Development or Displacement: The Hidden Cost of India’s Growth
The editorial examines the historical evolution of land ownership and revenue systems in India, beginning with reforms introduced by Sher Shah Suri and later institutionalized under British colonial rule. These systems focused mainly on agricultural land, leaving forested and tribal regions outside formal state control for a long time.
However, during the colonial period, the entry of moneylenders, contractors, and British authorities into tribal areas disrupted this balance. Forest laws and land control policies gradually displaced Adivasi communities, leading to resistance movements centered on identity and survival.
Post-independence, India attempted to address these injustices through constitutional safeguards like the Sixth Schedule. In practice, however, rapid industrialization has often bypassed these protections, leading to large-scale displacement in regions like Hasdeo Arand and Rourkela.
भारत में भूमि स्वामित्व और राजस्व व्यवस्था का इतिहास केवल प्रशासनिक सुधारों की कहानी नहीं है; यह सत्ता, संसाधन और समाज के संबंधों की गहरी परतों को उजागर करता है। 16वीं सदी में शेरशाह सूरी द्वारा शुरू की गई भूमि पैमाइश और राजस्व प्रणाली ने पहली बार कृषि भूमि को राज्य की निगरानी में लाकर किसान को कराधान की इकाई बना दिया। यह व्यवस्था बाद में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन में और अधिक कठोर तथा संरचित हुई, जहाँ जमींदारों और कलेक्टरों के माध्यम से राजस्व वसूली को संस्थागत रूप दिया गया।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का एक मौन पक्ष भी था—वन, पहाड़ और वहाँ रहने वाले आदिवासी समुदाय। शेर शाह और अंग्रेजों दोनों की भूमि सर्वेक्षण प्रक्रिया मुख्यतः उपजाऊ कृषि भूमि तक सीमित रही, जिससे आदिवासी क्षेत्रों को लंबे समय तक “राज्य की औपचारिक अर्थव्यवस्था” से बाहर रखा गया। यह बहिष्करण आदिवासियों के लिए स्वतंत्रता का क्षेत्र भी था और उपेक्षा का भी। वे प्रकृति के साथ सहजीवी संबंध में जीते रहे—नदी, जंगल और पहाड़ उनके लिए संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार थे। औपनिवेशिक काल में यह संतुलन टूटने लगा। साहूकारों, ठेकेदारों और ब्रिटिश अधिकारियों का प्रवेश आदिवासी क्षेत्रों में हुआ। जंगलों पर राज्य का दावा स्थापित हुआ और धीरे-धीरे आदिवासियों का अपने ही भूभाग पर अधिकार कमजोर पड़ने लगा। इसके प्रतिरोध में अनेक जनांदोलन खड़े हुए—यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का था।
स्वतंत्र भारत ने इस ऐतिहासिक अन्याय को समझने का प्रयास किया। संविधान में Sixth Schedule of the Indian Constitution जैसे प्रावधान लाए गए, जिनका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता और उनकी भूमि पर अधिकार सुनिश्चित करना था। सिद्धांततः यह व्यवस्था कहती है कि बिना स्थानीय समुदाय की सहमति के उनकी भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता।
परंतु वास्तविकता इससे भिन्न है। औद्योगिकीकरण और तथाकथित “विकास” की दौड़ में इन संवैधानिक प्रावधानों को अक्सर दरकिनार किया गया है। खनन, बाँध, उद्योग और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के नाम पर आदिवासी समुदायों को उनके पारंपरिक निवास स्थानों से विस्थापित किया जा रहा है। हसदेव अरण्य,राऊरकेला,भोपाल,अंडमान निकोबार जैसे क्षेत्रों में चल रहे आंदोलन इस बात के साक्षी हैं कि विकास का मॉडल व्यापक असंतोष को जन्म दे रहा है।
यह विडंबना ही है कि जिन समुदायों के पास कभी प्रकृति की अपार संपदा थी, वे आज देश के सबसे गरीब और हाशिए पर खड़े समूहों में गिने जाते हैं। विकास की वर्तमान धारा में उनकी भूमिका “बलिदान” की हो गई है—एक ऐसा बलिदान जिसे न तो पूरी तरह स्वीकार किया गया है और न ही न्यायपूर्ण ढंग से प्रतिपूरित। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि किस प्रकार का विकास? यदि विकास का अर्थ केवल इमारतें, सड़कें और उद्योग हैं, और उसकी कीमत पर जंगल, नदियाँ और समुदाय नष्ट हो रहे हैं, तो यह एक अल्पकालिक दृष्टि है। पर्यावरणीय संतुलन के बिना कोई भी आर्थिक प्रगति टिकाऊ नहीं हो सकती। आज जब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण और प्राकृतिक संसाधनों का संकट वैश्विक चिंताओं के केंद्र में हैं, तब आदिवासी जीवन पद्धति हमें एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान करती है—प्रकृति के साथ संतुलन का। यह दृष्टि केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और टिकाऊ भी है।
यदि भारत को वास्तव में “विकसित” राष्ट्र बनना है, तो उसे विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। आदिवासी समुदायों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भागीदार बनाना होगा। उनकी सहमति, उनके ज्ञान और उनके अधिकारों को केंद्र में रखे बिना कोई भी विकास अंततः विनाश की ओर ले जाएगा। अन्यथा, जिस “विकास की गंगा” पर आज गर्व किया जा रहा है, वही कल एक ऐसे बंजर भविष्य का कारण बन सकती है, जहाँ न जंगल बचेंगे, न नदियाँ—और न ही वह सामाजिक संतुलन, जो किसी भी राष्ट्र की असली ताकत होता है।
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