पारद, स्वर्ण और रसशास्त्र: क्या आयुर्वेद अपनी विशिष्ट औषधीय पहचान खो रहा है?

पारद और स्वर्ण आधारित रसौषधियाँ आयुर्वेद की विशिष्ट औषधीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन पारद की उपलब्धता, बढ़ती लागत और अंतरराष्ट्रीय नियामक प्रतिबंधों ने रसशास्त्र के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। यह संपादकीय सवाल उठाता है कि क्या पर्यावरणीय सुरक्षा और आयुर्वेद की औषधीय परंपरा के संरक्षण के बीच संतुलन संभव है? सरकार को प्रमाणित पारद एवं स्वर्ण की नियंत्रित आपूर्ति, वैज्ञानिक मानकीकरण और रसशास्त्र के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान मिशन की दिशा में पहल करनी चाहिए।
Editorial Analysis
Published: August 13, 2026 | Editor in Chief|आयुर्वेद | रसशास्त्र | रसौषधि | पारद | स्वर्ण भस्म | AYUSH |MoA| आयुर्वेद अनुसंधान
Abstract

Mercury, Gold and the Medicinal Identity of Ayurveda: The Future of Rasashastra

Ayurveda is increasingly being projected globally as a predominantly herbal system of medicine. Such a representation, however, overlooks the distinctive place of Rasashastra and Rasaushadhi, including formulations prepared from mercury, gold and other metals and minerals. These medicines constitute an important part of the classical Ayurvedic pharmacopeia and are traditionally valued for their potency, small dosage and specific therapeutic applications. The growing international regulation of mercury, particularly in the context of environmental and public-health concerns and the Minamata Convention on Mercury, has created new challenges for the availability, procurement and cost of mercury required for legitimate Ayurvedic pharmaceutical manufacturing. At the same time, the increasing cost of gold-based preparations is making several traditional Rasaushadhis less accessible to patients. The editorial argues that environmental protection and preservation of Ayurvedic pharmaceutical traditions need not be contradictory. Instead of indiscriminate restriction, India needs a regulated and traceable supply system for pharmaceutical-grade mercury and gold for licensed Ayurvedic manufacturers and research institutions. The editorial further calls for a national research mission on Rasashastra and Rasaushadhi, integrating Ayurvedic clinical knowledge with modern analytical science, toxicology, pharmacokinetics, materials science and clinical research. Traditional processes such as Shodhana and Marana should be scientifically investigated rather than judged solely on the basis of the presence of heavy metals. The central concern is the growing “herbalization” of Ayurveda. If access to mercury, gold and other essential raw materials becomes progressively difficult, and if research and manufacturing infrastructure for Rasaushadhis remains neglected, Ayurveda risks losing an important part of its distinctive pharmaceutical identity. Rasashastra must therefore remain a living, scientifically examined and safely regulated component of Ayurveda.

Keywords: Rasashastra, Rasaushadhi, Ayurveda, Mercury in Ayurveda, Ayurvedic Mercury Medicine, Gold-based Ayurvedic Medicines, Swarna Bhasma, Ayurvedic Medicine, Traditional Medicine, AYUSH, Rasashastra Research

आम जनमानस और सरकार के मानस-पटल पर आयुर्वेद की छवि प्रायः एक वानस्पतिक चिकित्सा पद्धति (Herbal Medicine System) के रूप में बनती जा रही है। दुर्भाग्य यह है कि आयुर्वेद के आचार्य, चिकित्सक और संस्थान भी कई बार स्वयं को इसी सीमित पहचान तक प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं। यह प्रस्तुति बाजार के लिए सुविधाजनक अवश्य हो सकती है, लेकिन आयुर्वेद के वैज्ञानिक और औषधीय स्वरूप को पीछे कर देती है।

आयुर्वेद केवल वनस्पतियों से निर्मित औषधियों की परंपरा नहीं है। उसके विशाल औषध-विज्ञान में रसशास्त्र, धातु-खनिज औषधियाँ, पारद-गंधक योग, स्वर्णादि भस्म तथा विशिष्ट संस्कार-प्रक्रियाएँ महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। यदि इस परंपरा के वैज्ञानिक, सुरक्षित और नियंत्रित विकास की उपेक्षा होती रही, तो भविष्य में आयुर्वेद की पहचान उसके मूल औषधीय वैविध्य के केवल एक छोटे हिस्से तक सिमट जाने का खतरा है।

और तब आयुर्वेद धीरे-धीरे एक ऐसी घरेलू पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगेगा, जिसमें मुख्यतः जड़ी-बूटियों का उपयोग होता है। जबकि जड़ी-बूटी चिकित्सा का सामान्य ज्ञान समाज में पहले से ही व्यापक है और अनेक लोग इसके प्रयोग को चिकित्सकीय परामर्श के बिना भी करते हैं।

इसके विपरीत आयुर्वेद की रसौधीय शाखा ऐसी विशिष्ट औषधीय परंपरा है, जिसमें चिकित्सक का ज्ञान, औषधि की शुद्धता, निर्माण-संस्कार और मात्रा—सभी निर्णायक हो जाते हैं। यही वह क्षेत्र है जहाँ आयुर्वेद की विशिष्ट चिकित्सकीय पहचान स्पष्ट दिखाई देती है।

रसौषधियाँ: आयुर्वेद की विशिष्ट चिकित्सकीय शक्ति

रसशास्त्र का दीर्घ चिकित्सकीय अनुभव यह बताता है कि अनेक पारद, स्वर्ण तथा अन्य धातु-खनिज आधारित योग अत्यल्प मात्रा में प्रयुक्त होते हैं और कई स्थितियों में अपनी शीघ्र एवं विशिष्ट चिकित्सकीय क्रिया के लिए जाने जाते हैं। यही कारण है कि रसौषधियों का निर्माण और प्रयोग सामान्य हर्बल उत्पादों की तरह नहीं किया जा सकता।

रसौषधि केवल किसी धातु या खनिज को पीसकर बना दिया गया पदार्थ नहीं है। उसके पीछे शोधन, संस्कार, मारण, पुट, योग-संयोजन, मात्रा और अनुपान जैसी विशिष्ट प्रक्रियाओं का पूरा विज्ञान है।

दुर्भाग्य से आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धातुओं के हानिकारक प्रभावों को लेकर जिस प्रकार का विमर्श चल रहा है, उसमें रसशास्त्र की इस विशिष्ट औषधीय परंपरा को भी उसी सामान्य दृष्टि से देखने का प्रयास होता है। यह स्थिति चिंताजनक है।

यहाँ एक बुनियादी प्रश्न उठता है—यदि आधुनिक चिकित्सा में लगातार नए-नए chemical formulations और salts विकसित किए जा रहे हैं और उनके adverse effects के कारण समय-समय पर formulations को बदलना पड़ता है, तो हजारों वर्षों से चली आ रही रसौषधीय परंपरा का वैज्ञानिक परीक्षण करने के बजाय उसे केवल heavy metal कहकर खारिज कर देना कितना उचित है?

प्रश्न यह नहीं है कि आधुनिक चिकित्सा गलत है या आयुर्वेद सही। प्रश्न यह है कि क्या किसी चिकित्सा पद्धति के औषधीय ज्ञान का मूल्यांकन उसके वास्तविक formulation, processing, dose और clinical application के आधार पर किया जाएगा या केवल उसके raw material के नाम के आधार पर?

पारद का संकट केवल बाजार का संकट नहीं

आज विश्व स्तर पर पारे के उत्पादन, व्यापार और उपयोग को पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण कड़े नियमन का सामना करना पड़ रहा है। Minamata Convention on Mercury ने वैश्विक स्तर पर पारे की आपूर्ति और उपयोग को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत भी इस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा है।

इसके परिणामस्वरूप पारे की आपूर्ति पहले जैसी सहज नहीं रही। आयात, व्यापार, भंडारण, गुणवत्ता नियंत्रण और उपयोग से संबंधित अनुपालन आवश्यकताएँ बढ़ी हैं। उपलब्धता प्रभावित होने पर कीमत बढ़ना भी स्वाभाविक है।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—

पारे पर पर्यावरणीय नियंत्रण और आयुर्वेदिक औषधियों में उसके नियंत्रित औषधीय उपयोग को एक ही चीज मान लेना उचित नहीं है।

रसशास्त्र में प्रयुक्त पारद को केवल एक औद्योगिक chemical commodity के रूप में नहीं देखा जा सकता। आयुर्वेदीय ग्रंथों में इसके शोधन, संस्कार और योग-निर्माण की विस्तृत प्रक्रियाएँ वर्णित हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन प्रक्रियाओं के बाद तैयार औषधीय पदार्थ की वास्तविक रासायनिक संरचना, जैव-उपलब्धता, विषाक्तता, therapeutic window और चिकित्सकीय प्रभाव का आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों से अध्ययन किया जाए।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस दिशा में जिस गंभीरता, व्यापकता और संसाधन की आवश्यकता है, वह अभी दिखाई नहीं देती।

पारद और स्वर्ण की बढ़ती लागत: सवाल केवल कीमत का नहीं

पारद और स्वर्ण निर्मित औषधियों की कीमत में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप अनेक रसौषधियाँ सामान्य रोगी की पहुँच से दूर होती जा रही हैं।

यह केवल कच्चे माल की कीमत का प्रश्न नहीं है। यह आयुर्वेद की विशिष्ट औषधीय परंपरा, उसके ज्ञान-संसाधन और आधुनिक नियामक व्यवस्था के बीच संरक्षण और संतुलन का प्रश्न है।

यदि प्रमाणित पारद और स्वर्ण की उपलब्धता ही कठिन होती गई, तो छोटे और मध्यम आयुर्वेदिक औषधि निर्माता रसौषधियों का निर्माण कैसे करेंगे? यदि निर्माण महँगा होता गया, तो चिकित्सक इन औषधियों का उपयोग कैसे करेंगे? और यदि चिकित्सकीय उपयोग घटता गया, तो नई पीढ़ी के वैद्य रसशास्त्र का व्यावहारिक ज्ञान कहाँ से प्राप्त करेंगे?

यह एक ऐसी श्रृंखला है, जिसका अंतिम परिणाम केवल कीमत बढ़ना नहीं, बल्कि ज्ञान-परंपरा का क्षरण हो सकता है।

क्या पर्यावरण संरक्षण के नाम पर रसशास्त्र का रास्ता बंद कर दिया जाएगा?

पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है। पारे की अनियंत्रित औद्योगिक खपत और उसके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन पर्यावरण संरक्षण का अर्थ यह कैसे हो सकता है कि प्रमाणित औषधि निर्माण के लिए आवश्यक नियंत्रित मात्रा में पारद की वैध उपलब्धता भी कठिन बना दी जाए?

यहीं सरकार की नीति की परीक्षा होती है।

यदि सरकार विभिन्न औद्योगिक और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिए नियंत्रित व्यवस्था बना सकती है, तो आयुर्वेदिक औषधि निर्माण के लिए आवश्यक पारद की traceable, licensed और quality-controlled supply chain क्यों नहीं बनाई जा सकती?

यहाँ केवल प्रतिबंध की नीति समाधान नहीं है।

हमें प्रतिबंध नहीं, नियंत्रित संरक्षण चाहिए।

सबसे बड़ा खतरा: आयुर्वेद का “हर्बलाइजेशन”

आज आयुर्वेद का वैश्विक बाजार तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन बाजार में आयुर्वेद की पहचान मुख्यतः herbal products, supplements, wellness products और nutraceuticals तक सीमित होती जा रही है।

यह आर्थिक दृष्टि से आकर्षक हो सकता है, परंतु भारतीय ज्ञान-विज्ञान और आयुर्वेद की दृष्टि से यह अत्यंत चिंताजनक है। इससे धीरे-धीरे आयुर्वेद का स्वरूप ही बदल सकता है।

यदि पारद, स्वर्ण, अभ्रक, लौह, ताम्र और अन्य धातु-खनिज औषधियों पर शोध, उत्पादन और चिकित्सकीय उपयोग की वैज्ञानिक व्यवस्था विकसित नहीं हो पाती, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है—इतने सारे आयुर्वेद महाविद्यालयों, संस्थानों और विश्वविद्यालयों की उपयोगिता क्या रह जाएगी?

हमारे पास आयुष मंत्रालय है। आयुर्वेद विश्वविद्यालय हैं। हजारों आयुर्वेद स्नातक, स्नातकोत्तर और शोधार्थी हैं। आयुर्वेद के विकास के लिए अनेक संस्थान और संगठन हैं।

लेकिन प्रश्न यह है—

हमारे पास आयुर्वेद की विशिष्ट रसौषधियों के लिए मानकीकृत raw materials और प्रमाणित manufacturing ecosystem क्यों नहीं है?

यदि पारद और स्वर्ण की उपलब्धता लगातार कठिन होती गई, तो केवल पाठ्यक्रमों में रसशास्त्र पढ़ाने से क्या रसशास्त्र जीवित रह सकेगा?

सरकार को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले सरकार को पारद और स्वर्ण आधारित आयुर्वेदिक औषधियों के प्रश्न को “प्रतिबंध बनाम स्वतंत्रता” के द्वंद्व से बाहर निकालना होगा।

1. आयुर्वेदिक औषधि निर्माण के लिए नियंत्रित Mercury Supply Chain

सरकार को वैध और लाइसेंस प्राप्त आयुर्वेदिक औषधि निर्माताओं के लिए एक regulated mercury supply mechanism विकसित करना चाहिए।

इसके अंतर्गत प्रमाणित स्रोत से पारद की उपलब्धता, batch-wise purity certification, traceability, सुरक्षित storage, manufacturer-level audit तथा उपयोग की डिजिटल निगरानी की व्यवस्था की जा सकती है।

इससे पर्यावरणीय चिंताओं का समाधान भी होगा और वास्तविक औषधि निर्माताओं के लिए raw material की समस्या भी कम होगी।

2. Pharmaceutical-grade और industrial mercury के बीच स्पष्ट अंतर

सभी mercury को एक ही श्रेणी में रख देना वैज्ञानिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टियों से उचित नहीं है।

सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आयुर्वेदिक औषधि निर्माण के लिए किस purity और specification का पारद स्वीकार्य होगा, उसके testing parameters क्या होंगे और certification की प्रक्रिया क्या होगी।

इससे निम्न-गुणवत्ता, संदूषित या अनधिकृत पदार्थ के उपयोग की संभावना भी कम होगी।

3. स्वर्ण के लिए भी विशेष Raw Material Policy

स्वर्ण-आधारित आयुर्वेदिक औषधियों की समस्या केवल सोने की कीमत नहीं है। standardized pharmaceutical gold की उपलब्धता, purity, source और processing भी महत्वपूर्ण हैं।

सरकार को प्रमाणित pharmaceutical-grade gold की आपूर्ति के लिए ऐसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए जो सामान्य jewellery market से अलग हो और औषधि निर्माताओं की वास्तविक आवश्यकता को पूरा करे।

4. रसशास्त्र के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान मिशन

भारत में National Mission on Rasashastra and Rasaushadhi Research जैसी पहल की आवश्यकता है।

इस मिशन के अंतर्गत पारद-गंधक योग, स्वर्ण भस्म, लौह एवं अन्य धातु भस्म, शोधन एवं मारण प्रक्रियाएँ, nanoparticle/particle characterization, pharmacokinetics, toxicology, bioavailability, mechanism of action तथा clinical trials पर बहु-विषयी अनुसंधान कराया जाना चाहिए।

इसमें आयुर्वेदाचार्य, रसायन वैज्ञानिक, toxicologists, pharmacologists, materials scientists और clinicians को एक साथ काम करना चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—इस शोध का उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं होना चाहिए कि रसौषधियाँ “सुरक्षित” हैं। उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि वे कहाँ प्रभावी हैं, किस मात्रा में प्रभावी हैं, किस formulation में प्रभावी हैं और उनकी चिकित्सकीय सीमा क्या है।

5. शोधन और मारण को वैज्ञानिक परीक्षण का विषय बनाया जाए, प्रतिबंध का नहीं

यह आवश्यक है कि नियामक संस्थाएँ पारंपरिक शोधन और मारण प्रक्रियाओं को केवल इसलिए अस्वीकार न करें कि उनमें heavy metals का उपयोग होता है।

इसके बजाय वैज्ञानिक प्रश्न होना चाहिए—

प्रक्रिया के बाद पदार्थ का वास्तविक chemical form क्या है? उसकी मात्रा कितनी है? जैव-उपलब्धता कितनी है? विषाक्तता क्या है? therapeutic benefit क्या है?

यही आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद के बीच वास्तविक संवाद का आधार बन सकता है।

सुरक्षा से कोई समझौता नहीं

यहाँ एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए। पारे और अन्य heavy metals की विषाक्तता एक वास्तविक वैज्ञानिक चिंता है। इसलिए केवल यह कहना कि “ग्रंथों में वर्णित है”, अपने आप में safety certificate नहीं हो सकता।

लेकिन इसका उलटा भी उतना ही अधूरा है।

सिर्फ यह कह देना कि “Mercury toxic है”, और उसके आधार पर प्रत्येक पारंपरिक रसौषधि को स्वतः toxic घोषित कर देना भी वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है।

दोनों अतियाँ गलत हैं।

आयुर्वेद का मूल सिद्धांत ही यह है कि पदार्थ की प्रकृति, संस्कार, मात्रा, काल, रोगी और रोग की स्थिति उसके चिकित्सकीय प्रभाव को निर्धारित करते हैं। इसलिए रसौषधियों के संदर्भ में सही प्रश्न यह होना चाहिए—

कौन-सा पदार्थ, किस शुद्धता में, किस प्रक्रिया से, किस रासायनिक रूप में, कितनी मात्रा में, किस रोगी को और कितने समय तक दिया जाए?

जब इन प्रश्नों के उत्तर प्रमाणित होंगे, तभी रसौषधियाँ आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान के सामने अपनी वास्तविक शक्ति और अपनी वास्तविक सीमाओं—दोनों के साथ मजबूती से खड़ी हो सकेंगी।

सरकार को “प्रतिबंध” नहीं, “नियंत्रित संरक्षण” की नीति बनानी होगी

पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक चिकित्सा—दोनों राष्ट्रीय हित हैं। इनके बीच चुनाव करना आवश्यक नहीं है।

सरकार ऐसी व्यवस्था बना सकती है जिसमें mercury का अनियंत्रित औद्योगिक उपयोग घटे, लेकिन प्रमाणित आयुर्वेदिक औषधि निर्माण और अनुसंधान के लिए आवश्यक मात्रा वैधानिक एवं नियंत्रित चैनल से उपलब्ध रहे।

इसके लिए आयुष मंत्रालय को स्वास्थ्य मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय, DGFT, BIS, CDSCO तथा वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों के साथ मिलकर एक inter-ministerial framework तैयार करना चाहिए।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यदि अंतरराष्ट्रीय नियमों के कारण कोई प्रतिबंध आवश्यक है, तो उसके भीतर औषधीय अनुसंधान और प्रमाणित चिकित्सा-उपयोग के लिए क्या वैध रास्ता उपलब्ध है।

रसशास्त्र को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनने देना है

भारत के सामने आज एक असाधारण अवसर है।

एक ओर आधुनिक analytical science है—ICP-MS, XRD, SEM/TEM, spectroscopy, pharmacokinetics और molecular biology जैसी तकनीकें हैं। दूसरी ओर हमारे पास रसशास्त्र की सदियों पुरानी औषध-निर्माण परंपरा है।

यदि दोनों को टकराव के बजाय संवाद में रखा जाए, तो अनेक पारंपरिक formulations के बारे में नए वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने आ सकते हैं।

लेकिन यदि कच्चे माल की उपलब्धता समाप्त होती गई, manufacturing बंद होती गई और युवा वैद्य रसशास्त्र से दूर होते गए, तो केवल ग्रंथों में उपलब्ध ज्ञान चिकित्सा-परंपरा से निकलकर इतिहास के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जाएगा।

जीवित चिकित्सा-परंपरा वह होती है जिसका ज्ञान पुस्तकों में भी हो, प्रयोगशालाओं में भी हो और सुरक्षित चिकित्सकीय व्यवहार में भी।

इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए प्रमाणित रसौषधियों के लिए आवश्यक पारद, स्वर्ण और अन्य औषधीय raw materials की आपूर्ति बाधित न हो।

आयुर्वेद को केवल herbal industry में बदल देना उसके इतिहास, दर्शन और औषध-विज्ञान को सीमित कर देना होगा।

आयुर्वेद का भविष्य केवल जड़ी-बूटियों में नहीं है। उसके भविष्य में रसशास्त्र भी है।

लेकिन यह रसशास्त्र केवल अतीत की स्मृति बनकर नहीं रहना चाहिए। उसे परंपरा, चिकित्सकीय अनुभव, आधुनिक परीक्षण, मानकीकरण, सुरक्षा और वैज्ञानिक सत्यापन—इन सभी के साथ भविष्य की चिकित्सा में अपनी जगह बनानी होगी।

और यहाँ सरकार की भूमिका केवल नियामक की नहीं, बल्कि संरक्षक और संवर्धक की होनी चाहिए।

क्योंकि पारद की उपलब्धता का प्रश्न अंततः केवल एक धातु की आपूर्ति का प्रश्न नहीं है।

यह प्रश्न है कि हम आयुर्वेद को उसकी पूर्ण औषधीय पहचान के साथ भविष्य में ले जाना चाहते हैं, या उसे केवल “हर्बल मेडिसिन” की सुरक्षित और बाजार-अनुकूल परिभाषा तक सीमित कर देना चाहते हैं।

यदि उत्तर पहला है, तो रसशास्त्र को बचाना होगा।

और रसशास्त्र को बचाने का पहला कदम है—उसकी औषधियों के लिए आवश्यक कच्चे माल की वैध, प्रमाणित और नियंत्रित उपलब्धता सुनिश्चित करना।

यह जिम्मेदारी केवल आयुर्वेद चिकित्सकों की नहीं, सरकार की भी है।

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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