देवी कामाख्या-14: जादू-टोना, तंत्र और आदिम चेतना का संघर्ष

Culture | संस्कृति

Date : June 21, 2026   |   Author : डॉ. अचल पुलस्तेय

Goddess Kamakhya-14: A Source of Strength Rooted in Sorcery, Tantra, and Primal Consciousness

The Great Social Divide and Shabar Linguistics For centuries, the mainstream imagination has associated Assam and the Kamakhya Temple with sorcery, occultism, and Tiriya Raj (the legendary realm of women). This research-based narrative highlights a deep-seated historical contradiction: while elite Vedic and Vaishnavite upper-castes ostracized Kamakhya’s esoteric practices, the shrine served as a profound psychological and social anchor for marginalized, Dalit, and tribal communities across South Asia. Unlike Sanskritic traditions governed by strict priestly monopolies, Kamakhya’s spiritual lineage flourished through Shabar Mantras composed entirely in vernacular languages like Assamese, Bengali, Maithili, Bhojpuri, and Gondi, making spiritual empowerment accessible to all without ritualistic taboos. Goddess as a Weapon Against Dictatorial Power The core strength of Kamakhya’s folklore lies in its rebel subaltern icons who weaponized Tantra against feudal oppression and tyrannical rulers. Alongside the celebrated legend of Lona Chamari—who acquired mystical powers at Kamakhya to avenge her sexual abuse by a landlord—the text introduces the horrific regime of King Mahipati of Morang (Mithila). Mahipati derived sadistic pleasure from forcing venomous snakebites onto young virgins. His tyrannical ego was crushed by seven spiritually empowered sisters (Hiriya, Jiriya, Reshma, Kusma, Dauna, Taregana, and Phulwanti) who drew their strength from Kamakhya. Similarly, folk figures like Rahsu, Somaram, and Gangaram Audhar embraced this path to battle royal arrogance, while a Muslim Sufi saint named Ismail arrived at the hills and transformed into 'Ismail Jogi,' illustrating a remarkable syncretism transcending religious boundaries. The Perils of Commercialization and Cultural Assimilation The text notes that until recently, fear of the occult and misconceptions about tribal sacrifices kept mainland India away from Kamakhya. However, a sudden surge in market-driven and corporate religious tourism has broken old taboos but triggered a new crisis: Cultural Inclusion (Assimilation). As orthodox, vegetarian Brahmanical classes flock to the shrine, Puranic rituals are steadily overshadowing the indigenous, egalitarian Shabar roots. This unbridled commercial crowd now deeply threatens the fragile ecology of Assam and its indigenous tribal identity, turning a historic subaltern rebellion into a homogenized commodity. Key Ward- Goddess Kamakhya, Shabar Mantras, Ismail Jogi, Rahsu, Somaram,,Hirira, Jiria, Kamakhya Tantra History, Kamakhya Shabar Mantra King Mahipati and Seven Sisters,Lona Chamari Kamakhya Story, Vedic vs Shabar Tradition,Subaltern resistance in Kamarupa

Keywords:Kamrupa, Kamakhya, Khamrubu, Bodo-Kachari, Matriarchy, Cultural Geography, Ethnography, Tribal Democracy, Eastern Scientist.
कामाख्या देवी मंदिर- व भक्त

1 वैदिक वर्चस्व बनाम शोषित समाज की आदिम चेतना

सामान्य जनमानस में असम और देवी कामाख्या का नाम आते ही सबसे पहले जादू-टोना, तंत्र-मंत्र और 'तिरिया राज' की कौतुकभरी छवियाँ उभरती हैं। पूरे दक्षिण एशिया के लोक-मानस में झाड़-फूंक, लोक-चिकित्सा और ओझा-गुनी की पद्धतियों से जुड़े लोग कामाख्या को अपनी साधना और सिद्धि का सर्वोच्च केंद्र मानते रहे हैं।

2. अभिजात्य पूर्वाग्रह और लोक-आस्था का अंतर्विरोध

किंतु इस लोक-आस्था और अभिजात्य वैदिक समाज के बीच हमेशा एक गहरा वैचारिक और सामाजिक अंतर्विरोध रहा है। एक लंबे समय तक उत्तर भारतीय वैदिक और वैष्णव ब्राह्मण समाज में कामाख्या की तांत्रिक पूजा-पद्धति को हेय दृष्टि से देखा जाता था। पारंपरिक उत्तर भारतीय ब्राह्मण समाज न तो कामाख्या देवी को स्वीकार करता था और न ही यहाँ दर्शन के लिए जाता था, यहाँ तक कि जो ब्राह्मण कामाख्या या तांत्रिक अनुष्ठान करते थे, उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान नहीं मिलता था। इसके विपरीत, कथित पिछड़ी, दलित और आदिवासी जातियों के लिए कामाख्या की साधना एक बहुत बड़ा मानसिक और सामाजिक संबल थी। तंत्र की इस धारा ने सामाजिक ऊंच-नीच के बंधनों को पूरी तरह खारिज कर दिया, यही कारण है कि मिथिला, नेपाल, बंगाल, ओडिशा और असम के सभी जाति-कुलों में समान रूप से कामाख्या अनादि काल से उपास्य रही हैं।

3.शाबर मंत्र: भाषा का लोकतंत्रीकरण और कर्मकांडीय स्वतंत्रता

कामाख्या की इस लोक-चेतना का सबसे बड़ा प्रमाण यहाँ के मंत्रों की भाषा में छिपा है। जहाँ वैदिक अनुष्ठान पूरी तरह संस्कृत पर अपना एकाधिकार रखते थे, वहीं कामाख्या की तंत्र-साधना मुख्य रूप से लोक-भाषाओं में फली-फूली। कामाख्या से जुड़ी साधना और सिद्धि के अधिकांश मंत्र बोडो,कछारी, असमी, बंगाली, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, पंजाबी, सिंधी, तमिल,नेपाली,कन्नड़ और गोंडी जैसी लोक-भाषाओं में रचे गए, जबकि संस्कृत और शास्त्रीय तंत्र ग्रंथों में कामाख्या के मंत्र बहुत कम है। कामख्या के इन 'शाबर मंत्रों' की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें किसी प्रकार की धार्मिक,जातीय वर्जना नहीं है, न ही कठिन सुचिता वाले कर्मकांड हैं, बल्कि यहाँ साधना और सिद्धि को अत्यंत सहज और सर्वसुलभ माना गया है, जिसमें प्रकृति और मनुष्य का सीधा जुड़ाव है।

4.प्रतिशोध और न्याय की आदिम चेतना: लोक-कथाओं के विद्रोही चरित्र

इस परंपरा की लोक-कथाओं में जिन चरित्रों को सिद्ध या पूज्य माना गया, वे समाज के सबसे शोषित और वंचित तबके से आते थे। यह इस बात का प्रतीक है कि कामाख्या की शरण में जाकर हाशिए के लोगों ने व्यवस्था के खिलाफ अपनी शक्ति को अर्जित किया। इसका सबसे जीवंत उदाहरण 'लोना चमारी' की कथा है, जो वर्तमान पंजाब (पाकिस्तान) के एक गाँव में जनमती है और वहाँ के जमींदार परिवार द्वारा किए गए बलात्कार का प्रतिशोध लेने के लिए कामरूप-कामाख्या आती है। यहाँ 'मारण मंत्र' और तंत्र की सिद्धि प्राप्त कर वह अपने गाँव लौटती है और अत्याचारी जमींदार परिवार का अंत कर पूरे देश के लोक-मानस में पूज्य हो जाती है। इसी सामंती और क्रूर दमन के खिलाफ लड़ाई का एक और खौफनाक ऐतिहासिक संदर्भ मोरंग देश (मिथिला) के राजा महिपति का मिलता है। राजा महिपति अत्यंत क्रूर था, जो कुँवारी कन्याओं के स्तनों पर जहरीले साँपों से डंक (सर्पदंश) करवा कर विकृत आनंद उठाता था। सत्ता के इस वीभत्स अहंकार का अंत करने के लिए कामाख्या से सिद्धि प्राप्त सात बहनें—हिरिया, जिरिया, रेशमा, कुसमा, दौना, तरेगना और फूलवंती—आगे आती हैं और अपनी आत्मिक व तांत्रिक शक्ति से उस क्रूर राजा का अंत करती हैं। इसी तरह रहसु, सोमाराम और गंगाराम औधड़ जैसे लोक-चरित्र भी राजा के दंभ को कुचलने के लिए ही कामाख्या की साधना का मार्ग चुनते हैं। यहाँ तक कि इस्माइल नामक एक सूफी संत भी इस आदिम शक्ति की ओर आकर्षित होकर यहाँ आते हैं और 'इस्माइल जोगी' बनकर कामाख्या के अनन्य उपासक बन जाते हैं। ये सभी लोक-पूज्य चरित्र किसी शास्त्रीय कर्मकांड के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये सत्ता के खिलाफ आम जनता की विद्रोही, न्यायप्रिय और समतावादी चेतना के जीवंत प्रतीक बनकर उभरते हैं।

5.भ्रांतियों का जाल और नाथ संप्रदाय का प्रभाव

विडंबना देखिए कि आज से लगभग 5 वर्ष पहले तक नेपाल, मिथिला, बंगाल और असम को छोड़कर शेष भारत के लोग कामाख्या जाने से कतराते थे। उस समय तक आम धारणा थी कि कामरूप जाने पर कोई जादू-टोना या टोटका कर देगा, और वहाँ की भैंसे-बकरे आदि की बलि प्रथा को देखकर बाहरी समाज में 'नर-बलि' जैसी भ्रामक कहानियाँ भी प्रचारित थीं। इस भय के पीछे सिद्ध संप्रदाय की वह कथा भी जिम्मेदार रही है, जिसमें गुरु मच्छेन्दरनाथ साधना के लिए कामरूप आते हैं और वहाँ के 'तिरिया राज' (स्त्री प्रधान समाज) के आकर्षण में फंसकर वहीं रह जाते हैं। बाद में उनके शिष्य गोरखनाथ कामरूप आकर उन्हें मुक्त कराते हैं और इसके बाद नाथ संप्रदाय ने स्त्रियों के प्रवेश को वर्जित कर 'हठयोग' को प्रचलित किया, जिसने धीरे-धीरे मच्छेन्दरनाथ की सहज गृहस्थ लोक-परंपरा को आम लोगों से दूर कर दिया।

6. बाजारवाद का उभार और 'सांस्कृतिक अंतर्भुक्ति' का नया संकट

किंतु हाल के वर्षों में, विशेषकर वर्ष 2023 के बाद से, कामाख्या को लेकर एक बड़ा बाजारवादी और कॉरपोरेट प्रचार शुरू हुआ है, जिसने पुरानी भ्रांतियों को तो तोड़ दिया है, लेकिन लोक-परंपरा के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। अब उत्तर भारत सहित पूरे देश के वैदिक, वैष्णव और ब्राह्मण समाज के लोग बड़ी संख्या में कामाख्या पहुँच रहे हैं, जिससे शाबर परंपरा पर वैदिक-पौराणिक वर्चस्व प्रभावी दिखने लगा है। इस नए जुड़ाव के बावजूद एक आंतरिक दूरी आज भी बनी हुई है; चूँकि कामाख्या की मूल पूजा आज भी अपनी आदिम बलि-परंपरा को संजोए हुए है, इसलिए शाकाहारी वैदिक और वैष्णव समाज इसके मूल चरित्र से पूरी तरह नहीं जुड़ पाता। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस अनियंत्रित बाजारवादी भीड़ और व्यावसायिक धार्मिक पर्यटन के कारण असम की संवेदनशील प्रकृति, पर्यावरण और मूल आदिम संस्कृति गहरे खतरे में पड़ गई है। इस प्रकार, सदियों पुराना जो वैधानिक और सामाजिक 'अंतर्विरोध' था—जहाँ एक तरफ वैदिक सम्भ्रांत समाज था और दूसरी तरफ तंत्र की लोक-धारा थी—वह आज आधुनिक युग में 'सांस्कृतिक अंतर्भुक्ति' (Cultural Inclusion) में बदल गया है। मुख्यधारा के समाज ने कामाख्या को अपने भीतर समाहित तो कर लिया है, लेकिन इस समावेशन में कामाख्या की वह आदिम, विद्रोही, समतावादी और शाबर चेतना धीरे-धीरे ओझल हो रही है, जिसने सदियों तक उत्पादक सर्वहारा आम जन को एक संबल दिया था।

विषय की गहराई को समझने हेतु लेखक के जमीनी शोध और वास्तविक अनुभवों पर आधारित इन दो चर्चित पुस्तकों का अध्ययन करें— यात्रा-वृत्तांत 'कुरुना से कामाख्या' तथा शोध-आधारित उपन्यास 'रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़'
Dr. Achal Pulastey
About the Author

डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक एवं कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।

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