केंद्रीकरण बनाम स्वायत्तता: उच्च शिक्षा सुधार का यक्ष प्रश्न

उच्च शिक्षा को लालफीताशाही से मुक्त करने के नाम पर यदि पूरी व्यवस्था की लगाम एक ही हाथ में सौंप दी जाए, तो इसे सुधार कहा जाए या सत्ता का पुनर्संकेन्द्रण? ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025’ के सामने यही मूल प्रश्न खड़ा है। एकीकृत नियामक की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन क्या एक संस्था में भारत की समस्त ज्ञान-विधाओं, क्षेत्रीय विविधताओं और आर्थिक असमानताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकेगा?
Public Discourse
Published: June 03, 2026 | Author: डॉ. चतुरानन ओझा

Centralization vs. Autonomy: The Yakṣa Question of Higher Education Reform in India

India’s higher education system stands at a critical crossroads. The proposed integrated regulatory framework seeks to replace multiple regulators such as the UGC, AICTE and NCTE with a unified structure, promising greater coordination, simplified regulation and administrative efficiency. However, the editorial questions whether regulatory integration could instead lead to excessive centralization of power.

A key concern is whether a single regulatory institution can adequately represent the diverse expertise required across science, technology, medicine, agriculture, law, management, humanities, social sciences, languages, arts, culture, and indigenous and tribal knowledge systems. The presence of experts in an institution does not necessarily guarantee that subject-specific expertise will meaningfully influence decision-making.

The editorial also examines the implications of centralization for university autonomy, federalism and academic freedom. India’s diverse educational landscape requires national quality standards, but not necessarily uniformity imposed from a single centre. Recent controversies surrounding centralized examination systems such as NTA and NEET further demonstrate the risks of concentrating extensive responsibility within a single institution.

Equally important is the growing cost of higher education. In a society marked by deep economic inequality, expensive education can turn access to knowledge into a privilege determined by family income. Rising tuition, accommodation and other educational costs threaten to widen the gap between talent and opportunity. The editorial therefore argues that any meaningful higher education reform must address affordability, public investment, scholarships and the social accountability of private institutions alongside regulatory restructuring.

The central question is therefore not merely how many regulators India should have, but who should regulate, on what basis, with whose expertise, and for whom. A genuine reform must combine effective coordination with institutional autonomy, subject expertise, federal participation, accountability and affordable access to quality education.

केंद्रीयकरण, विशेषज्ञता, स्वायत्तता और शिक्षा की बढ़ती लागत

उच्च शिक्षा सुधार का प्रश्न केवल नियामकों की संख्या का नहीं है। यह तय करेगा कि ज्ञान पर निर्णय कौन करेगा, विश्वविद्यालय कितने स्वतंत्र रहेंगे और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कितनी सुलभ होगी।

नियामक एक, लेकिन विशेषज्ञ कितने?

उच्च शिक्षा कोई एक विषय नहीं है। यह ज्ञान की असंख्य धाराओं का संसार है—विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, कृषि, विधि, प्रबंधन, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शन, साहित्य, भाषाएं, कला, संस्कृति तथा लोक और आदिवासी ज्ञान। इन सभी की अपनी ज्ञानमीमांसा, शोध-पद्धति और गुणवत्ता की कसौटियां हैं।

तो सवाल सीधा है—एक ही नियामक संस्था इन सभी विषयों की विशेषज्ञता का प्रतिनिधित्व कैसे करेगी? क्या यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रत्येक ज्ञान-विधा के वास्तविक विशेषज्ञ निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त संख्या में उपस्थित होंगे? उनकी नियुक्ति किस प्रक्रिया से होगी? क्या विशेषज्ञों की राय केवल सलाह होगी या निर्णय में उसका वास्तविक वजन होगा?

एक संस्था में विशेषज्ञों की उपस्थिति और निर्णय प्रक्रिया में विशेषज्ञता का प्रभाव—दो अलग बातें हैं। किसी बोर्ड में विशेषज्ञों के नाम लिख देना और उन्हें निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति देना समान बात नहीं है।

ज्ञान को फाइलों से नहीं समझा जा सकता

यदि किसी केंद्रीय संस्था में प्रशासनिक अधिकारी और नौकरशाह विषय-विशेषज्ञों से अधिक प्रभावशाली हो गए, तो उच्च शिक्षा का नियमन धीरे-धीरे ज्ञान की गुणवत्ता से हटकर फाइलों के अनुपालन पर केंद्रित हो सकता है। शोध की मौलिकता की जगह अनुपालन, स्थानीय ज्ञान की जगह मानकीकृत रिपोर्ट और प्रयोग की जगह स्वीकृत प्रारूप महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यहीं नियमन अकादमिक नियंत्रण में बदलने लगता है। विश्वविद्यालयों को ऐसे संस्थान नहीं बनाया जा सकता जहां ज्ञान की जगह केवल नियमों का पालन प्राथमिक उपलब्धि बन जाए।

महंगी शिक्षा : विविध आर्थिक समाज का मौन अभिशाप

उच्च शिक्षा सुधार की बहस केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रह सकती कि नियामक कौन होगा। इससे कहीं अधिक बुनियादी प्रश्न यह है कि उच्च शिक्षा किसके लिए उपलब्ध होगी?

भारत आर्थिक रूप से अत्यंत विषम समाज है। एक ओर ऐसा वर्ग है जो देश-विदेश के महंगे निजी विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस वहन कर सकता है; दूसरी ओर करोड़ों परिवार ऐसे हैं जिनके लिए बच्चों की उच्च शिक्षा आज भी आर्थिक संघर्ष है।

ऐसे समाज में यदि उच्च शिक्षा लगातार महंगी होती जाती है, तो शिक्षा अधिकार से अवसर और अवसर से बाजार में बिकने वाली वस्तु बन सकती है। यह लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर चिंता है।

शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का प्रतिभाशाली विद्यार्थी यदि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करता है, तो वह केवल अपना नहीं, पूरे परिवार का सामाजिक-आर्थिक भविष्य बदल सकता है। लेकिन जब फीस, छात्रावास, परिवहन, पुस्तकें और डिजिटल संसाधनों का खर्च लगातार बढ़ता है, तब विश्वविद्यालय का दरवाजा कागज पर खुला रहकर भी व्यवहार में बंद हो सकता है।

यदि किसी प्रतिभाशाली विद्यार्थी की उच्च शिक्षा उसके परिवार की आर्थिक स्थिति तय करती है, तो प्रतिभा और अवसर के बीच आर्थिक दीवार खड़ी हो जाती है। ऐसी दीवार केवल गरीब विद्यार्थी को नहीं रोकती; वह पूरे समाज की बौद्धिक क्षमता को सीमित करती है।

निजीकरण और व्यावसायीकरण की अनदेखी क्यों?

उच्च शिक्षा में निजी संस्थानों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन निजी भागीदारी और शिक्षा के पूर्ण व्यावसायीकरण में अंतर है। जब शिक्षा का मूल्यांकन मुख्यतः फीस, ब्रांड, रैंकिंग और रोजगार के पैकेज से होने लगे, तब ज्ञान का व्यापक सामाजिक उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।

ऐसी परिस्थिति में नियामक की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कोई संस्था न्यूनतम मानकों को पूरा करती है या नहीं; उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर न चली जाए।

भारत को एकरूप शिक्षा नहीं, समन्वित विविधता चाहिए

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। पूर्वोत्तर के किसी विश्वविद्यालय की परिस्थितियां दिल्ली के किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसी नहीं हो सकतीं। आदिवासी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की चुनौतियां महानगरों से अलग हैं। किसी ग्रामीण विश्वविद्यालय की प्राथमिकताएं किसी वैश्विक शोध विश्वविद्यालय से भिन्न हो सकती हैं।

राष्ट्रीय मानक आवश्यक हैं; राष्ट्रीय एकरूपता नहीं। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता का अर्थ हर जगह एक जैसा होना नहीं, बल्कि अपने संदर्भ में उत्कृष्ट होना भी है।

केंद्रीयकरण की विफलता का जोखिम

किसी व्यवस्था को एक केंद्र में समेटने का सबसे बड़ा आकर्षण उसकी सरलता है। लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है। यदि निर्णय गलत हुआ तो उसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ सकती है।

NTA और NEET से जुड़े विवादों ने इस जोखिम को सार्वजनिक विमर्श में सामने रखा है। लाखों विद्यार्थियों से जुड़ी परीक्षा व्यवस्था में किसी केंद्रीय संस्था की प्रशासनिक या तकनीकी चूक केवल विभागीय समस्या नहीं रहती; वह विद्यार्थियों के भविष्य और सार्वजनिक विश्वास का संकट बन जाती है।

इससे केंद्रीय संस्थाओं को खारिज करने का तर्क नहीं निकलता, लेकिन एक सबक अवश्य निकलता है—जितनी अधिक शक्ति किसी एक संस्था में केंद्रित होगी, उतनी ही मजबूत उसकी निगरानी, जवाबदेही और अपील व्यवस्था होनी चाहिए।

स्वायत्तता कोई विशेषाधिकार नहीं, अकादमिक आवश्यकता है

विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को किसी प्रशासनिक रियायत की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। अकादमिक स्वायत्तता ज्ञान-निर्माण की पूर्वशर्त है।

शोध का काम प्रश्न करना है। विश्वविद्यालय का काम स्थापित धारणाओं को चुनौती देना है। शिक्षक का काम केवल पाठ्यक्रम पढ़ाना नहीं, नई दृष्टि पैदा करना भी है। यदि नियामकीय व्यवस्था इतनी कठोर हो जाए कि संस्थान जोखिम लेने से डरें, तो नवाचार की जगह सुरक्षित प्रशासनिक व्यवहार ले लेगा।

‘एक छतरी’ कहीं ‘एक मुट्ठी’ न बन जाए

एकीकृत नियमन का उद्देश्य यदि केवल अनावश्यक प्रक्रियाओं को समाप्त करना है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन इसके लिए यह जरूरी नहीं कि नियमन, वित्त, मान्यता, गुणवत्ता, मानक और अकादमिक दिशा-निर्धारण जैसी शक्तियां एक ही केंद्रीय संस्था में जमा कर दी जाएं।

एक छतरी की जरूरत हो सकती है; पूरी व्यवस्था को एक मुट्ठी में बंद करने की नहीं।

यदि सुधार का परिणाम यह हो कि विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता घटे, फीस बढ़े और केंद्रीय संस्था की शक्ति बढ़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—सुधार आखिर किसके लिए है—विद्यार्थियों के लिए, विश्वविद्यालयों के लिए या नियामक के लिए?

असली सुधार : सत्ता नहीं, संरचना बदलिए

भारत की समस्या केवल नियामकों की संख्या नहीं है। समस्या है—जटिल प्रक्रियाएं, कमजोर जवाबदेही, पारदर्शिता की कमी, विषय-विशेषज्ञता की उपेक्षा, संस्थागत स्वायत्तता का क्षरण और शिक्षा की बढ़ती लागत।

वास्तविक सुधार के लिए आवश्यक है—एकीकृत संस्था को सर्वशक्तिमान नहीं, समन्वयकारी बनाया जाए; प्रत्येक ज्ञान-विधा के स्वतंत्र विशेषज्ञों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित हो; विशेषज्ञों की नियुक्ति पारदर्शी और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हो; विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वायत्तता को कानूनी सुरक्षा मिले; राज्यों की भूमिका और संघीय संतुलन सुरक्षित रहे; नियामक के निर्णयों के विरुद्ध स्वतंत्र अपील और समीक्षा तंत्र हो; उच्च शिक्षा की फीस और अन्य लागत पर प्रभावी सामाजिक नियमन हो; तथा आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, सार्वजनिक निवेश और पर्याप्त सहायता सुनिश्चित की जाए।

सरकार को कुछ असुविधाजनक प्रश्नों के उत्तर देने होंगे

विधेयक को लेकर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कितने नियामक रहेंगे। प्रश्न यह है—क्या भारत की विविध ज्ञान-परंपराओं, विषयगत विशेषज्ञताओं और संस्थागत स्वायत्तताओं को एक केंद्रीय संस्था वास्तव में प्रतिनिधित्व दे पाएगी?

और इसके साथ दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का प्रतिभाशाली विद्यार्थी भी इस नई व्यवस्था में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा तक पहुंच पाएगा?

यदि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ है, तो सरकार को इसकी स्पष्ट संस्थागत और वित्तीय गारंटी देनी चाहिए। केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाओं में भरोसा व्यक्तियों के आश्वासन से नहीं, कानूनी सुरक्षा, पारदर्शी व्यवस्था और सार्वजनिक जवाबदेही से पैदा होता है।

विकसित भारत के लिए कैसा विश्वविद्यालय?

‘विकसित भारत’ का अर्थ केवल डिजिटल विश्वविद्यालय, नए परिसर और बेहतर रैंकिंग नहीं है। विकसित भारत का अर्थ ऐसे विश्वविद्यालय भी हैं जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, सत्ता से प्रश्न पूछ सकें, समाज की समस्याओं पर शोध कर सकें, स्थानीय ज्ञान को महत्व दें और वैश्विक ज्ञान-परंपरा में अपना योगदान कर सकें।

और विकसित भारत का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि जिसके पास पैसा है, उसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो और जिसके पास पैसा नहीं है, उसके लिए केवल ऋण और वादे हों।

हमें ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जो निर्देशों के अनुयायी नहीं, विचार के निर्माता हों और ऐसे शिक्षा तंत्र की आवश्यकता है जिसमें प्रतिभा की कीमत परिवार की आय से तय न हो।

उच्च शिक्षा सुधार में सबसे बड़ा खतरा अव्यवस्था नहीं है। उससे भी बड़ा खतरा है—अत्यधिक केंद्रीयकरण और बढ़ता व्यावसायीकरण।

एक नियामक बनाना आसान है; ऐसा नियामक बनाना कठिन है जो स्वयं सत्ता के केंद्रीकरण से बचे। विश्वविद्यालय खोलना आसान है; ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाना कठिन है जिसमें गरीब की प्रतिभा भी उतना ही दूर तक पहुंच सके जितना अमीर की।

यही उच्च शिक्षा सुधार की असली कसौटी है। और यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर संसद से पहले सरकार को विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और उस समाज के सामने देना चाहिए जिसके करों और श्रम से यह शिक्षा व्यवस्था चलती है।

Cite as:
Ojha, C. (2026). Centralization vs. Autonomy: The Yakṣa Question of Higher Education Reform in India. Eastern Scientist, II(34). Available at: https://www.easternscientist.in/2026/06/blog-post_03.html

Dr. Chaturanand Ojha

डॉ. चतुरानन ओझा

सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, लेखक, विचारक, सह-संयोजक — समान शिक्षा अधिकार मंच, उत्तर प्रदेश यूनिट

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