Eastern Scientist | News Analysis
पूर्वोत्तर भारत की नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं; वे हिमालयी पारिस्थितिकी, जनजातीय संस्कृति, जैव-विविधता और क्षेत्रीय संतुलन की जीवित संरचनाएँ हैं। अरुणाचल प्रदेश की लोहित नदी पर प्रस्तावित 1,200 मेगावाट की कलाई-II जलविद्युत परियोजना इसी व्यापक संकट का प्रतीक बनती जा रही है, जहाँ “रणनीतिक विकास” और “पारिस्थितिक अस्तित्व” आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। चीन सीमा से सटे इस संवेदनशील क्षेत्र में ऊर्जा और सामरिक आधारभूत संरचना को मजबूत करने के नाम पर जिस परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है, वही परियोजना विश्व के सबसे दुर्लभ पक्षियों में गिने जाने वाले ‘ह्वाइट-बेलीड हेरॉन’ के अंतिम सुरक्षित आवास को समाप्त करने की ओर अग्रसर है।
टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड द्वारा 869.35 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन का प्रस्ताव भारतीय पर्यावरणीय शासन प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। स्वतंत्र पक्षी वैज्ञानिकों, क्षेत्रीय अध्ययनों और स्वयं अरुणाचल वन विभाग के पुराने दस्तावेजों में जिस क्षेत्र को ‘ह्वाइट-बेलीड हेरॉन’ का सक्रिय आवास बताया गया है, उसी क्षेत्र के संबंध में हालिया आधिकारिक निरीक्षण रिपोर्ट यह दावा करती है कि वहाँ कोई दुर्लभ या संकटग्रस्त जीव मौजूद नहीं है। यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक विसंगति नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल की मानसिकता को उजागर करता है जिसमें पर्यावरणीय वास्तविकताओं को परियोजनाओं की स्वीकृति के अनुरूप ढाला जाता है।
ह्वाइट-बेलीड हेरॉन केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हिमालयी नदी तंत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता का सूचक है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल यह प्रजाति बाघों और गैंडों के समान सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त करती है। इसकी उपस्थिति स्वच्छ, कम हस्तक्षेप वाली नदी प्रणालियों पर निर्भर करती है। लोहित नदी के प्रवाह, तटीय वनस्पतियों और प्राकृतिक जलचक्र में किसी भी बड़े हस्तक्षेप का सीधा प्रभाव इस प्रजाति के अस्तित्व पर पड़ेगा।
परियोजना का एक और चिंताजनक पक्ष “क्षतिपूरक वृक्षारोपण” की नीति है। अरुणाचल प्रदेश के नम अर्ध-सदाबहार वनों की क्षति की भरपाई मध्य प्रदेश में वृक्षारोपण द्वारा करने का प्रस्ताव पर्यावरणीय विज्ञान की मूल अवधारणाओं के विपरीत प्रतीत होता है। पारिस्थितिकी केवल पेड़ों की संख्या का प्रश्न नहीं है; यह मिट्टी, जलवायु, सूक्ष्मजीवों, स्थानीय वनस्पतियों, वन्यजीवों और हजारों वर्षों में विकसित जैविक अंतःक्रियाओं का जटिल तंत्र है।
₹14,105.83 करोड़ की अनुमानित लागत वाली कलाई-II परियोजना तकनीकी रूप से “रन-ऑफ-द-रिवर” मॉडल पर आधारित बताई जाती है, किंतु वास्तविकता यह है कि ऐसे बाँध भी नदी के प्रवाह, तलछट, तापमान, मछलियों के प्रवास और नदी-आधारित जैविक तंत्र को गहराई से प्रभावित करते हैं। भूमिगत पावरहाउस, सुरंग आधारित जल प्रवाह और कंक्रीट संरचनाएँ मिलकर नदी को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र से ऊर्जा उत्पादन की मशीन में परिवर्तित कर देती हैं।
English Summary
Strategic Development vs. Endangered Ecology: The Crisis of Kalai-II Project and the Lohit River
The proposed 1,200 MW Kalai-II Hydroelectric Project in Arunachal Pradesh reflects a growing conflict between strategic infrastructure development and ecological survival in Northeast India. The project threatens the fragile habitat of the critically endangered White-Bellied Heron, a Schedule-I protected species under India’s Wildlife Protection Act.
Experts warn that unchecked infrastructure expansion in ecologically sensitive Himalayan river systems could permanently damage the biological identity of the region, turning rivers into industrial energy corridors while pushing rare species toward extinction.
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