Earth Day: The Earth in Hiranyaksha’s Grip — Awaiting the Varaha Avatar
The article argues that Earth, traditionally revered as “Dharaṇī” (the sustainer) and “Ratnagarbhā” (rich in resources), is now facing an unprecedented crisis due to human exploitation. The very awareness of Earth’s richness led to its continuous overuse, which has now reached alarming levels. Although Earth Day is observed annually on April 22 to raise awareness, it has largely become a symbolic ritual rather than a meaningful intervention. Drawing from Indian mythological narratives, particularly the Varaha (boar) incarnation of Lord Vishnu, the author interprets the story as an ecological metaphor. Hiranyaksha, meaning “the one with golden eyes,” symbolizes modern consumerist greed that seeks to capture and exploit all natural resources. In contrast, Varaha represents the force that restores ecological balance and rescues the Earth from destruction.
The editorial emphasizes that ancient myths should not be read literally but interpreted contextually. It suggests that the conflict between Hiranyaksha and Varaha reflects an ongoing struggle between exploitative and protective approaches to nature. Today, excessive mining, deforestation, pollution, and commercialization of natural resources have made the Earth increasingly fragile.
The author critiques modern development, arguing that it is fundamentally destructive, as it depends on the depletion of natural ecosystems. Climate change, rising temperatures, melting ice caps, floods, droughts, and pandemics are presented as consequences of this imbalance.
The article concludes that a new “Varaha” is needed—not as a divine figure, but as a collective human awakening. Scientists, intellectuals, and especially indigenous communities must lead the way in redefining development and restoring harmony with nature. Without such a shift, the survival of humanity itself is at risk.
पृथ्वी—जिसे हमारी परंपरा ने धरणी, रत्नगर्भा और माँ जैसे स्नेहिल नामों से पुकारा—आज अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रही है। ‘धरणी’ अर्थात वह जो सबको धारण करती है; पर विडंबना यह है कि वही धारण करने वाली आज स्वयं संरक्षण की याचक बन गई है। ‘रत्नगर्भा’ होने का ज्ञान जैसे ही मनुष्य को हुआ, उसी क्षण से उसके शोषण की प्रक्रिया भी आरम्भ हो गई। आज यह शोषण इतना व्यापक हो चुका है कि पृथ्वी को बचाने के लिए वैश्विक अभियानों की आवश्यकता पड़ रही है।.
हर वर्ष 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें चेताने के लिए है, परंतु दुर्भाग्यवश यह चेतना अब एक औपचारिक कर्मकाण्ड में बदलती जा रही है। प्रश्न यह है कि पृथ्वी को खतरे में किसने डाला? उत्तर स्पष्ट है—मानव ने। किंतु स्वीकार करने का साहस नहीं है। विकास की अंधी दौड़ हमें उस बिंदु पर ले आई है, जहाँ से लौटना कठिन प्रतीत होता है।.
इस संकट को समझने के लिए भारतीय मिथक साहित्य विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठता है। भगवान विष्णु के वाराह अवतार की कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि गहरे पर्यावरणीय संकेतों से भरी हुई है। हिरण्याक्ष—जिसका अर्थ है ‘सोने की आँख वाला’—आज के उपभोक्तावादी मनुष्य का प्रतीक है, जिसकी दृष्टि केवल संसाधनों पर है। वह हर मूल्यवान वस्तु पर अधिकार करना चाहता है। यही असीमित भोगलिप्सा आज पृथ्वी के विनाश का मूल कारण है।
पुराणों की भाषा प्रतीकात्मक है। हिरण्याक्ष को यदि संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का प्रतीक माना जाए और वाराह को उस शक्ति के रूप में देखा जाए जो पृथ्वी को बचाती है, तो यह कथा आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। खनिजों का अत्यधिक दोहन, वनों की कटाई, जल स्रोतों का क्षरण—ये सभी मिलकर पृथ्वी को ‘खोखला’ बना रहे हैं। परिणामस्वरूप पर्यावरण असंतुलन, जैवविविधता का संकट और संसाधनों के लिए संघर्ष बढ़ता जा रहा है।
वाराह को यदि हम केवल एक पशु के रूप में देखें, तो हम इस कथा का सार खो देते हैं। नृविज्ञान के अनुसार प्राचीन समाजों में पशु-टोटम पर आधारित कबीलाई पहचान सामान्य थी। संभवतः ‘वाराह’ भी एक ऐसे ही समुदाय का प्रतीक रहा हो, जिसने प्रकृति के संतुलन को बचाने का संघर्ष किया। आज भी आदिवासी समाजों में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की परंपरा जीवित है—वहीं से आधुनिक ‘वाराह’ की संभावना दिखाई देती है।
आज पृथ्वी एक बार फिर ‘अपहृत’ हो रही है। उपभोक्तावादी संस्कृति विकास के नाम पर हवा, पानी, जंगल, जमीन सबको बाजार में बदल रही है। विडंबना यह है कि जो शक्तियाँ पृथ्वी का सर्वाधिक दोहन कर रही हैं, वही पृथ्वी दिवस का सबसे बड़ा उत्सव भी मनाती हैं। मानो हिरण्याक्ष ही वाराह बनने का अभिनय कर रहा हो। वर्तमान संकट केवल भौतिक नहीं, बौद्धिक भी है। वैज्ञानिक और बौद्धिक वर्ग—की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे समाधान विकसित करें जो अपशिष्ट और प्रदूषण को समाप्त कर सकें। क्योंकि आज का ‘मल’ केवल भौतिक कचरा नहीं, बल्कि उपभोक्तावादी मानसिकता भी है, जो पृथ्वी को ढकती जा रही है।
विकास की वर्तमान परिभाषा स्वयं विनाश का पर्याय बन चुकी है। चमकते शहरों के पीछे जंगलों का अंधकार छिपा है; ऊँची इमारतों के पीछे पहाड़ों का क्षरण है। तापमान वृद्धि, ग्लोबल वार्मिंग, ध्रुवीय बर्फ का पिघलना, समुद्र स्तर का बढ़ना—ये सभी संकेत हैं कि पृथ्वी अपनी सीमाओं तक पहुँच चुकी है। इसके साथ ही नए-नए जीवाणु और विषाणु उत्पन्न हो रहे हैं, जो महामारी के रूप में मानवता को चुनौती दे रहे हैं।
यदि पृथ्वी को बचाना है, तो ‘वाराह अवतार’ की आवश्यकता पुनः है—पर यह अवतार कोई दिव्य घटना नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उदय होना चाहिए। यह अवतार विज्ञान, समाज और संस्कृति के समन्वय से ही संभव है। विशेष रूप से उन समुदायों से सीखना होगा, जिन्हें हम ‘अविकसित’ कहकर नजरअंदाज करते हैं, जबकि उन्होंने प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखा है।
अब समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा को पुनः लिखें। अन्यथा आज सवाल पृथ्वी को बचाने का नहीं मानव के अस्तित्व बचाने का है।
डॉ. आर. अचल पुलस्तेय
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
Multidisciplinary scholar focusing on socio-economic transitions and geopolitical shifts in the Eastern hemisphere.
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