विश्व आदिवासी दिवस : उत्सव से आगे, अस्तित्व और अधिकारों का प्रश्न

विश्व आदिवासी दिवस पर महत्वपूर्ण सवाल -क्या आदिवासी समाज अपनी जमीन, जंगल, जल और सांस्कृतिक स्वायत्तता के साथ सुरक्षित भी है?
Editorial Analysis
Published: August 09, 2026 | Editor in Chief
Abstract

Tribal Day: Beyond Celebration, Towards the Question of Survival

Tribal Day should not be limited to celebrating colourful traditional attire, folk dances, rituals and cultural diversity. It must also become an occasion to reflect on the deeper questions confronting indigenous communities—land rights, forests, displacement, livelihoods, cultural identity and environmental degradation.
The images accompanying this editorial reveal this contradiction: vibrant tribal traditions stand alongside scenes of labour, protest, displacement, forest destruction and ecological crisis. For tribal communities, forests are not merely sources of timber; they are integral to food, medicine, livelihood, spirituality, memory and collective identity. Therefore, the destruction of forests and displacement from traditional lands threaten not only their economy but also the continuity of their culture.
Development cannot be meaningful when its costs are disproportionately borne by communities that have historically protected natural ecosystems. Tribal communities must not be treated merely as subjects of welfare or as cultural exhibits. Their participation, consent and traditional knowledge must be central to decisions concerning land, forests and natural resources.
The real challenge is not to assimilate tribal societies into a predetermined “mainstream,” but to make India’s mainstream sufficiently democratic and inclusive to accommodate diverse indigenous languages, knowledge systems, cultural practices and ways of life.
Tribal Day, therefore, should be more than a celebration of tribal culture. It should be a day to reconsider our idea of development and reaffirm the rights, dignity and ecological foundations of indigenous communities. tribal societies ultimately means protecting the cultural and ecological diversity of India itself.

Keywords: Tribal Day, World Tribal Day, Indigenous Communities, Tribal Rights, Tribal Culture, Adivasi Culture, Indigenous Rights, Tribal Identity, Forest Rights, Land Rights, Tribal Displacement,

आदिवासी दिवस आते ही हमारे सामने रंग-बिरंगे परिधान, पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वाद्य, आभूषण और उत्सव की तस्वीरें उभरने लगती हैं। हम उनकी संस्कृति की प्रशंसा करते हैं, उनकी परंपराओं को भारत की विविधता का सुंदर प्रतीक बताते हैं और सामाजिक माध्यमों पर शुभकामनाएँ साझा करते हैं। लेकिन इस उत्सव के पीछे छिपे उस प्रश्न को कितनी बार देखते हैं, जो आदिवासी जीवन के सामने आज सबसे गंभीर होकर खड़ा है—क्या आदिवासी समाज अपनी जमीन, जंगल, जल और सांस्कृतिक स्वायत्तता के साथ सुरक्षित भी है?

यह वीडियो इसी विरोधाभास को सामने लाता है। एक ओर पारंपरिक वेशभूषा में खड़े आदिवासी स्त्री-पुरुष हैं, जिनकी पोशाक और अलंकरण सदियों की सांस्कृतिक स्मृति को अपने भीतर सँजोए हुए हैं। दूसरी ओर चाय-बागानों में श्रम करती महिलाएँ हैं। कहीं सामुदायिक अनुष्ठान है, कहीं अपनी माँगों के लिए सड़क पर उतरे लोग हैं। और फिर जंगलों में कटे पड़े वृक्ष तथा धुएँ से घिरा हुआ भू-दृश्य है। ये दृश्य केवल तस्वीरें नहीं हैं; ये आदिवासी जीवन की बदलती हुई कहानी के अलग-अलग अध्याय हैं।

आदिवासी संस्कृति को केवल ‘लोक-संस्कृति’ के संग्रहालय में सुरक्षित रखने की वस्तु मानना सबसे बड़ी भूल होगी। संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब उसके वाहक अपनी जमीन पर सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जी सकें। जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का भंडार नहीं है। वह भोजन, औषधि, जल, आजीविका, आस्था, स्मृति और सामाजिक संबंधों का आधार है। जंगल का विनाश इसलिए केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-पद्धति पर आघात है।

विडंबना यह है कि जिस विकास को अक्सर राष्ट्रीय प्रगति का पर्याय माना जाता है, उसकी कीमत सबसे अधिक वही समुदाय चुकाते हैं जिनका प्रकृति के साथ संबंध सबसे पुराना और सबसे गहरा रहा है। खनन, औद्योगिक परियोजनाएँ, सड़कें, बाँध, वन-क्षेत्रों का परिवर्तन और अन्य विकास परियोजनाएँ जब स्थानीय समुदायों की भागीदारी और अधिकारों की अनदेखी करती हैं, तब विकास का लाभ और उसकी कीमत—दोनों असमान रूप से वितरित होते हैं।

आदिवासी समाज की समस्या केवल विस्थापन नहीं है। विस्थापन के साथ भाषा विस्थापित होती है, स्मृतियाँ विस्थापित होती हैं, देवस्थल और सामुदायिक परंपराएँ विस्थापित होती हैं और पीढ़ियों से अर्जित पारंपरिक ज्ञान की निरंतरता टूटती है। किसी समुदाय को उसके भौगोलिक परिवेश से अलग कर देना केवल घर बदलना नहीं है; कई बार वह उसके सामाजिक और सांस्कृतिक संसार को ही बदल देता है।

इसलिए आदिवासी दिवस पर हमें यह भी पूछना चाहिए कि हम आदिवासी समाज को किस दृष्टि से देखते हैं। क्या वह हमारे पर्यटन-ब्रोशर का आकर्षक चित्र है? क्या वह मंच पर प्रस्तुत किया जाने वाला नृत्य है? क्या वह किसी सरकारी कार्यक्रम का सांस्कृतिक प्रदर्शन है? या वह भारत के लोकतांत्रिक और बहुलतावादी समाज का समान अधिकार वाला नागरिक समुदाय है?

आदिवासी समाज को मुख्यधारा में लाने की भाषा भी सावधानी मांगती है। क्योंकि प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि आदिवासी समाज को हमारी ‘मुख्यधारा’ में कैसे लाया जाए। प्रश्न यह होना चाहिए कि भारत की मुख्यधारा इतनी व्यापक और लोकतांत्रिक क्यों न हो कि उसमें आदिवासी जीवन-दृष्टि, भाषा, ज्ञान और संस्कृति अपने स्वाभाविक रूप में सम्मानपूर्वक स्थान पा सके।

आज आवश्यकता केवल कल्याणकारी योजनाओं की नहीं, बल्कि अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की है। वन, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े निर्णयों में स्थानीय समुदायों की वास्तविक भागीदारी हो। शिक्षा आदिवासी भाषाओं और स्थानीय ज्ञान से संवाद करे। स्वास्थ्य व्यवस्था उनकी भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझे। रोजगार के अवसर स्थानीय अर्थव्यवस्था को नष्ट करने के बजाय उसे मजबूत करें। और विकास परियोजनाओं में विस्थापन को अपरिहार्य नियति मानने के बजाय न्यायपूर्ण पुनर्वास और स्थानीय सहमति को केंद्रीय महत्व दिया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात—आदिवासी समाज के बारे में निर्णय उनकी ओर से नहीं, उनके साथ मिलकर लिए जाने चाहिए। इस वीडियो के अंतिम दृश्य में कटे हुए पेड़ विशेष रूप से बेचैन करते हैं। एक ओर हम आदिवासी संस्कृति की तस्वीरों को सहेज रहे हैं, दूसरी ओर उस प्राकृतिक संसार को काट रहे हैं जिसने उस संस्कृति को जन्म दिया और पीढ़ियों तक उसका पोषण किया। यदि जंगल समाप्त होंगे, तो केवल वृक्ष नहीं जाएँगे; उनके साथ उन असंख्य लोक-स्मृतियों, कथाओं, गीतों, औषधीय ज्ञान और जीवन-प्रथाओं का भी क्षरण होगा जिनका दस्तावेजीकरण शायद कभी हुआ ही नहीं।

आदिवासी दिवस इसलिए केवल आदिवासी संस्कृति का उत्सव मनाने का दिन नहीं होना चाहिए। यह अपने विकास-बोध की समीक्षा करने का दिन भी होना चाहिए। हमें तय करना होगा कि हमें आदिवासी संस्कृति संग्रहालयों में सुरक्षित चाहिए या जीवित समाजों में?

यदि उत्तर जीवित संस्कृति है, तो हमें उसके जंगल बचाने होंगे, उसकी जमीन के अधिकार सुरक्षित करने होंगे, उसकी भाषाओं को बचाना होगा और उसके समुदायों को अपने भविष्य के निर्णय में बराबर की आवाज देनी होगी।

आदिवासी समाज को बचाना किसी एक समुदाय को बचाना नहीं है। यह उस भारत को बचाना है, जिसकी विविधता उसकी सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है।

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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