A. R. Desai’s Perspective on Indian Nationalism: A Sociological Analysis
Abstract
A. R. Desai, in his 1948 published book Social Background of Indian Nationalism, analyzed the emergence of new social forces that began transforming India’s economy and society within a colonial framework after independence. According to him, the kind of state that developed in post-independence India was essentially capitalist in nature. In practical terms, the privileges and rights enjoyed by the capitalist class within the contemporary state structure could not be equally accessed by the exploited sections of society.
Further, in his 1984 work India's Path of Development, he also pointed out how the bourgeois or capitalist class associated with foreign imperialism was increasingly strengthening its control over the Indian economy. These are some of the conditions that are essential for understanding the contemporary state of Indian nationalism.
सारांश
ए. आर. देसाई ने सन् 1948 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ’भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’’ (Social Background of Indian Nationalism) में उन नई सामाजिक शक्तियों के प्रादुर्भाव का भी विश्लेषण किया जिन्होंने स्वतन्त्रता के बाद यहां की अर्थव्यवस्था तथा समाज को उपनिवेशवादी परिप्रेक्ष्य में बदलना आरम्भ किया। स्वतन्त्रता के बाद यहां जिस तरह के राज्य का विकास हुआ वह एक पूंजीवादी राज्य है। व्यावहारिक रूप से वर्तमान राज्य व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग को जो सुविधाएं और अधिकार प्राप्त हो रहे हैं, वे समाज के शोषित वर्ग को प्राप्त नहीं हो सके। पुनः सन् 1984 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘भारत के विकास का मार्ग’ (India's path of Development ) में उन्होंने इस तथ्य का भी उल्लेख किया कि आज किस प्रकार विदेशी साम्राज्यवाद से सम्बन्धित बुर्जुआ अथवा पूंजीपति वर्ग का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण बढ़ता जा रहा है। यह कुछ ऐसी दशाएं हैं, जो भारतीय राष्ट्रवाद की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए आवश्यक है।
प्रस्तावना
प्रोफेसर देसाई द्वारा लिखित पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’ वह महत्वपूर्ण प्रयास है जिसमें उन्होंने मार्क्सवादी बौद्धिक उपागम के आधार पर समाजशास्त्र तथा इतिहास को मिलाते हुए यह स्पष्ट किया कि भारत में राष्ट्रवाद का सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में उत्पादन के सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तन से रहा है। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को एक-दूसरे से भिन्न शक्तियों के द्वन्द्व के परिणाम के रूप में स्पष्ट किया। इसका तात्पर्य है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन के अन्तर्गत यहां जो नई भौतिक दशाएं पैदा हुईं, उन्हीं के फलस्वरूप राष्ट्रवाद का प्रादुर्भाव हुआ। ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत औद्योगीकरण तथा आधुनिकीकरण के द्वारा जिन नए आर्थिक सम्बन्धों की स्थापना हुई, उनके फलस्वरूप भारत की परम्परागत संस्थाओं में परिवर्तन होना आरम्भ हुआ।
देसाई द्वारा लिखित उपर्युक्त पुस्तक 19 अध्यायों में विभाजित है। अपने ‘प्राक्कथन’ में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यूरोप के अनेक दूसरे देशों में किस प्रकार राष्ट्रवाद का विकास हुआ। पुस्तक के पहले अध्याय में देसाई ने भारत में इंग्लैण्ड का उपनिवेशवादी शासन आरम्भ होने से पहले यहां की अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति की प्रकृति को स्पष्ट किया। दूसरे अध्याय में उन दशाओं का उल्लेख किया जिनके अन्तर्गत भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन स्थापित हुआ तथा इसके प्रभाव से धीरे-धीरे एक नई आर्थिक और राजनीतिक संरचना विकसित होने लगी।
अध्याय 3, 4, 5, 6 तथा 7 में ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीय कृषि व्यवस्था में होने वाले परिवर्तनों, परम्परागत हस्तशिल्प का पतन, नगरों तथा ग्रामीण कुटीर उद्योगों का विघटन तथा आधुनिक उद्योगों का विकास जैसी दशाओं की विवेचना की गई। अध्याय 8, 9 तथा 10 में परिवहन के साधनों के विकास, नई शिक्षा व्यवस्था की स्थापना तथा भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण की विवेचना के साथ भारतीय समाज पर इनके प्रभावों का विश्लेषण किया गया।
इन दशाओं के प्रभाव से अध्याय 11 में नए सामाजिक वर्गों के प्रादुर्भाव, अध्याय 12 के अन्तर्गत आधुनिक राष्ट्रवाद में प्रेस की भूमिका, अध्याय 13 में यहां समाज-सुधार आन्दोलन का सूत्रपात तथा अध्याय 14, 15 व 16 में परम्परागत जाति विभाजन, अस्पृश्यता तथा स्त्रियों की प्रस्थिति जैसी समस्याओं के विरुद्ध होने वाले आन्दोलन की विस्तार से विवेचना की गई है। अध्याय 17 में देसाई ने भारत में होने वाले धार्मिक सुधार आन्दोलनों की चर्चा की। पुस्तक में अध्याय 18 वह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसमें देसाई ने भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति के रूप में एक व्यापक राजनीतिक आन्दोलन के प्रभाव की चर्चा की। अन्तिम अध्याय में अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बन्धित कुछ आन्दोलनों को स्पष्ट करते हुए देसाई ने भारतीय राष्ट्रवाद के विकास पर इनके प्रभावों का उल्लेख किया।
प्रस्तुत विवेचन में सबसे पहले देसाई के विचारों के सम्बन्ध में राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद के अर्थ को स्पष्ट किया जाएगा।
राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद का अर्थ
वर्तमान समाजशास्त्रीय अध्ययनों में भारतीय राष्ट्रवाद का एक प्रमुख स्थान है। ए. आर. देसाई के शब्दों में “भारत में विकसित होने वाले विभिन्न राजनीतिक और राष्ट्रीय आन्दोलनों को समझना इस कारण आवश्यक है कि इन्हीं की सहायता से ब्रिटिश काल तथा उसके बाद भारतीय समाज में होने वाले संरचनात्मक परिवर्तनों तथा उन नयी सामाजिक शक्तियों को समझा जा सकता है जिन्होंने भारतीय समाज को नया रूप दिया।”
राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए देसाई ने प्रोफेसर कार तथा प्रोफेसर जी. एस. घुरये के विचारों का उल्लेख किया। कार के अनुसार राष्ट्र का सम्बन्ध एक विशेष भावनात्मक और मानसिक एकता से है। यह अनुभव करने, विचार करने और जीवन व्यतीत करने का एक विशेष ढंग है। इस अर्थ में राष्ट्र की प्रकृति को इसकी छह मुख्य विशेषताओं के आधार पर समझा जा सकता है—
- एक सामान्य सरकार का विचार जिसका सम्बन्ध वर्तमान और भविष्य की प्रत्याशाओं से हो,
- व्यक्तियों के बीच पारस्परिक सम्बन्ध तथा जागरूकता,
- एक सुस्पष्ट भू-भाग,
- भाषा एवं संस्कृति जैसी विशिष्ट विशेषताएं,
- सामान्य हितों में सहभागिता,
- राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना।
राष्ट्रवाद के अर्थ को स्पष्ट करते हुए जी. एस. घुरये ने लिखा है— “राष्ट्रवाद एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दशा है जिसमें एकता, सुदृढ़ता और पारस्परिक सम्बद्धता का समावेश होता है।”
देसाई के अनुसार राष्ट्रवाद का सम्बन्ध राष्ट्र की सर्वोच्चता में विश्वास करने से है। इसका तात्पर्य यह है कि जाति, धर्म, भाषा अथवा क्षेत्र की तुलना में राष्ट्र को अधिक महत्व दिया जाता है। राष्ट्रवाद के विकास के लिए एक ऐसी सरकार आवश्यक है जो अपने देश के निवासियों के हित में निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र हो। भाषायी एकता, राष्ट्रीय संस्कृति तथा राष्ट्रीय इतिहास भी राष्ट्रवाद के प्रमुख आधार हैं।
राष्ट्रवाद का भारतीय परिप्रेक्ष्य
जहाँ तक भारत का प्रश्न है, यहाँ राष्ट्रवाद का इतिहास अधिक पुराना नहीं है। भारत में राष्ट्रवाद का आरम्भ इंग्लैण्ड के उपनिवेशवादी शासन के दौरान हुआ। ब्रिटिश शासन से पहले भारत में एक ऐसी राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना स्थापित थी जो विश्व के दूसरे देशों से काफी भिन्न थी।
सामाजिक आधार पर सम्पूर्ण देश हजारों जातियों और उपजातियों में विभाजित था। धार्मिक आधार पर हिन्दू धर्म अनेक सम्प्रदायों और विश्वासों में विभक्त था। राजनीतिक दृष्टि से भारत छोटे-बड़े साम्राज्यों तथा नगर-राज्यों में विभाजित रहा।
ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक संरचना में व्यापक परिवर्तन किए। इसके फलस्वरूप नए सामाजिक-आर्थिक वर्गों का निर्माण हुआ तथा अनेक ऐसी सामाजिक शक्तियाँ विकसित हुईं जिन्होंने लोगों के चिन्तन और व्यवहार को नई दिशा प्रदान की। स्पष्ट है कि भारत में राष्ट्रवाद का उदय और विकास एक विशेष आर्थिक तथा राजनीतिक पृष्ठभूमि में हुआ।
भारतीय राष्ट्रवाद की मुख्य अवस्थाएँ
(1) प्रथम अवस्था (1857-1885)
भारतीय राष्ट्रवाद की प्रथम अवस्था में आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से एक बौद्धिक वर्ग विकसित हुआ जिसने सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों का नेतृत्व किया। इसी समय ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन तथा सत्यशोधक समाज जैसे सुधार आन्दोलन प्रारम्भ हुए।
राजा राममोहन राय ने सती प्रथा, बाल विवाह तथा स्त्री शोषण का विरोध किया। महादेव गोविन्द रानाडे ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया। स्वामी दयानन्द ने वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना के माध्यम से जातिगत भेदभावों को समाप्त करने पर बल दिया। स्वामी विवेकानन्द ने मानव सेवा को राष्ट्र सेवा का रूप प्रदान किया।
देसाई के अनुसार ये आन्दोलन भारत में बढ़ती हुई राष्ट्रीय एवं लोकतान्त्रिक चेतना की अभिव्यक्ति थे।
(2) दूसरी अवस्था (1885-1905)
भारतीय राष्ट्रवाद के दूसरे चरण का आरम्भ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के साथ हुआ। इस काल को उदार राष्ट्रवाद की अवस्था कहा जाता है। इस समय कांग्रेस के नेता ब्रिटिश शासन में सुधार लाकर भारतीय समाज के विकास की बात कर रहे थे।
किन्तु बंगाल विभाजन, अकाल, प्लेग तथा आर्थिक शोषण के कारण उग्र राष्ट्रवादियों का उदय हुआ। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा बिपिन चन्द्र पाल जैसे नेताओं ने स्वदेशी आन्दोलन तथा बहिष्कार आन्दोलन को व्यापक रूप दिया।
(3) तीसरी अवस्था (1905-1918)
इस चरण में उग्र राष्ट्रवादियों का प्रभाव बढ़ा। राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु जनसंघर्ष को आवश्यक माना गया। इसी समय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई तथा अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई।
क्रान्तिकारी गतिविधियों तथा स्वराज आन्दोलन ने जनसाधारण में राजनीतिक चेतना का विस्तार किया।
(4) चौथी अवस्था (1918-1934)
इस चरण को गांधी युग कहा जाता है। महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन के माध्यम से भारतीय राष्ट्रवाद को जनआन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया।
रौलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड तथा साइमन कमीशन के विरोध ने राष्ट्रवादी चेतना को तीव्र बनाया। डांडी यात्रा तथा नमक सत्याग्रह ने राष्ट्रीय आन्दोलन को व्यापक जनसमर्थन प्रदान किया।
इसी काल में समाजवादी तथा साम्यवादी विचारधाराओं का भी प्रसार हुआ तथा मजदूरों एवं किसानों के संगठन राष्ट्रवादी आन्दोलन से जुड़ने लगे।
(5) पाँचवीं अवस्था (1934-1939)
इस चरण में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी तथा फॉरवर्ड ब्लॉक जैसे संगठनों का उदय हुआ। किसान आन्दोलन, मजदूर आन्दोलन तथा भाषायी प्रान्तों की मांगों ने राष्ट्रवादी आन्दोलन को नई दिशा दी।
देसाई के अनुसार इस काल में भारतीय राष्ट्रवाद पर पूंजीपति वर्ग का प्रभाव बढ़ने लगा, किन्तु साथ ही वामपंथी शक्तियों ने भी कांग्रेस की नीतियों को प्रभावित करना आरम्भ कर दिया।
निष्कर्ष
ए. आर. देसाई ने भारतीय राष्ट्रवाद को केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक प्रक्रिया न मानकर उसे आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तनों का परिणाम बताया। उनके अनुसार भारतीय राष्ट्रवाद का विकास ब्रिटिश उपनिवेशवाद द्वारा उत्पन्न नई आर्थिक संरचनाओं, वर्ग सम्बन्धों तथा सामाजिक शक्तियों के प्रभाव में हुआ।
देसाई का विश्लेषण भारतीय राष्ट्रवाद को समझने के लिए एक समाजशास्त्रीय तथा मार्क्सवादी दृष्टिकोण प्रदान करता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता का आन्दोलन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन, वर्ग संघर्ष तथा आधुनिक चेतना के विकास की प्रक्रिया भी था।
संदर्भ सूची
- देसाई, ए. आर. (2000), भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि, मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, दरियागंज, नई दिल्ली, पृ. सं. 29।
- पूर्वोक्त, पृ. सं. 32।
- Carr, E.H. (1961), What is History?, Cambridge University Press & Penguin Books, p. 20.
- देसाई, ए. आर. (2000), पूर्वोक्त, पृ. सं. 353-482।
अन्य संदर्भ ग्रन्थ
- Anderson, Benedict (1991), Imagined Communities: Reflections on the Origin and Spread of Nationalism, London: Verso.
- Brass, Paul R. (1991), Ethnicity and Nationalism: Theory and Comparison, New Delhi: Sage Publications.
- Chatterjee, Partha (1993), The Nation and Its Fragments: Colonial and Postcolonial Histories, New Jersey: Princeton University Press.
- Gellner, Ernest (1983), Nations and Nationalism, Ithaca and London: Cornell University Press.
- Stalin, Joseph (1991), Marxism and the National and Colonial Question, New Delhi: Kanisk Publishing House.
- Omvedt, Gail (1994), “Reconstructing the Methodology of Exploitation: Caste, Class and Gender as Categories of Analysis in Post-Colonial Societies”, in Nira Chandhoke (Ed.), Understanding the Post-Colonial World: Theory and Method, New Delhi: Sterling Publications.
0 Comments