उड़िसा, कश्मीर, कन्नड़, तमिल, मलायलम के साथ लगभग सभी प्रादेशिक संस्कृतियों में बलि व माँस,मदिरा दे देवी पूजा की प्राचीन परम्परा है। यदि बात गाय की कुर्बानी की है, तो यहाँ ईसाई, बज्रयानी बौद्ध, पूर्वोत्तर की आदिम जातियों में गाय माँस खाना सामान्य है। परन्तु इस विवाद में केवल मुस्लिम ही टारगेट किये जाते हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है, पशु पालन में केवल दूध से आय नहीं होती है। पशुपालन से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा मांसाहार से आता है। कुर्बानी पर जारी विवाद यदि इसी तरह एकतरफा 'शुद्धतावादी' विमर्श को बल देता रहा, तो इन वंचित और आदिम जातियों,पशुपालकों की स्वतंत्र लोक-संस्कृति का सत्ताशीन वैष्णव धारा के ढांचे में जबरन विलय की कोशिश धर्मांतरण जैसा कार्य है। इससे आंतरिक टकराव के साथ बहुसांस्कृतिक और बहु-आयामी पहचान विलोपित होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

इस विवाद का एक अन्य गंभीर पहलू 'शास्त्रवाद' बनाम 'अलिखित लोक-मन' का टकराव है। बकरीद के विवादों में अक्सर 'लिखित धार्मिक ग्रंथों' और 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' (Essential Religious Practices) के संवैधानिक सिद्धांतों की दुहाई दी जाती है, जो अंततः हिंदू लोक-परंपराओं के लिए सबसे बड़ा संकट बन सकता है। ‘रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़’ के ऐतिहासिक साक्ष्य स्थापित करते हैं कि भोजपुरी अंचल के गाँवों में देवी पूजा का इतिहास किसी लिखित शास्त्र या पौराणिक खाँचे पर आधारित नहीं है, बल्कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होने वाला एक स्वतंत्र और आदिम संसार है।

यदि प्रशासन यह मानदंड तय कर दे कि केवल उन्हीं प्रथाओं को विधिक वैधता मिलेगी जो वैष्णव या कुछ पौराणिक संहिताओं में दर्ज हैं, तो लोक-संस्कृति के वे तमाम 'देवघड़' या 'थान' (जो खुले आसमान के नीचे नीम, बेर, सिहोर या तरकुल के वृक्षों के नीचे मिट्टी की पिंडियों के रूप में स्थापित हैं) अवैध घोषित होने की कगार पर आ जाएंगे; क्योंकि इनका इतिहास शास्त्रों में नहीं, बल्कि लोकगीतों (पचरा) में सुरक्षित है। हालांकि, यदि शास्त्रों का भी सहारा लिया जाए, तो शाक्त ग्रंथों—जैसे कालिका पुराण, कुलार्णवतंत्र, महाकाल संहिता, मंत्रमहोदधि, कंकालमालिनीतंत्र आदि—में बलि का विस्तृत विधान वर्णित है। यहाँ तक कि इतिहास के झरोखे से देखें तो वैदिक साहित्य में भी पशुबलि की प्राचीन परंपरा मिलती है।

परंतु, विगत कुछ वर्षों से सत्ता और सत्ता-समर्थित विमर्श लोक-आस्था के इस स्थानीय स्वरूप पर आघात कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में सावन के महीने व नवरात्रि में बलि को हतोत्साहित या बंद करने के प्रयास देखे गए हैं, जबकि मिथिला, बंगाल, असम, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में आज भी बकरे, मछली और भैंसे की बलि व भोग की समृद्ध परंपरा है। विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी देवी, तारापीठ और काली खोह जैसी जगहों पर भी प्राचीन परंपराओं को प्रशासनिक नियंत्रण में बांधने का प्रयास किया जा रहा है। अभी ताजा घटना है छत्तीसगंढ़ में बमलेश्वरी मंदिर में बैगा आदिवासी परम्परा में मुर्गे की बलि देने पर उस आदिवासी पर एफआईआर हुआ है शायद उस पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है। यह आदिवासी आस्था परम्परा पर वैष्णविज्म का हमला है। यह प्रवृत्ति 'सनातन' के व्यापक दायरे के बहाने एक विशिष्ट 'वैष्णवीकरण' का एजेंडा थोपने जैसी प्रतीत होती है, जो विविधता को नकारता है।

आश्चर्यजनक नहीं बल्कि हास्यास्पद यह है कि यही वर्ग और आधुनिक पशुप्रेमी फाइव स्टार होटलों में परोसे जाने वाले व्यावसायिक मांसाहार का विरोध नहीं करते। वर्तमान में भारत दुनिया के सबसे बड़े मांस निर्यातक देशों में से एक है, लेकिन इस औद्योगिक स्तर के मांस व्यापार पर वह तीखी सामाजिक या नैतिक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती, जो किसी स्थानीय धार्मिक या सांस्कृतिक लोक-परंपरा पर दिखाई देती है। यह विरोधाभास साफ करता है कि इस समूह की वास्तविक मंशा पशु-दया या मांसाहार का निषेध नहीं, बल्कि 'चयनात्मक सक्रियता' (Selective Activism) के माध्यम से एक समुदाय विशेष को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता को कटघरे में खड़ा करना है। यदि विमर्श का वास्तविक आधार 'करुणा' होता, तो इसका स्वरूप सार्वभौमिक होता और यह हर प्रकार के मांस उद्योग के खिलाफ समान रूप से मुखर होता। अंततः, कुर्बानी पर होने वाले विवादों का एक बड़ा पक्ष आधुनिक 'शहरी पर्यावरणवाद' है, जो ज़मीन के यथार्थ से पूरी तरह कटा हुआ है। लोक-परंपराओं में दी जाने वाली बलि क्रूरता या संहार का प्रतीक नहीं, बल्कि "अस्तित्व और स्वाभिमान" की रक्षा के लिए प्रकृति की संप्रभुता के समक्ष आत्म-समर्पण है। यहाँ लोकगीतों में देवी का मानवीकरण इतना सहज है कि वे नीम की डाल पर झूला झूलती हैं और भाव्यात्मक रूप से मनुष्य पर आश्रित दिखती हैं। यद्यपि समय के साथ लोक-जीवन ने स्वेच्छा से जीव-बलि के विकल्प के रूप में नारियल, भतुआ (पेठा) या जायफल की बलि को स्वीकार करना शुरू कर दिया है, परंतु यदि यह रूपांतरण किसी बाहरी वैचारिक टकराव, प्रशासनिक दबाव या कानूनी चाबुक के तहत थोपा जाएगा, तो मनुष्य और प्रकृति के बीच का वह आत्मीय रिश्ता खंडित हो जाएगा जो सदियों से स्वतः संचालित था।

एक न्यायपूर्ण और बहुसांस्कृतिक समाज की कसौटी यही है कि वह कथित मुख्यधारा की आधुनिकताओं या प्रायोजित धार्मिक विमर्शों के चश्मे से सुदूर अंचलों की परंपराओं को 'अशुद्ध' या 'बर्बर' कहकर खारिज न करे। बकरीद की पशु-कुर्बानी पर उठने वाले विवादों की आड़ में यदि समरूपीकरण (Homogenization) की नीतियाँ थोपी गईं, तो यह देश की प्राक्-वैदिक, निषाद, किरात और गोंडवाना जैसी आदिम लोक-धाराओं के ऐतिहासिक सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक अधिकारों को अपूरणीय क्षति पहुँचाएगा। सत्ता और शास्त्रवाद के वर्चस्व से इतर, ज़मीन पर जीवंत लोकमानस के सत्वबल और उनके ऐतिहासिक अधिकारों का संरक्षण ही इस वैचारिक संकट का वास्तविक समाधान है।

डॉ. दुष्यंत कुमार शाह
डॉ. दुष्यंत कुमार शाह - किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। इतिहास,पुरातत्व,संस्कृति के प्रतिष्ठित विद्वान के साथ साहित्य, समीक्षा और यात्रिकी लेखन में आपका महत्वपूर्ण योगदान है। महान गणराज्य गढ़मण्डला- आदिवासी इतिहास पुस्तक के सह लेखक, कोरोनाकाल कथा-स्वर्ग में सेमीनार उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद (Seminar in Heaven A Global Chronicle of the Pandemic) किया है। आपके कई शोधपत्र विभिन्न राष्ट्रीय,अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित है।

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