Book Review
Date : 12 January 2026
Reviewer :डॉ.दुष्यंत कुमार शाह*
Title : अटारी पर चाँद
Author : डॉ.रति सक्सेना
Publisher : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली
Year : 2022
Price : ₹175
ISBN : 978-93-95234-71-9
समकालीन हिन्दी साहित्य में यात्रा-वृत्तांत केवल भौगोलिक विवरण नहीं रह गया है; वह मनुष्य, स्मृति, संस्कृति और आत्म-अन्वेषण का दस्तावेज बन चुका है। रति सक्सेना की यात्रिकी ‘अटारी पर चाँद’ इसी परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण कृति है, जो यात्रा को बाहरी दृश्य से आगे ले जाकर आंतरिक संवेदना और वैचारिक अनुभव में रूपांतरित करती है।
पुस्तक के प्रारम्भ में डॉ. नीरज दइया ने ठीक ही लिखा है कि यह कृति “रचनात्मकता, जीवनानुभवों की विवेकपूर्ण दृष्टि और नवीनता” से सम्पन्न है। यह टिप्पणी पुस्तक के मूल स्वर को पहचानती है। ‘अटारी पर चाँद’ में यात्रा केवल शहरों, संग्रहालयों और यूरोपीय गलियों का विवरण नहीं है, बल्कि मनुष्य की स्मृतियों, स्त्री-अनुभवों, युद्ध-बोध, कला-संवेदना और सांस्कृतिक संवाद की यात्रा है।
रति सक्सेना का लेखन आत्मीय और संवादधर्मी है। वे किसी पर्यटक की तरह नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवयित्री की तरह संसार को देखती हैं। यही कारण है कि पुस्तक के शीर्षक से लेकर अध्यायों तक एक काव्यात्मक लय उपस्थित रहती है—“लहराती झील के सामने विला वालदेवता”, “युद्ध की कथा, युद्ध की व्यथा”, “मेरी दीवारों पर टंगे शब्द”, “गुलाबों की भाषा”, “चाँद मेरी अटारी पर” आदि शीर्षक पाठक को पहले ही संकेत दे देते हैं कि यहाँ यात्रा के साथ कल्पना और अनुभूति का भी संसार खुलने वाला है।
इस यात्रिकी की एक बड़ी विशेषता उसका स्त्री-दृष्टिकोण है। लेखिका यूरोप के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को देखते हुए बार-बार स्त्री की स्वतंत्रता, उसकी रचनात्मक उपस्थिति और उसके सामाजिक स्थान पर विचार करती हैं। “शुभ्र के बहाने स्त्री स्वतंत्र्य” और “कविता के बहाने स्त्री स्वतंत्र्य” जैसे अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि लेखिका के लिए यात्रा केवल दृश्यावलोकन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं का आलोचनात्मक परीक्षण भी है।
पुस्तक में युद्ध और आधुनिक सभ्यता के अंतर्विरोधों पर भी गहरी संवेदना व्यक्त हुई है। “युद्ध की कथा, युद्ध की व्यथा” जैसे प्रसंगों में यूरोप के इतिहास की त्रासदी और मनुष्य की असुरक्षा का बोध उभरता है। यहाँ लेखिका किसी इतिहासकार की तरह तथ्य नहीं गिनातीं, बल्कि मानवीय पीड़ा के भीतर उतरकर सभ्यता के हिंसक चेहरे को पहचानती हैं।
रति सक्सेना की भाषा इस कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। उनकी भाषा में कविता का स्पर्श है, पर वह कृत्रिम नहीं लगती। उदाहरण के लिए—
“किसी ट्राम में बैठ, उसके आखिरी स्टेशन तक चलने का मन बनाना है
फिर आखिरी से एक स्टेशन पहले उतर कर
हवा को घूँट-घूँट पीते हुए
किसी गलत बस को पकड़
शहर का चक्कर लगाते हुए
लौट आना है।”
यह अंश केवल यात्रा का दृश्य नहीं रचता, बल्कि आधुनिक मनुष्य की उस बेचैनी को व्यक्त करता है जो नियोजित जीवन से बाहर निकलकर अनिश्चितताओं में अर्थ खोजती है। यहाँ “गलत बस” पकड़ना दरअसल जीवन के अप्रत्याशित अनुभवों को स्वीकार करना है।
पुस्तक में कला, संग्रहालयों और यूरोपीय सांस्कृतिक विरासत के अनेक संदर्भ आते हैं—जैसे Pinakothek der Moderne अथवा Andechs Abbey। परंतु लेखिका इन स्थानों को केवल पर्यटन-स्थल के रूप में नहीं देखतीं; वे उनके भीतर छिपी सांस्कृतिक स्मृतियों, सौंदर्यबोध और इतिहास की परतों को पढ़ती हैं। इसीलिए यह यात्रिकी एक सांस्कृतिक पाठ की तरह भी पढ़ी जा सकती है।
‘अटारी पर चाँद’ की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी आत्मीयता है। पाठक को ऐसा नहीं लगता कि वह किसी दूर देश का विवरण पढ़ रहा है; बल्कि वह स्वयं लेखिका के साथ यात्रा करने लगता है। डॉ. नीरज दइया की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि पाठक “बीच में छोड़ नहीं सकता”, क्योंकि कृति में “अंतरंगता” का भाव है। सचमुच, यह पुस्तक पाठक को सहयात्री बना लेती है।
हालाँकि कहीं-कहीं अत्यधिक भावुकता और प्रतीकात्मकता सामान्य पाठक के लिए अर्थ-ग्रहण को थोड़ा कठिन बना देती है, फिर भी यही उसकी साहित्यिक विशेषता भी है। यह पुस्तक तात्कालिक सूचना नहीं देती, बल्कि पाठक को सोचने, महसूस करने और स्मृतियों में उतरने के लिए प्रेरित करती है।
समग्रतः ‘अटारी पर चाँद’ हिन्दी यात्रिकी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसमें कविता, संस्कृति, स्त्री-दृष्टि, इतिहास और आत्म-अन्वेषण का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। रति सक्सेना ने यात्रा को बाहरी दूरी तय करने की क्रिया से आगे बढ़ाकर आत्मा की यात्रा बना दिया है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो यात्रा-वृत्तांत में केवल स्थानों का विवरण नहीं, बल्कि संवेदना, विचार और जीवन-दृष्टि की तलाश करते हैं।
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