Ayurveda and the Liver Toxicity Debate: The Half-Truths of Modern Skepticism and the Crisis of Self-Medication
Recent public discourses led by modern medical practitioners have raised concerns regarding drug-induced liver injury (DILI) attributed to Ayurvedic formulations. While clinical observations of hepatotoxicity cannot be entirely dismissed, attributing the failure solely to the ancient medical system represents an analytical half-truth. This editorial critically examines the rich hepatoprotective tradition of Ayurveda, particularly through institutionalized research on herbo-metallic compounds like Punarnava Mandur and Tapyadi Loh. It argues that the true public health crisis lies not within the pharmacological principles of classical Ayurveda, but in the pervasive culture of unmonitored self-medication, market adulteration, and the practice of non-institutionalized quacks. The paper advocates for a rigorous regulatory mechanism and an integrated clinical approach to safeguard public health while preserving traditional scientific wisdom.
यकृत (लीवर) चिकित्सा को लेकर आधुनिक संशयवाद और सोशल मीडिया विमर्श अक्सर वैज्ञानिक आधा सच प्रस्तुत करते हैं; वास्तविक संकट चिकित्सा पद्धति की मूल कमियों में नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अनियंत्रित स्वतः चिकित्सा (Self-Medication) और विनियामक कमजोरियों में निहित है।
हाल ही में आधुनिक चिकित्सा पद्धति (Allopathy) के एक वर्ग—विशेषकर सोशल मीडिया पर 'द लीवर डॉक्टर' के नाम से चर्चित केरल के डॉ. फिलिप—द्वारा यह दावा रेखांकित किया गया कि आयुर्वेदिक औषधियाँ यकृत (लीवर) को गंभीर क्षति पहुँचाती हैं। प्रथम दृष्ट्या, आधुनिक नैदानिक उपकरणों (Diagnostic Tools) और कुछ चुनिंदा मामलों (Case Studies) के आधार पर बुना गया यह आख्यान अत्यंत वैज्ञानिक प्रतीत होता है। किंतु, जब हम इस निष्कर्ष का बहुविषयक (Multidisciplinary) और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करते हैं, तो यह दावा पूर्ण सत्य नहीं, बल्कि एक खतरनाक "आधा सच" सिद्ध होता है। यह वक्तव्य चिकित्सा पद्धति की मूल दार्शनिक व वैज्ञानिक कमियों को नहीं, अपितु समाज में व्याप्त अनियंत्रित उपभोग, अज्ञानता और स्वतः चिकित्सा (Self-Medication) की प्रवृत्तियों का परिणाम है।
आयुर्वेद को मात्र पारंपरिक 'घरेलू नुस्खों' का संकलन मान लेना इसके गहन विज्ञान के साथ अन्याय है। यह एक अत्यंत परिष्कृत और प्रामाणिक चिकित्सा शास्त्र है, जिसका यकृत विकारों पर एक सुदृढ़ अकादमिक इतिहास उपलब्ध है। आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथों—चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम—में 'यकृत' (Liver) और प्लीहा को रक्तवह स्रोतस का मूल माना गया है। इन प्रामाणिक ग्रंथों में कामला (Jaundice), जलोदर (Ascites), और यकृतदाल्युदर (Hepatomegaly) जैसे जटिल रोगों की संप्राप्ति (Pathophysiology) और उनकी चिकित्सा का एक विस्तृत, स्वतंत्र और तार्किक अध्याय उपलब्ध है।
काष्ठ औषधियों (Herbal Drugs) के अतिरिक्त, आयुर्वेद का 'रसशास्त्र' विभाग यकृत जैसी जटिल संरचनाओं के लिए 'पुनर्नवा मंडूर' (Punarnava Mandur), 'लोकनाथ रस' (Loknath Ras) और 'ताप्यादि लोह' (Tapyadi Loh) जैसे अत्यंत प्रभावी हर्बो-मेटालिक (जड़ी-बूटियों और शुद्ध धातुओं/खनिजों का मिश्रण) योगों का विधान करता है। ये औषधियाँ केवल रोग के लक्षणों को नहीं दबातीं, बल्कि यकृत की कोशिकाओं (Hepatocytes) के पुनर्जीवन (Regeneration) में उत्प्रेरक की भूमिका निभाती हैं।
इन भस्मों और रसायनों पर देश के शीर्ष अनुसंधान निकायों—जैसे केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय (जामनगर) तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)—द्वारा आधुनिक वैज्ञानिक मापदंडों (In-vitro एवं In-vivo Studies) के अनुसार कड़े परीक्षण किए गए हैं। आधुनिक वैज्ञानिक आंकड़े (Clinical Research Data) अकाट्य रूप से यह सिद्ध करते हैं कि यदि इन धातुओं का शास्त्रीय विधि से 'शोधन' और 'मारण' (Toxicity Elimination Processes) किया जाए, तो ये औषधियाँ पूरी तरह निरापद (Safe) और यकृत-संरक्षक (Hepatoprotective) सिद्ध होती हैं।
वास्तविक समस्या यहाँ खड़ी होती है जिसे आधुनिक डॉक्टर अक्सर अनदेखा कर देते हैं—संकट चिकित्सा पद्धति का नहीं, 'स्वतः चिकित्सा' (Self-Medication) का है। डॉ. फिलिप के अवलोकनों में जहाँ यकृत विषाक्तता (Drug-Induced Liver Injury) के मामले सामने आते हैं, वहाँ दोष औषधि विज्ञान का नहीं, बल्कि समाज के व्यावहारिक और विनियामक (Regulatory) ढांचे का है। आयुर्वेद का मौलिक सिद्धांत है 'पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य' अर्थात् प्रत्येक मनुष्य की चयापचय प्रकृति (Metabolic Profile) भिन्न है। जो औषधि एक व्यक्ति के लिए अमृत है, वही दूसरे के लिए विष हो सकती है। जब आम लोग बिना किसी योग्य, पंजीकृत और संस्थागत रूप से प्रशिक्षित आयुर्वेदिक चिकित्सक (BAMS/MD) के परामर्श के, विज्ञापनों या इंटरनेट की 'सुनी-सुनाई' बातों के आधार पर सीधे काउंटर से दवाएं खरीदकर खाने लगते हैं, तो परिणाम घातक होना स्वाभाविक है।
विशेष रूप से हर्बो-मेटालिक औषधियाँ अत्यंत शक्तिशाली होती हैं। इन्हें विशिष्ट अनुपान (जैसे मधु, घृत या छाछ), सटीक मात्रा और एक निश्चित समयावधि के अंतर्गत ही दिया जाना अनिवार्य है। इस अनुशासन का उल्लंघन यकृत पर अतिरिक्त चयापचय दबाव (Metabolic Stress) डालता है। यदि कोई व्यक्ति बिना डॉक्टर की सलाह के आधुनिक चिकित्सा की साधारण 'पैरासिटामोल' या दर्दनिवारक (NSAIDs) दवाओं का अनियंत्रित सेवन करे, तो वह 'एक्यूट लिवर फेलियर' का कारण बनती है। परंतु, वहाँ दोष पैरासिटामोल के विज्ञान को नहीं, मरीज की अज्ञानता को दिया जाता है। फिर यही मापदंड आयुर्वेद पर लागू क्यों नहीं होता?
यहाँ आधुनिक चिकित्सा के कुछ आलोचकों का दृष्टिकोण एकांगी और पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाता है। वे 'मरीज की प्रशासनिक भूल' और 'चिकित्सा पद्धति की वैज्ञानिकता' के मध्य के अंतर को विस्मृत कर देते हैं। किसी मरीज द्वारा स्वतः की गई अज्ञानतापूर्ण भूल का दोष सीधे संपूर्ण आयुर्वेद शास्त्र पर मढ़ देना अकादमिक रूप से अनैतिक और अतार्किक है। भारतीय उपमहाद्वीप में आयुर्वेद के नाम पर अनेक तथाकथित साधु-संत, नीम-हकीम और पारंपरिक भ्रामक प्रचारक सक्रिय हैं, जिन्हें न तो मानव शरीर विज्ञान (Anatomy) का ज्ञान है और न ही भेषज-गुण विज्ञान (Pharmacology) का। इनके द्वारा निर्मित अशुद्ध, मिलावटी या स्टेरॉयड-युक्त पुड़ियों के कारण होने वाली यकृत क्षति के लिए महर्षि चरक और सुश्रुत की वैज्ञानिक विरासत को उत्तरदायी ठहराना बौद्धिक दिवालियापन है।
डॉ. फिलिप का यह आख्यान कि "यकृत के प्रति सावधानी आवश्यक है", आंशिक रूप से स्वागत योग्य है; किंतु उनका यह निष्कर्ष कि "आयुर्वेद यकृत के लिए मूलतः घातक है", पूरी तरह भ्रामक, संकीर्ण और वैज्ञानिक साक्ष्यों के विपरीत है। समय की मांग है कि सरकार और भेषज नियंत्रण विभाग (Drug Control Department) आयुर्वेद के नाम पर भ्रामक विज्ञापनों, छद्म-चिकित्सकों और बिना पर्चे के बिकने वाली (OTC) रसोषधियों की बिक्री पर पूर्ण विधिक प्रतिबंध लगाएं। साथ ही, आधुनिक और प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों के वैज्ञानिक आपस में पूर्वाग्रह छोड़कर डेटा साझा करें ताकि मरीजों का व्यापक कल्याण हो सके। आयुर्वेद एक शाश्वत और साक्ष्य-आधारित विज्ञान है, बशर्ते इसका प्रयोग व्यावसायिक विज्ञापनों के चश्मे से नहीं, बल्कि एक योग्य और प्रामाणिक आयुर्वेद विज्ञानी के निर्देशन में किया जाए।
प्रो. (डॉ.) जे.एस. त्रिपाठी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी के आई.एम.एस. (IMS) आयुर्वेद संकाय में कायचिकित्सा के प्रोफेसर हैं। आपके अनेक शोधपत्र राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। लंबे चिकित्सकीय अनुभव के साथ आप शिक्षण, शोध व चिकित्सा के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हैं। प्रो. त्रिपाठी ‘ईस्टर्न साइंटिस्ट’ के संपादक मंडल के सम्मानित सदस्य हैं।
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