अरुणाचल : मणिपुर बनने से पहले — भारत की आदिम सभ्यताओं का संकट

Editorial Analysis
Published: June 30, 2026 | Editor in Chief
Abstract

Arunachal Before Manipur: The Crisis of Indigenous Civilizations in India

Recent developments in Arunachal Pradesh are often interpreted through the binary of Hindu–Christian religious competition. This editorial argues that such a perspective captures only the surface of a much deeper civilizational transformation. The central issue is not merely religious conversion or competing faith traditions, but the gradual homogenization of India's indigenous civilizations. Drawing upon examples from Arunachal Pradesh, Manipur, Jharkhand, Central India, and the folk traditions of North India, the article proposes that India cannot be understood solely through the frameworks of organized religions or caste hierarchies. Beneath these dominant narratives survives a much older layer of nature-based indigenous belief systems expressed through institutions such as Donyi-Polo, Sarna, Gondi traditions, Bathou, Sanamahi, village deities, clan deities, ancestor worship, and local sacred landscapes.
The editorial identifies four major forces driving cultural homogenization: religious expansion, market-driven cultural transformation, demographic and migratory pressures, and centralized political projects of cultural uniformity. While recognizing the constitutional right to freedom of religion, it argues that equal intellectual and policy attention must also be given to the preservation of indigenous belief systems as independent civilizational traditions rather than treating them merely as peripheral expressions of larger organized religions. The article concludes that the challenges confronting Arunachal Pradesh are not isolated regional concerns but reflections of a wider national dilemma concerning cultural pluralism and indigenous heritage. Protecting India's indigenous knowledge systems, local belief traditions, and ecological worldviews is presented as essential for sustaining the country's civilizational diversity and democratic future.
Keywords: Indigenous Civilizations, Cultural Homogenization, Donyi-Polo, Sarna, Gondi Tradition, Folk Religion, Indigenous Knowledge Systems, Cultural Pluralism, Arunachal Pradesh, Manipur, India.

अरुणाचल प्रदेश में उभरता विवाद पहली दृष्टि में धार्मिक दिखाई देता है। एक ओर ईसाई मिशनरियों के दशकों से चले आ रहे शिक्षा और स्वास्थ्य कार्यों के प्रभाव से ईसाई समाज का विस्तार हुआ है, तो दूसरी ओर विभिन्न हिन्दू संगठन स्थानीय परंपराओं को व्यापक हिन्दू सांस्कृतिक धारा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इन दोनों के बीच डोनी-पोलो और अन्य स्थानीय आदिम आस्थाओं को मानने वाले समुदाय अपनी स्वतंत्र पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा की चिंता व्यक्त कर रहे हैं।

लेकिन यदि इस पूरे घटनाक्रम को केवल "हिन्दू बनाम ईसाई" के द्वंद्व के रूप में देखा जाएगा, तो हम समस्या की सतह को ही देख पाएँगे। वास्तविक प्रश्न कहीं अधिक गहरा है। अरुणाचल का संकट संगठित धर्मों का संघर्ष नहीं, बल्कि आदिम सभ्यता और सांस्कृतिक समरूपीकरण (Homogenization) का संकट है।

भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है। यह विविधता केवल भाषाओं या धर्मों की नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टियों की भी है। डोनी-पोलो, रंगफ्रा, न्येदर-नामलो, सरना, बाथौ, गोंडी, सानामाही और ऐसी अनेक लोक-आस्थाएँ किसी बड़े धर्म की शाखाएँ नहीं हैं। वे इस भूभाग की उन प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं की जीवित अभिव्यक्तियाँ हैं, जिनकी जड़ें जल, जंगल, जमीन, पर्वत, पूर्वज और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में निहित हैं।

दुर्भाग्य से आधुनिक भारत के बौद्धिक विमर्श ने इन्हें पर्याप्त स्थान नहीं दिया। भारतीय समाज को प्रायः दो ही दृष्टियों से समझा गया—धर्म और जाति। एक ओर हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और अन्य संगठित धर्मों के बीच संबंधों की चर्चा होती रही, दूसरी ओर सवर्ण-अवर्ण, दलित-पिछड़ा और सामाजिक न्याय का विमर्श विकसित हुआ। इन दोनों के बीच भारत की वह तीसरी सभ्यता लगभग अदृश्य रही, जो लोक और आदिम आस्थाओं में आज भी जीवित है।

यह भूल केवल आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत के ग्रामीण समाज में भी अनेक समुदायों के सांस्कृतिक जीवन का केंद्र कुलदेवी, ग्रामदेवता, डीह बाबा, शीतला, भैरव, नागदेव, पूर्वज-पूजा, खेत-देवता और स्थानीय लोक-देवियाँ हैं। विवाह, जन्म, मृत्यु, खेती, वर्षा, महामारी और ग्राम-सुरक्षा से जुड़े अनुष्ठानों में इन लोक-आस्थाओं का महत्व अनेक स्थानों पर शास्त्रीय देवताओं के समान या उनसे भी अधिक दिखाई देता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय लोकजीवन की सांस्कृतिक संरचना केवल शास्त्रीय धर्मों से निर्मित नहीं हुई; उसके भीतर एक अत्यंत प्राचीन लोक-स्मृति आज भी जीवित है।

इसीलिए डोनी-पोलो का प्रश्न केवल अरुणाचल का प्रश्न नहीं है। यह उसी सांस्कृतिक निरंतरता का प्रश्न है, जिसकी अभिव्यक्ति झारखंड के सरना, मध्य भारत की गोंडी परंपरा, असम के बाथौ, मणिपुर की सानामाही परंपरा और उत्तर भारत के ग्राम-देवताओं एवं कुल-देवी परंपराओं में भी दिखाई देती है।

आज इस सभ्यता के सामने चार प्रकार के दबाव एक साथ सक्रिय हैं।

पहला, धार्मिक विस्तार का दबाव। प्रत्येक संगठित धर्म स्वाभाविक रूप से अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहता है। यह संवैधानिक अधिकारों के दायरे में होने वाली प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसके बीच मूल आदिवासी आस्थाओं के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

दूसरा, बाज़ार का दबाव। सड़कें, पर्यटन, उपभोक्तावाद, डिजिटल संस्कृति, खनन और बड़ी विकास परियोजनाएँ केवल अर्थव्यवस्था नहीं बदलतीं; वे जीवन-दृष्टि भी बदलती हैं। स्थानीय भाषाएँ कमजोर होती हैं, सामुदायिक अर्थव्यवस्था नकदी अर्थव्यवस्था में बदलती है और संस्कृति धीरे-धीरे बाज़ार की वस्तु बन जाती है।

तीसरा, जनसांख्यिकीय और प्रवासन संबंधी दबाव। सीमावर्ती राज्यों में स्थानीय समाज समय-समय पर भूमि, संसाधनों, रोजगार और जनसंख्या संतुलन को लेकर चिंता व्यक्त करता रहा है। इन चिंताओं का समाधान किसी समुदाय के प्रति घृणा या पूर्वाग्रह में नहीं, बल्कि संवैधानिक ढाँचे के भीतर स्थानीय अधिकारों, सांस्कृतिक सुरक्षा और न्यायपूर्ण नीतियों में निहित है।

चौथा, समरूपीकरण की राजनीति। आधुनिक राष्ट्र-राज्य और विभिन्न वैचारिक परियोजनाएँ कई बार विविध पहचानों को एक व्यापक सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान के भीतर समाहित करना चाहती हैं। ऐसी प्रवृत्तियाँ चाहे किसी भी वैचारिक स्रोत से आएँ, उनका परिणाम स्थानीय सांस्कृतिक विविधताओं के क्षरण के रूप में सामने आ सकता है। मणिपुर की त्रासदी इसी संदर्भ में एक चेतावनी है। मणिपुर के संकट को केवल धर्म से नहीं समझा जा सकता। भूमि, जातीय पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सुरक्षा, इतिहास और धार्मिक पहचान—सभी कारकों ने उसमें भूमिका निभाई है। किंतु यह भी स्पष्ट है कि जब पहचान के अनेक प्रश्न एक-दूसरे में उलझ जाते हैं, तो समाज का ध्रुवीकरण तेज़ हो जाता है। अरुणाचल को इसी अनुभव से सीखने की आवश्यकता है।

यह समस्या केवल अरुणाचल की नहीं है। झारखंड में सरना धर्म की स्वतंत्र पहचान का प्रश्न लंबे समय से उठ रहा है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में गोंडी धर्म और संस्कृति के संरक्षण की माँग लगातार सामने आती रही है। देश के अनेक आदिवासी और लोक-समुदाय अपनी भाषाओं, लोक-स्मृतियों और पारंपरिक आस्थाओं के संरक्षण को लेकर चिंतित हैं। इन सभी संघर्षों का मूल प्रश्न एक ही है—सांस्कृतिक अस्तित्व का अधिकार।

भारत का भविष्य किसी एक सांस्कृतिक पहचान की विजय में नहीं, बल्कि अपनी बहुलता को स्वीकार करने में है। धार्मिक स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण आदिम और लोक-आस्थाओं का संरक्षण भी है। भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इसी से मापी जाएगी कि वह केवल बड़े संगठित धर्मों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है या उन छोटी, प्राचीन और स्थानीय सभ्यताओं की भी, जिन्होंने इस भूभाग की सांस्कृतिक नींव रखी।

आज आवश्यकता भारत को एक नई दृष्टि से देखने की है। केवल धर्मों के भारत के रूप में नहीं, केवल जातियों के भारत के रूप में नहीं, बल्कि लोक और आदिम सभ्यताओं के भारत के रूप में।

यदि हम इस तीसरे भारत को समझने और सम्मान देने में सफल होते हैं, तो अरुणाचल केवल मणिपुर बनने से ही नहीं बचेगा, बल्कि भारत अपनी सबसे बड़ी सभ्यतागत शक्ति—अपनी विविधता—को भी सुरक्षित रख सकेगा। यदि हम ऐसा नहीं कर सके, तो संकट केवल अरुणाचल का नहीं होगा; वह भारतीय सभ्यता की आत्मा का संकट होगा।

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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