From Yellow Revolution to Import Dependence: Why India Failed to Achieve Self-Reliance in Edible Oils
The article examines India’s continued dependence on imported edible oils despite being an agrarian nation with a long tradition of oilseed cultivation. Beginning with the Prime Minister’s recent appeal for reduced edible oil consumption, the article questions whether consumer restraint alone can solve the deeper structural crisis surrounding India’s edible oil sector. It argues that the issue is rooted not merely in consumption patterns, but in decades of policy imbalance, weak support for oilseed farmers, globalization-driven import dependence, and the decline of local agro-processing systems. While India once made significant progress during the “Yellow Revolution” and the Technology Mission on Oilseeds, liberalized trade policies and cheap imported palm oil from countries like Indonesia and Malaysia gradually weakened domestic production systems. The article further emphasizes the crucial role of agricultural universities and research institutions in achieving edible oil self-reliance. It argues that region-specific research, improved seed development, farmer training, local processing industries, and decentralized agricultural innovation must become central to any long-term national strategy. Ultimately, the article concludes that genuine self-reliance in edible oils cannot emerge through temporary consumption control alone. It requires rebuilding rural production systems, strengthening local economies, and integrating scientific agricultural research with grassroots farming realities.
हाल के दिनों में प्रधानमंत्री द्वारा खाद्य तेल के कम उपयोग की सलाह ने इस बहस को पुनः केंद्र में ला दिया है। यह अपील तत्कालिक संकट प्रबंधन या उपभोग नियंत्रण के रूप में उपयोगी हो सकती है, लेकिन इससे एक बड़ा प्रश्न भी उभरता है—क्या केवल उपभोक्ता संयम से भारत खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बन सकता है?
वास्तविकता यह है कि भारत की खाद्य तेल समस्या मूलतः उत्पादन, कृषि नीति, अनुसंधान और आयात आधारित आर्थिक संरचना की समस्या है। भारत हर वर्ष भारी मात्रा में पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल का आयात करता है। इसका अर्थ यह है कि देश की रसोई, खाद्य उद्योग और दैनिक उपभोग का एक बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों पर निर्भर है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में संकट आता है, युद्ध होता है या निर्यातक देश प्रतिबंध लगाते हैं, तो उसका सीधा प्रभाव भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
भारत कृषि प्रधान देश कहा जाता है। यहाँ सदियों से सरसों, तिल, नारियल, अलसी, मूंगफली और अनेक पारंपरिक तिलहन फसलें केवल खाद्य आवश्यकताओं का हिस्सा नहीं थीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, ग्रामीण रोजगार और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण आधार थीं। इसके बावजूद आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है। यह स्थिति केवल कृषि उत्पादन की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि नीति, वैश्विक व्यापार, कृषि अनुसंधान और विकास मॉडल से जुड़ा एक जटिल आर्थिक प्रश्न है।
इसका उत्तर इतिहास में छिपा है। हरित क्रांति के समय भारत की प्राथमिकता खाद्यान्न संकट से बाहर निकलना थी। गेहूँ और चावल उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर सिंचाई, उन्नत बीज और सरकारी समर्थन दिया गया। यह रणनीति तत्कालीन परिस्थितियों में आवश्यक थी और उसने अकाल जैसी स्थितियों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन इस प्रक्रिया में तिलहन फसलें नीति के केंद्र से बाहर होती चली गईं। परिणामस्वरूप खाद्यान्न उत्पादन तो तेजी से बढ़ा, पर खाद्य तेल क्षेत्र अपेक्षाकृत कमजोर बना रहा।
हालाँकि भारत ने इस दिशा में प्रयास भी किए। 1980 और 1990 के दशक में “पीली क्रांति” तथा “टेक्नोलॉजी मिशन ऑन ऑयलसीड्स” जैसे कार्यक्रमों ने तिलहन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की। तत्कालीन सरकारों ने बेहतर बीज, अनुसंधान, समर्थन मूल्य और प्रसंस्करण सुविधाओं पर ध्यान दिया। कुछ समय के लिए भारत खाद्य तेल आत्मनिर्भरता के करीब भी पहुँचा। यह इस बात का प्रमाण था कि यदि नीति, अनुसंधान और किसान हित एक साथ काम करें, तो भारत उत्पादन क्षमता विकसित कर सकता है।
लेकिन उदारीकरण के बाद आर्थिक दिशा बदलने लगी। वैश्विक व्यापार समझौतों और सस्ते आयात नीति के कारण विदेशी खाद्य तेल भारतीय बाजार में तेजी से आने लगे। विशेष रूप से Indonesia और Malaysia का पाम ऑयल अत्यंत कम कीमत पर उपलब्ध होने लगा। सरकारों ने उपभोक्ता महँगाई नियंत्रित रखने के लिए आयात शुल्क कम किए। इससे शहरी उपभोक्ताओं को सस्ता तेल मिला, लेकिन भारतीय तिलहन किसान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ गए।
धीरे-धीरे स्थानीय तेल मिलें बंद होने लगीं, पारंपरिक तिलहन खेती कम लाभकारी दिखाई देने लगी और किसान अन्य फसलों की ओर मुड़ने लगे। यह केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं था; इससे ग्रामीण उत्पादन संरचना भी प्रभावित हुई। गाँवों में जो छोटी तेल घानियाँ और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयाँ थीं, वे बाजार से बाहर होती गईं। भारत का खाद्य तेल क्षेत्र स्थानीय कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर आयात आधारित उपभोग व्यवस्था में बदलने लगा।
यहीं पर कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि अनुसंधान संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि भारत वास्तव में खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनना चाहता है, तो कृषि विश्वविद्यालयों को केवल शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादन मिशन के सक्रिय केंद्र के रूप में विकसित करना होगा।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों की मिट्टी, जलवायु और कृषि परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं। ऐसे में कृषि विश्वविद्यालय:
* क्षेत्रीय तिलहन किस्में विकसित कर सकते हैं,
* कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाले बीज तैयार कर सकते हैं,
* रोग प्रतिरोधी प्रजातियाँ विकसित कर सकते हैं,
* और किसानों को प्रत्यक्ष तकनीकी प्रशिक्षण दे सकते हैं।
हरित क्रांति के समय कृषि वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालयों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन समय के साथ अनेक संस्थानों का किसान और स्थानीय उत्पादन प्रणाली से सीधा संबंध कमजोर पड़ गया। यदि खाद्य तेल आत्मनिर्भरता को वास्तविक राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाना है, तो “लैब टू लैंड” मॉडल को पुनर्जीवित करना होगा।
विशेष रूप से:
* सरसों,
* तिल,
* अलसी,
* मूंगफली,
* सूरजमुखी,
* और पारंपरिक स्थानीय तिलहन
पर क्षेत्रीय अनुसंधान बढ़ाना होगा।
साथ ही विश्वविद्यालयों को केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर:
* तेल प्रसंस्करण,
* ग्रामीण लघु उद्योग,
* मूल्य संवर्धन,
* सहकारी मॉडल,
* और स्थानीय ब्रांड निर्माण
पर भी कार्य करना होगा।
भारत की खाद्य तेल समस्या केवल कृषि समस्या नहीं है; यह विकास मॉडल की भी परीक्षा है। आत्मनिर्भरता केवल उत्पादन का आँकड़ा नहीं होती। वह स्थानीय अर्थव्यवस्था, किसान सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता का प्रश्न भी होती है।
प्रधानमंत्री की “कम तेल उपयोग” की अपील स्वास्थ्य और संकट प्रबंधन की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है, लेकिन स्थायी समाधान तभी निकलेगा जब भारत उत्पादन, अनुसंधान, किसान नीति और स्थानीय उद्योगों के पुनर्निर्माण पर गंभीरता से कार्य करेगा।
यदि भारत वास्तव में आत्मनिर्भर बनना चाहता है, तो उसे केवल विदेशी आयात पर निर्भर उपभोग अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर उत्पादन आधारित ग्रामीण पुनर्निर्माण की दिशा में सोचना होगा। तभी “पीली क्रांति” इतिहास का अध्याय भर नहीं, बल्कि भविष्य की राष्ट्रीय नीति बन सकेगी।
डॉ. रजनीश कुमार, बी.आर.डी.पीजी. कालेज, देवरिया में कृषि संकाय के प्रोफेसर हैं। आपके कई शोधपत्र राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हैं।
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