भू-राजनीतिक अदूरदर्शिता, मित्र पूंजीवाद और भारत का गहराता आर्थिक संकट
'ईस्टर्न साइंटिस्ट' का यह संपादकीय भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति और सरकार की विदेश व आंतरिक नीतियों का एक गंभीर, यथार्थवादी और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच भारत की संतुलित विदेश नीति के विचलन ने देश को बड़े ऊर्जा संकट में डाल दिया है। फारस की खाड़ी से होने वाले ४०% तेल-गैस आयात पर इसका सीधा असर पड़ा है। कूटनीतिक विश्वसनीयता खोने के कारण भारत को अब वेनेजुएला और अमेरिका जैसे देशों से डेढ़ गुना अधिक कीमत पर ईंधन आयात करना पड़ रहा है, जिससे कमर्शियल गैस की कीमतों में ३०% तक की वृद्धि हुई है।
देश का विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र कच्चे माल और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण संकट में है। सूरत का हीरा उद्योग और पंजाब-हरियाणा-NCR के औद्योगिक क्लस्टर्स प्रभावित हुए हैं। पिछले दो वर्षों में देश से लगभग ३.५० लाख करोड़ रुपये का विदेशी निवेश (FPI) बाहर जा चुका है, जो इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था उत्पादक क्षेत्र से हटकर केवल उपभोक्ता-आधारित (Consumer Economy) बनकर रह गई है।
उद्योगों में स्थायी नौकरियों को समाप्त कर ठेका प्रथा (Outsourcing) को ४१% तक बढ़ा दिया गया है। देश में सुरक्षित रोजगार न होने के कारण शिक्षित युवा 'गिग इकोनॉमी' (जैसे डिलीवरी पार्टनर, फ्रीलांसर आदि) की ओर बढ़ने को मजबूर हैं, जहां कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। वेतन में स्थिरता (Wage Stagnation) और छिपी बेरोजगारी के कारण १८ से ३४ वर्ष के लगभग ६०% युवा मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं।
१ अप्रैल २०२६ से लागू किए गए चार नए श्रम कोडों के कारण मजदूर वर्ग में भारी असंतोष है। शिक्षा और स्वास्थ्य के बढ़ते निजीकरण तथा वास्तविक मजदूरी में गिरावट ने इस आर्थिक संकट को और गहरा कर दिया है। सरकार इस बहुआयामी संकट का संरचनात्मक समाधान खोजने के बजाय असहमतियों, पत्रकारों और श्रमिक यूनियनों की आवाजों को दबाने का प्रयास कर रही है।
'ईस्टर्न साइंटिस्ट' के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था को केवल ध्रुवीकरण, विज्ञापनों या चुनावी गणित के सहारे नहीं चलाया जा सकता। भारत आज एक ऐतिहासिक चौराहे पर है, जहाँ सरकार को खोखले दावों से बाहर निकलकर १४७ करोड़ भारतीयों के वास्तविक मुद्दों—जैसे महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक न्याय—पर तत्काल ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
Dr.R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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