विकास और नफरत के मरुस्थल में दम तोड़ती सभ्यताएं और विघटन का संकट

Editorial Analysis
Published: May 16, 2026 | Editor in Chief

Civilizations Gasping for Breath in the Desert of Development and Hatred, and the Crisis of Disintegration

This editorial argues that modern society is being systematically misled by a narrow discourse of 'Economic Progress' and 'Infrastructure Development,' while a deeper and more permanent crisis—National Disintegration—is being fueled by organized hate and forced displacement. The article suggests that 'development' projects are not merely about growth; they have become instruments of institutionalized exclusion, turning fertile tribal lands and vibrant urban settlements into "Sacrifice Zones.
The editorial explains how the violent uprooting of communities in Singrauli, Hasdeo Aranya, and Niyamgiri is destroying the very foundations of the social contract. It critiques the "Bulldozer Justice" seen in cities like Varanasi, Delhi, Mumbai, and Bhopal, where historical heritage and minority livelihoods are being dismantled under the guise of urbanization. In such conditions, 'nationalism' becomes a fragile construct because the state-corporate nexus has compromised the trust of the marginalized. A central theme of the piece is the intersection of Hate Politics and the Displacement Economy. It argues that ethnic conflicts, such as the humanitarian tragedy in Manipur, and the destruction of livelihoods in Assam’s Dolu Tea Estate, are not isolated incidents but part of an ecological and social erosion. While acknowledging the necessity of connectivity and energy, the editorial stresses that no infrastructure can sustain a nation if it is built upon the ashes of its own citizens' dignity and rights.
The article clarifies that it is not 'anti-development'; instead, it opposes an incomplete public discourse that isolates economic growth from human rights and constitutional morality. The "Eastern Scientist" asserts that nations are not merely maps but shared beliefs; when the 'last man' is pushed into a civilizational desert through institutionalized hate and displacement, the geographical integrity of the nation faces an inevitable threat of Balkanization.
Ultimately, the editorial calls for a new understanding of national security—one that treats Social Justice, Indigenous Rights, and Communal Harmony as the essential defenses against the looming crisis of national fragmentation.

समकालीन भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में 'विकास' और 'राष्ट्रवाद' के जिस नवीन विमर्श को स्थापित किया जा रहा है, उसने एक ऐसी भयावह परिस्थिति उत्पन्न कर दी है जहाँ हाशिए पर खड़े समुदायों का अस्तित्व ही दांव पर लग गया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की हालिया रिपोर्टों से यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि नफरत अब केवल भाषणों या छिटपुट घटनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने एक 'संस्थागत तंत्र' का स्वरूप ले लिया है। यह तंत्र अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और श्रमिकों को उनके भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश से योजनाबद्ध तरीके से बेदखल करने का माध्यम बन गया है, जो अंततः 'राष्ट्रीय विघटन' के गहरे संकट की ओर संकेत करता है।
इस संकट का सबसे क्रूर चेहरा भारत के खनिज और ऊर्जा बेल्ट में दिखाई देता है, जिसे 'सैक्रिफाइस ज़ोन्स' में बदला जा रहा है। 'ऊर्जा राजधानी' कहे जाने वाले सिंगरौली के आदिवासियों ने पिछले पांच दशकों में तीन से चार बार विस्थापन का दंश झेला है। रिहंद बांध से लेकर निजी ताप विद्युत संयंत्रों तक, दस हजार से अधिक परिवारों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल कर जहरीली राख के ढेरों के बीच जीने को मजबूर किया गया है। यहाँ के जल और वायु में घुला 'पारा' न केवल उनके शरीर को अपाहिज बना रहा है, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर 'पर्यावरणीय नस्लभेद' (Environmental Racism) के रूप में चिन्हित किया गया है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य और ओडिशा के नियमगिरि के जंगलों का हिंसक दोहन जारी है। नियमगिरि में डोंगरिया कोंध आदिवासियों के प्रतिरोध को कुचलने के लिए दो सौ से अधिक कार्यकर्ताओं की हालिया गिरफ्तारी राज्य और कॉरपोरेट के उस अपवित्र गठबंधन को उजागर करती है जो स्वदेशी अधिकारों को कुचलने पर आमादा है। केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण बुंदेलखंड के बाईस गाँवों की पैंतालीस से अधिक बस्तियाँ जलमग्न होने की कगार पर हैं, जिससे लगभग सात हजार परिवारों की सांस्कृतिक और भौतिक जड़ें कटने वाली हैं।
पूर्वोत्तर भारत और विशेषकर मणिपुर की त्रासदी इस संगठित दमन का एक और भयावह अध्याय है। मई 2023 से जारी जातीय हिंसा ने सरसठ हजार से अधिक लोगों को अपने ही राज्य में शरणार्थी बना दिया है। साढ़े चार हजार से अधिक घरों और साढ़े तीन सौ से अधिक पूजा स्थलों का विध्वंस केवल भौतिक क्षति नहीं, बल्कि दो समुदायों के बीच एक ऐसी अटल मनोवैज्ञानिक और भौगोलिक खाई का निर्माण है जो राष्ट्रीय एकता के लिए स्थायी खतरा बन चुकी है। इसी प्रकार, असम के डोलू चाय बागान में हवाई अड्डे हेतु तीस लाख चाय के पौधों को बुलडोजर से रौंदना आधुनिक भारत की सबसे बड़ी श्रम त्रासदी है, जिसने ढाई हजार श्रमिकों की पहचान को रातों-रात मिटा दिया। अरुणाचल के होलोन्गी जैसे सामरिक क्षेत्रों में 'कनेक्टिविटी' के नाम पर आदिवासियों की सामुदायिक ज़मीनों का बिना उचित मुआवज़ा अधिग्रहण इस संकट को और गहरा कर देता है।
नगरों की सीमा में 'अतिक्रमण' और 'सौंदर्यीकरण' के नाम पर जो 'बुलडोजर न्याय' फल-फूल रहा है, उसमें एक विशेष सामाजिक और राजनीतिक प्रतिमान स्पष्ट दिखाई देता है। वाराणसी में 'विरासत' के नाम पर तीन सौ से अधिक ऐतिहासिक भवनों को ढहाकर और गंगा-वरुणा तटों की पंद्रह से अधिक बस्तियों से पांच हजार नाविकों व बुनकरों को बेदखल कर शहर की साझा संस्कृति की जड़ों पर प्रहार किया गया है। मुंबई में कोस्टल रोड और धारावी पुनर्विकास के नाम पर पचास हजार परिवारों पर निर्वासन का खतरा मंडरा रहा है, तो वहीं भोपाल के टी.टी. नगर और भदभदा क्षेत्र में 'स्मार्ट सिटी' के नाम पर ढाई हजार से अधिक आवासों को जमींदोज कर गरीबों को शहर की मुख्यधारा से बाहर फेंक दिया गया है। दिल्ली में वर्ष 2025 के दौरान तीस हजार लोगों का बेघर होना और लखनऊ के अकबरनगर व हल्द्वानी के बनभूलपुरा में हजारों अल्पसंख्यक परिवारों के आशियाने उजाड़ना 'शहरी शरणार्थियों' की एक नई और शोषित श्रेणी पैदा कर रहा है। कोलकाता में चुनाव परिणामों के तुरंत बाद न्यू मार्केट और पार्क सर्कस क्षेत्रों में हुई बुलडोजर कार्रवाई ने यह प्रमाणित कर दिया है कि विस्थापन अब प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिशोध का एक घातक हथियार बन चुका है।
सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो वर्ष 2025 में हेट स्पीच की घटनाओं में संतानवे प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका सीधा प्रभाव जमीनी हिंसा और विस्थापन के रूप में परिलक्षित होता है। विरोध की आवाजों को दबाने के लिए देश भर में साढ़े तीन हजार से अधिक गिरफ्तारियाँ हुईं, जिनमें से चार सौ से अधिक लोगों पर यूएपीए जैसे कठोर कानूनों का प्रयोग किया गया। यह दमनकारी प्रतिमान स्पष्ट रूप से 'सामाजिक अनुबंध' के टूटने का संकेत है। जब राज्य का तंत्र एकपक्षीय और भेदभावपूर्ण प्रतीत होने लगता है, तो नागरिक का राष्ट्र-राज्य पर से विश्वास उठने लगता है। मणिपुर जैसे उदाहरण अन्य राज्यों में भी आंतरिक अलगाववाद और 'बाल्कनीकरण' की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं, जो राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा।
'ईस्टर्न साइंटिस्ट' का यह स्पष्ट और सुविचारित मत है कि राष्ट्र केवल सीमाओं और नक्शों से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के आपसी विश्वास और न्याय से बनता है। जिस विकास की नींव में मणिपुर की राख, सिंगरौली का जहर, हसदेव के कटे पेड़ और गरीबों के ढहे हुए घर हों, वह विकास नहीं वरन एक 'सभ्यतागत पतन' है। यदि आधुनिकता की इमारत मानवाधिकारों के कब्रिस्तान पर खड़ी होगी, तो वह टिकाऊ नहीं हो सकती। भारत को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए पुन: संवैधानिक नैतिकता और समावेशी न्याय के मार्ग पर लौटना होगा। यदि विकास 'अंतिम व्यक्ति' के आंसुओं पर खड़ा है, तो वह राष्ट्र को प्रगति की ओर नहीं, बल्कि एक अपरिहार्य विखंडन की ओर ले जाएगा।

Dr. R. Achal

डॉ. आर. अचल पुलस्तेय

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

Multidisciplinary scholar focusing on socio-economic transitions and geopolitical shifts in the Eastern hemisphere.

ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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