Urban Flood Crisis in India: Unplanned Concretization, Ecosystem Collapse, and Invited Disasters
This editorial presents a critical analysis of the recurring urban flooding and drainage crises in major Indian metropolises during the monsoon season. Drawing upon four decades of personal observations, the author underscores that the current devastation is not a natural disaster but an invited, man-made tragedy fueled by unplanned concretization, destruction of natural water channels, and an unsustainable development model celebrated blindly by both the administration and civil society.
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| चित्र मुम्बई प्रतिनिधि-सुनील कुमार |
इधर कई वर्षों से एक बेहद चिंताजनक और स्थायी परिपाटी देखने में आ रही है। दिल्ली और मुंबई जैसे देश के शीर्ष महानगर शुरुआती बरसात की पहली फुहारें झेलने में भी असमर्थ साबित हो रहे हैं। कुछ ही घंटों की बारिश में समूचा महानगरीय जीवन जलमग्न हो जाता है, सड़कों पर गाड़ियां तैरने लगती हैं, बुनियादी ढांचा चरमरा जाता है, सड़कें धंस जाती हैं और पुल ढह जाते हैं। करोड़ों की आबादी वाले इन आर्थिक इंजनों का चक्का जाम हो जाना अब एक वार्षिक त्रासदी बन चुका है। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या यह वाकई कोई प्राकृतिक आपदा है? क्या सचमुच प्रकृति हमारे साथ क्रूरता कर रही है?
आंकड़े और धरातलीय यथार्थ गवाही देते हैं कि न तो वर्षा के पैटर्न में कोई ऐसा अप्रत्याशित उछाल आया है जिसे संभाला न जा सके, और न ही यह प्रकृति का तात्कालिक प्रकोप है। वास्तव में, यह विशुद्ध रूप से एक 'आमंत्रित आपदा' है, जिसे हमने अपने अनियोजित और अनियंत्रित लालच से खुद तैयार किया है।
इस विभीषिका के मूल कारणों को समझने के लिए हमें बहुत पीछे नहीं, महज 30-40 साल पीछे मुड़कर देखना होगा। वर्ष 1983 के जुलाई महीने की मुंबई का स्मरण करें—जब घनघोर और अनवरत बारिश का दौर हफ्तों चलता था। उस दौर में भी जीवन थमता नहीं था। बारिश बंद होते ही पानी न जाने कहाँ गायब हो जाता था। इसके पीछे कोई जादुई प्रशासनिक तंत्र नहीं, बल्कि प्रकृति का अपना रक्षा-कवच था। हर इलाके में प्राकृतिक खाइयाँ, नाले, तालाब और आर्द्रभूमि (Wetlands) मौजूद थीं। पानी बरसता था और इन प्राकृतिक रास्तों से होता हुआ सुगमता से समुद्र या नदियों में विलीन हो जाता था। जमीन के पास सोखने के लिए हरियाली थी और पानी को रास्ता देने के लिए खुली जगह।
बीते चार दशकों में विकास की अंधी दौड़ ने इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को मटियामेट कर दिया। हर अगली यात्रा के साथ महानगरों का भूगोल बदलता गया। कॉलोनियां बढ़ती गईं, बहुमंजिला इमारतें खड़ी होती गईं, और इस कंक्रीट के जंगल की भेंट चढ़ गईं वे प्राकृतिक खाइयाँ, तालाब, हरियाली और सदियों पुराने पेड़। परिणाम स्वरूप, सदी बदलते-बदलते दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों का न केवल मौसम बदल गया—जहाँ अब गर्मी और सर्दी दोनों अपने चरम पर पहुँच रही हैं—बल्कि शहरों की जलनिकासी क्षमता पूरी तरह समाप्त हो गई।
आज हमारे महानगर कंक्रीट के ऐसे कटोरे बन चुके हैं, जिनमें पानी के रिसाव (Infiltration) के लिए कोई जगह नहीं बची है। प्राकृतिक जलमार्गों पर ऊंची इमारतें तान दी गई हैं, नालों को पाटकर वीआईपी कॉलोनियां या व्यावसायिक परिसर बना दिए गए हैं। यह स्थिति एक गंभीर चेतावनी है। यदि हमारा तथाकथित 'विकास मॉडल' इसी ढर्रे पर चलता रहा, जहाँ प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु समझा जाता है, तो भविष्य की स्थिति कितनी भयावह होगी, इसका अंदाजा लगाना भी रूह कँपा देने वाला है।
प्राकृतिक आपदाएं अनपेक्षित होती हैं, लेकिन जब आप पानी के प्राकृतिक रास्तों को रोककर वहां शहर बसाएंगे, तो पानी आपके घरों में घुसेगा ही। इसे तकनीकी भाषा में 'अर्बन फ्लडिंग' (Urban Flooding) कहकर प्रशासनिक अकर्मण्यता को छुपाया नहीं जा सकता।
सबसे खेदजनक और चिंताजनक पहलू यह है कि प्रकृति द्वारा बार-बार दी जा रही इन कठोर चेतावनियों के बावजूद न तो तंत्र जाग रहा है और न ही समाज। खाइयों को पाटने, पेड़ों को काटने और पहाड़ों को नेस्तनाबूद करने का आत्मघाती सिलसिला बेधड़क जारी है, क्योंकि इस महाविनाश के पीछे तीन स्पष्ट कड़वे सच खड़े हैं। पहला, संवेदनहीन नीति-निर्माता और सरकारें, जिनके पास शहरों के लिए कोई दीर्घकालिक 'सस्टेनेबल मास्टर प्लान' नहीं है। जल-निकासी (Drainage System) की सफाई और सुदृढ़ीकरण केवल कागजी कसरत, चुनावी वादों और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
दूसरा, कार्पोरेट्स द्वारा हर स्तर पर केवल मुनाफा कमाने नीति। तीसरा भ्रमित और लापरवाही से भरा हमारा समाज (जनता)। यहाँ त्रासदी केवल जनता के मौन रहने की नहीं है; विडंबना तो यह है कि समाज पर्यावरण के इस सुनियोजित विनाश को 'विकास और प्रगति' समझकर खुश होता है। जब तक प्राकृतिक तालाबों को पाटकर बनी चमचमाती मॉल-संस्कृति और कंक्रीट के आलीशान फ्लैट्स हमें लुभाते रहेंगे, हम इस तबाही के मूक समर्थक बने रहेंगे। हमारी यह आत्मघाती खुशी तब तक नहीं टूटती, जब तक कि दूषित पानी हमारे खुद के आलीशान शयनकक्षों (Bedrooms) तक न पहुँच जाए। हम एक नागरिक के तौर पर अपनी सामूहिक और व्यक्तिगत जवाबदेही पूरी तरह भूल चुके हैं।
'ईस्टर्न साइंटिस्ट' का यह स्पष्ट मानना है कि यदि हमें अपने महानगरों को डूबने और अपनी भावी पीढ़ियों को एक बदसूरत, रहने अयोग्य कंक्रीट के खंडहर में धकेलने से बचाना है, तो हमें तुरंत अपने विकास के पैमाने को बदलना होगा। विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश कतई नहीं हो सकता। समय आ गया है कि नगर नियोजन में 'इकोलॉजी' (पारिस्थितिकी) को 'इकोनॉमी' (अर्थव्यवस्था) के समकक्ष रखा जाए। अन्यथा, प्रकृति जब अपना अंतिम हिसाब मांगेगी, तब हमारे पास बचने के लिए कोई कंक्रीट का ढाल काम नहीं आएगा। चेत जाइए, क्योंकि पानी अब सिर से ऊपर गुजर रहा है।
Dr. R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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