आरक्षण की बहस में प्रतिनिधित्व की विविधता का प्रश्न क्यों नहीं?

आरक्षण और विविधता का प्रतिनिधित्व |यह सवाल उपेक्षित है,आखिर अकादमी,प्रशासन,उद्योग,न्यायालय,मीडिया में धार्मिक,जातिय,क्षेत्रीय,प्रांतीय प्रतिनिधित्व क्यो नहीं है ? पीएमओ जहाँ से देश की नीतियाँ संचालति होती है,वहाँ भी विविधा का पूर्णतःअभाव क्यों है? जबकि अमेरिकी लोकतंत्र में वैश्विक विविधता निर्धारित है।
Editorial Analysis
Published: July 29, 2026 | Editor in Chief
Abstract

Beyond Reservation: Why India's Debate Must Include Diversity in Representation

India's reservation policy was constitutionally designed to address historical social discrimination, educational backwardness, and inadequate representation. More than seven decades after the Constitution came into force, however, debates surrounding reservation continue to oscillate between demands for its expansion and calls for its abolition. This editorial argues that the central constitutional objective—adequate representation—deserves renewed empirical examination.
The article proposes that contemporary public discourse should move beyond the binary of "reservation versus anti-reservation" and consider a broader framework of institutional diversity and inclusive representation. It examines whether India's major public institutions adequately reflect the country's social, regional, linguistic and cultural plurality. The discussion further explores the possibility of a National Diversity and Inclusion Framework based on transparent representation audits rather than the creation of new reservation categories. Such an approach, it argues, could strengthen constitutional values of equality, social justice and equal opportunity while preserving India's democratic commitment to "Unity in Diversity." Reservation, Representation, Diversity, Inclusion, Constitution of India, Social Justice, Equal Opportunity, Public Institutions, Regional Representation, Policy Reform.

Keywords: Reservation, Representation, Diversity, Inclusion, Constitution of India, Social Justice, Equal Opportunity, Public Institutions, Regional Representation, Policy Reform.

आरक्षण:हटाओ-बताओ के शोर में खो जाता है,प्रतिनिधित्व के विविधता का सवाल

पेपर लीक आंदोलन के बाद सोशल मीडिया पर एक बार फिर "आरक्षण हटाओ" और उसके प्रतिरोध में "आरक्षण बचाओ" जैसे नारे तेज़ी से उभर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति लगातार दिखाई देती रही है। एक ओर आरक्षण के लाभार्थी इसे सामाजिक न्याय का अनिवार्य साधन मानते हैं, तो दूसरी ओर अनेक वर्ग इसकी वर्तमान संरचना और क्रियान्वयन पर प्रश्न उठाते हैं। स्वयं आरक्षण प्राप्त समुदायों के भीतर भी यह शिकायत सुनाई देती है कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण लागू होने के बाद यह विमर्श और जटिल हो गया है कि आरक्षण का मूल उद्देश्य क्या था और क्या वर्तमान व्यवस्था उस उद्देश्य को पूरा कर पा रही है।

आरक्षण का संवैधानिक आधार

भारतीय संविधान में आरक्षण का मूल आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन तथा अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है। संविधान निर्माताओं का उद्देश्य उन समुदायों को मुख्यधारा में लाना था जो सदियों तक सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और संरचनात्मक वंचना के शिकार रहे।
अनुच्छेद 15(4), 15(5) तथा 16(4) राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देते हैं। अनुच्छेद 341 और 342 अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक पहचान का आधार हैं। वर्ष 2019 में 103वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण जोड़ा गया, जिससे पहली बार आर्थिक आधार भी आरक्षण व्यवस्था का हिस्सा बना।
सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) सहित अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया कि आरक्षण का उद्देश्य समान अवसर और वास्तविक समानता स्थापित करना है। इसी क्रम में 50 प्रतिशत की सीमा तथा OBC के लिए क्रीमी लेयर जैसे सिद्धांत विकसित हुए।

सात दशक बाद भी प्रतिनिधित्व का प्रश्न

संविधान लागू होने के सात दशक से अधिक समय बाद भी यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या देश के प्रमुख प्रशासनिक, न्यायिक, शैक्षणिक, वित्तीय, वैज्ञानिक और आर्थिक संस्थानों में सभी सामाजिक वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सका है।

यदि प्रतिनिधित्व ही आरक्षण का मूल संवैधानिक उद्देश्य था, तो उसके परिणामों का नियमित और पारदर्शी मूल्यांकन भी होना चाहिए। दुर्भाग्य से अनेक सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थानों में सामाजिक प्रतिनिधित्व से संबंधित समेकित एवं अद्यतन आँकड़ों का अभाव है। इससे नीति-निर्माण तथ्य आधारित होने के बजाय राजनीतिक दावों और धारणाओं पर अधिक निर्भर दिखाई देता है।

क्या अब बहस केवल आरक्षण तक सीमित रहनी चाहिए?

इक्कीसवीं सदी में अनेक लोकतांत्रिक देशों ने केवल आरक्षण या सकारात्मक कार्रवाई तक सीमित रहने के बजाय विविधता और समावेशन (Diversity and Inclusion) की व्यापक अवधारणा विकसित की है। विभिन्न देशों की ऐतिहासिक और संवैधानिक परिस्थितियाँ अलग हैं, इसलिए उनकी नीतियों की प्रत्यक्ष तुलना उचित नहीं होगी। फिर भी एक सिद्धांत लगभग सर्वमान्य है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ तभी अधिक विश्वसनीय बनती हैं जब उनमें समाज की वास्तविक विविधता परिलक्षित हो। भारत जैसे बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल जातीय आधार तक सीमित नहीं हो सकता। इसमें क्षेत्रीय, भाषाई, सांस्कृतिक,धार्मिक, लैंगिक और सामाजिक विविधताओं का भी समुचित स्थान होना चाहिए।

इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी भारत के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों—जैसे मिजोरम, सिक्किम, पूर्वोत्तर के अन्य राज्य, जम्मू-कश्मीर तथा कुछ सीमांत क्षेत्रों—की सर्वोच्च राष्ट्रीय संस्थाओं में भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित क्यों दिखाई देती है। इन क्षेत्रों से प्रधानमंत्री, प्रभावशाली केंद्रीय मंत्रालयों का नेतृत्व, शीर्ष प्रशासनिक सेवाएँ, सर्वोच्च न्यायपालिका, राष्ट्रीय नियामक संस्थाएँ, केंद्रीय विश्वविद्यालय, IIT, IIM, प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, बड़े औद्योगिक समूह और कॉरपोरेट बोर्डों में प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम होने का प्रश्न समय-समय पर उठता रहा है।

इसी प्रकार यह भी विचारणीय है कि क्या देश के प्रत्येक क्षेत्र, भाषा और सामाजिक समूह को रक्षा सेवाओं के उच्च नेतृत्व, अनुसंधान संस्थानों, मीडिया, सांस्कृतिक संस्थानों और राष्ट्रीय नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समान अवसर प्राप्त हो रहे हैं। यह प्रश्न किसी क्षेत्र या समुदाय की योग्यता पर नहीं, बल्कि अवसरों के वितरण और संस्थागत प्रतिनिधित्व की संरचना पर केंद्रित है।

राष्ट्रीय विविधता नीति की आवश्यकता

यदि प्रतिनिधित्व ही संवैधानिक लक्ष्य है, तो उसके मूल्यांकन का दायरा भी व्यापक होना चाहिए। केवल आरक्षण की प्रतिशतता पर बहस पर्याप्त नहीं है; यह भी देखा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय संस्थानों में भारत की सामाजिक, भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता वास्तव में कितनी परिलक्षित हो रही है।

इसी दृष्टि से भारत में राष्ट्रीय विविधता एवं समावेशन नीति (National Diversity and Inclusion Framework) पर विचार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसके प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना होगा।

ऐसी नीति के अंतर्गत प्रमुख सार्वजनिक संस्थानों का समय-समय पर प्रतिनिधित्व ऑडिट (Representation Audit) किया जा सकता है। इससे यह पता चल सकेगा कि किन सामाजिक, क्षेत्रीय या भाषाई समूहों की भागीदारी अपेक्षित स्तर से कम है तथा समान अवसर की संवैधानिक भावना को और अधिक प्रभावी ढंग से कैसे लागू किया जा सकता है। यह किसी नए प्रकार के आरक्षण का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि संविधान के मूल उद्देश्य—समान अवसर, सामाजिक न्याय और पर्याप्त प्रतिनिधित्व—की उपलब्धि का एक पारदर्शी एवं प्रमाण-आधारित मूल्यांकन तंत्र विकसित करने का सुझाव है।

आज आरक्षण पर बहस प्रायः "हटाओ" और "बचाओ" जैसे नारों के बीच सीमित हो जाती है। जबकि मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या भारत की संस्थाएँ वास्तव में भारतीय समाज की विविधता का प्रतिनिधित्व करती हैं। यदि उत्तर अभी भी आंशिक है, तो समय आ गया है कि विमर्श को केवल आरक्षण की सीमाओं से आगे बढ़ाकर प्रतिनिधित्व, विविधता और समावेशन के व्यापक ढाँचे में देखा जाए। सामाजिक न्याय का अगला चरण संभवतः आरक्षण के विस्तार या संकुचन का नहीं, बल्कि ऐसी संस्थाओं के निर्माण का होगा जिनमें भारत की सामाजिक, भाषाई, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय और लैंगिक विविधता स्वाभाविक रूप से दिखाई दे। संभव है कि भविष्य का भारत इसी दिशा में "अनेकता में एकता" को एक सांस्कृतिक आदर्श से आगे बढ़ाकर प्रशासनिक, न्यायिक, शैक्षणिक और आर्थिक संस्थाओं की जीवंत वास्तविकता में बदल सके।

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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