Public Discourse
Published: May 18, 2026
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Author: डॉ.कीर्ति अनामिका
Urban Development and the Erasure of Local Cultures in India
This article critically examines India’s contemporary urban development model and its impact on local cultural identities. It argues that rapid urbanization, corporate architecture, and centralized planning are transforming diverse Indian cities into culturally uniform spaces dominated by glass towers, malls, and standardized infrastructure.
While colonial-era architecture often incorporated regional aesthetics and local heritage, modern urban projects increasingly resemble globalized metropolitan designs detached from local history and traditions. The essay highlights how languages, traditional markets, local communities, and regional architectural identities are being erased in the name of modernization and “smart development.” It questions the contradiction between celebrating India’s civilizational heritage and simultaneously destroying the cultural soul of its cities.
अभी बहुत समय नहीं बीता। 2018 तक भी किसी प्रदेश की राजधानी में पहुँचते ही यह महसूस हो जाता था कि हम एक अलग भूगोल, अलग संस्कृति और अलग जीवन-संसार में आये हैं। लखनऊ की अपनी तहज़ीब थी, कोलकाता की अपनी बौद्धिक बेचैनी, चेन्नई की अपनी द्रविड़ पहचान और जयपुर की अपनी स्थापत्य स्मृतियाँ। शहर केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं थे; वे अपने इतिहास, भाषा, खान-पान, स्थापत्य और लोक-संस्कृति के जीवित रूप थे।
लेकिन आज स्थिति तेजी से बदल रही है। अब देश के किसी भी बड़े शहर में जाइए—एक जैसे ग्लास टॉवर, एक जैसे मॉल, एक जैसी चौड़ी सड़कें, एक जैसे कैफ़े, एक जैसे विज्ञापन और एक जैसी कृत्रिम शहरी भाषा। ऐसा लगता है मानो पूरा देश धीरे-धीरे “दिल्ली” में बदलता जा रहा हो। शहरों की स्थानीय आत्मा को एक केंद्रीकृत शहरी मॉडल निगलता जा रहा है।
विडंबना यह है कि औपनिवेशिक शासन, जिसे हम सांस्कृतिक लूट और दमन का काल कहते हैं, उसने भी कई बार स्थानीय स्थापत्य और सांस्कृतिक विशेषताओं को ध्यान में रखा। ब्रिटिश काल में बने अनेक रेलवे स्टेशन, प्रशासनिक भवन और विश्वविद्यालय स्थानीय स्थापत्य शैलियों से प्रभावित थे। मुंबई का विक्टोरिया टर्मिनस, चेन्नई का सेंट्रल स्टेशन, लखनऊ और जयपुर की इमारतें — इनमें स्थानीय कला और ऐतिहासिक पहचान की झलक दिखाई देती थी। औपनिवेशिक सत्ता का उद्देश्य भले शोषण रहा हो, लेकिन स्थापत्य में एक प्रकार की क्षेत्रीय संवेदना फिर भी बची हुई थी।
इसके विपरीत स्वतंत्र भारत का वर्तमान विकास मॉडल एक विचित्र सांस्कृतिक एकरूपता पैदा कर रहा है। नए रेलवे स्टेशन हों, एयरपोर्ट हों या सरकारी भवन — सब कुछ किसी वैश्विक कॉरपोरेट शहर की नकल जैसा दिखने लगा है। काँच और स्टील की चमक के बीच स्थानीय स्थापत्य, लोक कलाएँ और ऐतिहासिक स्मृतियाँ गायब होती जा रही हैं। ऐसा लगता है मानो भारत के शहर भारत में नहीं, बल्कि किसी कृत्रिम “वॉशिंगटन मॉडल” की प्रतिलिपि में निर्मित हो रहे हों।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक ओर हम “महाविरासत”, “सभ्यता”, “विश्वगुरु” और “सनातन सांस्कृतिक गौरव” की बातें करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने ही शहरों की सांस्कृतिक आत्मा को नष्ट कर रहे हैं। विरासत केवल मंदिरों और स्मारकों में नहीं होती; वह शहरों की गलियों, बाजारों, बोलियों, स्थापत्य और सामुदायिक जीवन में भी होती है। यदि हर शहर एक जैसा दिखने लगे, तो वह राष्ट्र सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नहीं, बल्कि स्मृतिहीन बन जाता है।
प्रश्न केवल सौंदर्य का नहीं है, बल्कि पहचान का है। यदि विकास स्थानीयता को मिटाकर ही संभव है, तो वह विकास अंततः सांस्कृतिक विनाश का दूसरा नाम बन जाता है।
About the Author
डॉ. कीर्ति अनामिका —
वर्तमान में University of Delhi के अंतर्गत Shyama Prasad Mukherji College for Women के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। आपने Banaras Hindu University से इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विषय में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। इतिहास और संस्कृति से संबंधित आपके अनेक शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।
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