जल-जंगल-जमीन के बाद देवताओं से बेदखल होते आदिवासी

Editorial Analysis
Published: May 28, 2026 | Editor in Chief

After Water, Forests, and Land, Indigenous Communities Are Now Being Dispossessed of Their Gods

Abstract
The recent controversy surrounding Dai Bamleshwari Temple in Dongargarh is not merely a dispute over ritual practices or animal sacrifice. It reflects a much larger national pattern in which Indigenous and tribal sacred sites across India are being gradually absorbed into mainstream religious, political, and commercial structures.
For generations, the Gond and Baiga communities worshipped Dai Bamleshwari through nature-based traditions rooted in hills, forests, stones, and ancestral spirituality. However, as tourism, temple economies, and organized religious institutions expanded, many such Indigenous faith spaces began undergoing “Puranization” — the process of reinterpreting local deities within Brahmanical and Puranic Hindu frameworks.
As a result, traditional tribal rituals are increasingly being labeled “illegal,” “impure,” or “uncivilized,” while new temple trusts and administrative systems marginalize the very communities that historically protected these sacred spaces. The arrest linked to traditional Baiga worship practices in Dongargarh symbolizes this deeper struggle over cultural ownership and spiritual legitimacy.
The article argues that this is not an isolated issue limited to Chhattisgarh. Similar conflicts are emerging across Jharkhand, Odisha, Madhya Pradesh, Maharashtra, and Northeast India, where Indigenous sacred traditions are increasingly being transformed into commercialized pilgrimage and tourism centers.
At its core, the conflict raises a fundamental question: In India’s democracy, do Indigenous communities have the right to preserve their own forms of worship and spiritual autonomy, or will they become mere spectators to the appropriation of their own gods, rituals, and sacred landscapes?


छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव जिले के डोंगरगढ़ स्थित दाई बम्लेश्वरी धाम का हालिया विवाद केवल एक मंदिर या पूजा पद्धति का विवाद नहीं है। यह उस बड़े सांस्कृतिक संघर्ष का हिस्सा है, जिसमें देश की आदिम जातियों के प्राचीन आस्था स्थलों, देवी-देवताओं और पूजा परंपराओं पर धीरे-धीरे नियंत्रण स्थापित किया जा रहा है।

डोंगरगढ़ की बम्लेश्वरी देवी को स्थानीय गोंड और बैगा आदिवासी समाज अपनी कुलदेवी मानता है। वे उन्हें “दाई बम्लेश्वरी” कहते हैं। इतिहास बताता है कि यह मंदिर खैरागढ़ की गोंड रियासत से जुड़ा रहा है और यहाँ की पूजा बैगा पद्धति से होती थी। जंगल, पहाड़, पत्थर, नदी और प्रकृति से जुड़ी यह पूजा किसी शास्त्रीय ब्राह्मणवादी परंपरा का हिस्सा नहीं थी, बल्कि आदिवासी जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति थी।

लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे सत्ता, बाजार और संगठित धर्म का प्रभाव बढ़ा, वैसे-वैसे इन आदिम आस्थाओं का “पुराणीकरण” शुरू हुआ। स्थानीय देवी-देवताओं को पुराणों की कथाओं में समाहित किया गया। प्रकृति आधारित पूजा स्थलों को मूर्तियों और भव्य मंदिरों में बदला गया। फिर मंदिरों का “सुंदरीकरण” हुआ, पर्यटन परियोजनाएँ आईं, ट्रस्ट बने और धीरे-धीरे मूल समुदायों को किनारे कर दिया गया।
आज स्थिति यह है कि जिन आदिवासी समुदायों ने सदियों तक इन स्थलों की रक्षा की, वही अपनी पारंपरिक पूजा करने पर अपराधी बना दिए जा रहे हैं। डोंगरगढ़ में बैगा पद्धति से पूजा और कथित बलि प्रकरण में किशोर नेताम उर्फ राज बैगा की गिरफ्तारी इसी विडंबना का उदाहरण है। मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि मंदिर में केवल वैदिक पद्धति से पूजा की अनुमति है। प्रश्न यह है कि क्या किसी आदिवासी देवी स्थल की मूल परंपरा को “अवैध” घोषित कर देना न्यायसंगत है? क्या वैदिक पद्धति ही एकमात्र धार्मिक मर्यादा है?
यहाँ मूल संघर्ष केवल बलि प्रथा का नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक स्वामित्व का है। कौन तय करेगा कि किसी समुदाय की आस्था वैध है या अवैध? वह समुदाय जिसने सदियों से उस देवी को माना, या वह ट्रस्ट जो हाल के दशकों में बना?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि मंदिर ट्रस्टों में मूल समुदायों की भागीदारी क्यों समाप्त की जा रही है? डोंगरगढ़ मामले में भी आदिवासी समाज और खैरागढ़ राजपरिवार ने ट्रस्ट में गोंड, बैगा और पारंपरिक संरक्षकों को शामिल करने की मांग की है। लेकिन देशभर में एक समान प्रवृत्ति दिखाई देती है—जैसे ही किसी आदिवासी आस्था स्थल का आर्थिक या पर्यटन महत्व बढ़ता है, वहाँ से आदिवासी नियंत्रण कम होने लगता है।
यह प्रक्रिया केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक अनेक आदिवासी देवस्थल धीरे-धीरे मुख्यधारा धार्मिक संरचनाओं में समाहित किए जा रहे हैं। कहीं सरना स्थलों पर कब्ज़े के विवाद हैं, कहीं पहाड़ी देवस्थलों को व्यावसायिक पर्यटन केंद्रों में बदला जा रहा है, तो कहीं पारंपरिक पुजारियों को हटाकर नई व्यवस्थाएँ लागू की जा रही हैं।
यह प्रवृत्ति केवल आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में अनेक क्षत्रिय, वैश्य तथा पिछड़ी, दलित और आदिवासी जातियों की कुलदेवियों के यहाँ आज भी बकरे, सूअर या मुर्गे की बलि की लोक परंपरा मौजूद है। ये लोक देवियाँ प्रायः शास्त्रीय पुराणों में वर्णित नहीं हैं और इनके देवस्थलों के पुजारी भी परंपरागत रूप से स्थानीय जातीय समुदायों से आते रहे हैं।
किन्तु हाल के दशकों में हिन्दुत्व राजनीति और ब्राह्मणवादी धार्मिक पुनर्गठन के प्रभाव में इन लोक आस्था स्थलों पर भी धीरे-धीरे पौराणिक वैदिक पद्धति थोपे जाने की प्रक्रिया तेज हुई है। पारंपरिक बलि प्रथाओं को “अशुद्ध” या “अवैध” बताकर हतोत्साहित किया जा रहा है तथा उनकी जगह संस्कृतनिष्ठ पौराणिक कर्मकांड स्थापित किए जा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप मूल समुदायों का सांस्कृतिक अधिकार कमजोर पड़ता जा रहा है।
इसके विपरीत बिहार, बंगाल और असम जैसे क्षेत्रों में आदिम लोक परंपराओं का शाक्त परंपरा में ऐतिहासिक समावेशन हुआ। तारा, कामाख्या, छिन्नमस्ता और काली जैसे शक्तिपीठों में भव्य पौराणिक मंदिर बनने के बावजूद आज भी पशु बलि, मछली, कबूतर, बत्तख अथवा अन्य लोक अनुष्ठानों की परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। वहाँ शास्त्रीय और लोक परंपराओं के बीच एक प्रकार का सह-अस्तित्व दिखाई देता है।
यही कारण है कि डोंगरगढ़ जैसे विवाद केवल धार्मिक मतभेद नहीं हैं, बल्कि इस प्रश्न से जुड़े हैं कि भारत अपनी आदिम सांस्कृतिक परंपराओं को किस रूप में स्वीकार करेगा—उन्हें मिटाकर, या उनके साथ सह-अस्तित्व स्थापित करके।
असल में यह सांस्कृतिक विस्थापन का नया दौर है। विकास, पर्यटन और धार्मिक व्यवस्थापन के नाम पर आदिवासी समाज को उसकी स्मृतियों, प्रतीकों और आध्यात्मिक अधिकारों से दूर किया जा रहा है।
विडंबना यह है कि जिन आदिवासी परंपराओं को कभी “जंगली” या “असभ्य” कहा गया, आज उन्हीं की सांस्कृतिक ऊर्जा और धार्मिक लोकप्रियता पर बाजार खड़ा किया जा रहा है। मंदिरों के आसपास होटल, रोपवे, दुकानों और चढ़ावे की अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है, लेकिन मूल समुदाय हाशिए पर हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या भारतीय लोकतंत्र में आदिवासी समुदायों को अपनी पूजा पद्धति बचाने का अधिकार है? संविधान सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता की बात करता है, लेकिन व्यवहार में आदिवासी आस्थाएँ लगातार नियंत्रित और पुनर्परिभाषित की जा रही हैं।
दाई बम्लेश्वरी का संघर्ष केवल एक मंदिर का संघर्ष नहीं है। यह उस मूल प्रश्न का संघर्ष है कि भारत की सभ्यता में आदिवासी समुदायों की जगह क्या होगी—साझेदार की या केवल दर्शक की?
यदि आदिवासी समाज को उसकी ही देवी, पहाड़, जंगल और पूजा पद्धति से अलग कर दिया जाएगा, तो यह केवल धार्मिक अन्याय नहीं होगा, बल्कि भारत की सबसे प्राचीन सांस्कृतिक स्मृतियों का विनाश भी होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आदिवासी आस्था स्थलों के प्रबंधन में मूल समुदायों की निर्णायक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। उनकी पूजा पद्धतियों और सांस्कृतिक अधिकारों को अपराध की तरह नहीं, बल्कि भारत की बहुल परंपराओं के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाए। अन्यथा आने वाले समय में इतिहास यह दर्ज करेगा कि विकास, धर्म और पर्यटन के गठजोड़ ने केवल जंगल ही नहीं छीने, बल्कि आदिवासियों के देवता भी उनसे छीने जा रहे हैं।

Dr. R. Achal

डॉ. आर. अचल पुलस्तेय

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

डॉ. आर. अचल पुलस्तेय — मुख्य संपादक, 'ईस्टर्न साइंटिस्ट'। सामाजिक-सांस्कृतिक, लोक-साहित्यिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक परिवर्तनों पर शोध और दृष्टि रखने वाले एक बहुआयामी विद्वान हैं।

ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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