भारतीय अनुसंधान: नीति, बजट और जमीनी हकीकत

Public Discourse
Published: May 17, 2026 | Author: डॉ.एस.सी.गौड़

Indian Research: Policy, Budget, and Ground Reality

The article provides a critical analysis of the global academic migration of Indian researchers, sparked by the high-value 'Graduate Research Scholarship' offered by the University of Melbourne. While this international recognition validates the high caliber of Indian graduates, it underscores a pressing 'talent drain' challenge for India's domestic research ecosystem.
The commentary examines the structural shifts within India's higher education sector, noting that while there is no official reduction in research seats or funding, actual availability has contracted. This contraction is driven by strict UGC mentor-student ratios coupled with thousands of vacant faculty positions across universities. Furthermore, the newly established Anusandhan National Research Foundation (NRF) relies heavily on private sector funding ($72\%$), which risks sidelining basic sciences and humanities.
To transition from 'Brain Drain' to 'Brain Gain' and transform India into a global knowledge superpower, the author advocates for administrative reforms to prevent fellowship delays, immediate recruitment of faculty to naturally expand PhD seats, and the expansion of high-value domestic fellowships like the PMRF.

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की अग्रणी यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न द्वारा घोषित 'ग्रेजुएट रिसर्च स्कॉलरशिप'—जिसके तहत शत-प्रतिशत ट्यूशन फीस माफी के साथ लगभग 39,500 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (अनुमानित 22 लाख रुपये) का वार्षिक स्टाइपेंड और रीलोकेशन ग्रांट दिया जा रहा है—ने एक बार फिर विकासशील देशों से होने वाले अकादमिक प्रवास की बहस को जन्म दे दिया है। वैश्विक स्तर पर शीर्ष 15 विश्वविद्यालयों में शुमार संस्थानों द्वारा भारतीय शोधकर्ताओं को दिया जा रहा यह आकर्षण केवल एक छात्रवृत्ति नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा के उस वैश्विक बाजार की बानगी है जहां टैलेंट को आकर्षित करने के लिए विकसित देश अपनी पूरी आर्थिक शक्ति झोंक रहे हैं। यह स्थिति भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक गंभीर विरोधाभास पैदा करती है। एक ओर जहां यह हमारे प्राथमिक और उच्च शिक्षण संस्थानों (जैसे IITs, IISc, NITs) की गुणवत्ता को प्रमाणित करता है कि हमारे छात्र वैश्विक स्तर पर बिना किसी अतिरिक्त परीक्षा के सीधे 'ऑटोमैटिक कंसीडरेशन' के हकदार बन रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह भारत के घरेलू अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर 'टैलेंट ड्रेन' की चुनौती भी पेश करता है।
यदि हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में शोध की स्थिति का मूल्यांकन करें, तो यह स्पष्ट होता है कि देश में अनुसंधान बजट और सीटों में कोई प्रत्यक्ष या आधिकारिक कटौती नहीं की गई है, बल्कि एक गहरा नीतिगत और संरचनात्मक बदलाव आया है। भारत का अनुसंधान और विकास (R&D) पर कुल खर्च पिछले लंबे समय से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के $0.6\%$ से $0.7\%$ के दायरे में स्थिर है। इसकी तुलना में चीन ($2.4\%$), अमेरिका ($3\%$), और दक्षिण कोरिया ($4.8\%$) जैसे देश अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा अनुसंधान पर केंद्रित कर रहे हैं। हाल ही में गठित 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' (Anusandhan NRF) के माध्यम से पांच वर्षों में ₹50,000 करोड़ के निवेश का खाका तो खींचा गया है, लेकिन इसका लगभग 72% हिस्सा निजी क्षेत्र से जुटाने का लक्ष्य है। यह नीति एप्लाइड साइंसेज और टेक्नोलॉजी के लिए तो अनुकूल हो सकती है, किंतु बुनियादी विज्ञान और मानविकी के लिए संकट का कारण बन सकती है, क्योंकि निजी फर्में इन क्षेत्रों में निवेश करने से कतराती हैं।
इसके साथ ही, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के कड़े नियमों—जिसके तहत प्रोफेसरों और शोधार्थियों के अनुपात को सख्ती से सीमित किया गया है—ने विश्वविद्यालयों में पीएचडी सीटों की उपलब्धता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है। इसके अतिरिक्त, देश के केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में संकाय सदस्यों के हजारों पद रिक्त पड़े हैं। जब तक नए मार्गदर्शकों की नियुक्तियां नहीं होंगी, तब तक अकादमिक नियमों के तहत सीटों का संकुचन अनिवार्य है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत एम.फिल पाठ्यक्रम की समाप्ति ने भी शोध के क्षेत्र में शुरुआती प्रवेश द्वारों को सीमित किया है।
ऑस्ट्रेलियाई और पश्चिमी विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सुरक्षा और अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं भारतीय छात्रों को एक ऐसा मंच प्रदान करती हैं जो घरेलू स्तर पर प्रशासनिक विसंगतियों और फेलोशिप (जैसे CSIR-NET/UGC) के वितरण में होने वाले विलंब के कारण सुलभ नहीं हो पाता। हालांकि, इस अकादमिक प्रवास को पूरी तरह नकारात्मक रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वैश्वीकरण के इस दौर में ज्ञान का आदान-प्रदान अपरिहार्य है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए हालिया आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते (ECTA) के आलोक में, यदि ये शोधकर्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव प्राप्त कर 'ब्रेन गेन' के रूप में भारत लौटते हैं, तो यह देश के घरेलू टैलेंट पूल, पेटेंट फाइलिंग और अकादमिक नेतृत्व को एक नई ऊंचाई दे सकता है।
भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने के लिए हमें अपने घरेलू अनुसंधान तंत्र को केवल 'नियमों से बांधने' के बजाय 'संसाधनों से समृद्ध' करना होगा। इसके लिए शोधार्थियों को मिलने वाली फेलोशिप का वितरण समयबद्ध और बिना किसी नौकरशाही बाधा के होना चाहिए। साथ ही, उच्च शिक्षण संस्थानों में रिक्त प्रोफेसरों के पदों को अविलंब भरा जाए ताकि शोध की सीटें प्राकृतिक रूप से बढ़ सकें। 'प्राइम मिनिस्टर रिसर्च फेलोशिप' (PMRF) जैसी उच्च-मूल्य वाली योजनाओं का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए ताकि हमारे सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क देश से बाहर जाने के बजाय घरेलू समस्याओं के समाधान पर शोध कर सकें। अंतरराष्ट्रीय स्कॉलरशिप्स का आना हमारे छात्रों की मेधा का उत्सव है, लेकिन हमारे नीति-नियंताओं के लिए यह एक आत्मनिरीक्षण का क्षण भी है कि हम अपनी प्रतिभाओं को देश में ही वैसा ही स्वतंत्र और आर्थिक रूप से सुरक्षित वातावरण कब प्रदान कर पाएंगे?

About the Author

डॉ. सतीश चन्द्र गौड़ वर्तमान में मदन मोहन मालवीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भाटपाररानी, देवरिया (उत्तर प्रदेश) के प्राचार्य हैं। इससे पूर्व, उन्होंने बी.आर.डी. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, देवरिया के कृषि विज्ञान संकाय में 'प्लांट ब्रीडिंग एंड जेनेटिक्स' (Plant Breeding & Genetics) विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में एक लंबा और उल्लेखनीय कार्यकाल पूरा किया है।

एक समर्पित शिक्षाविद् और शोधकर्ता के रूप में डॉ. गौड़ ने अपने विषय से संबंधित कई स्तरीय पुस्तकों का लेखन किया है। उनके अनेक शोध-पत्र राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इसके साथ ही, आप सुप्रसिद्ध बहुविषयक शोध-पत्रिका 'ईस्टर्न साइंटिस्ट' (Eastern Scientist) के संपादक मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं।

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