चिकित्सा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: जवाबदेही किसकी?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चिकित्सा को अभूतपूर्व गति और सटीकता दे रहा है, लेकिन इसके साथ जवाबदेही और चिकित्सकीय विवेक पर नए प्रश्न भी खड़े हो रहे हैं। क्या भविष्य की चिकित्सा में अंतिम निर्णय मशीन का होगा, या प्रशिक्षित चिकित्सक का?
Editorial Analysis
Published: August 01, 2026 | Editor in Chief
Abstract

Artificial Intelligence in Medicine: Who Is Accountable?

Artificial Intelligence is transforming healthcare from a supportive technology into an active participant in clinical decision-making. While AI promises faster diagnosis, improved accuracy, and wider access to healthcare, it also raises a fundamental question: Who is accountable when an AI-assisted medical decision causes harm? A recent Nature article by Kyle Lam, Eric Topol, and colleagues proposes a seven-level framework for medical AI autonomy to clarify responsibility as AI systems become increasingly independent.

Beyond legal liability, an equally important concern is the erosion of physicians' clinical judgment. Excessive reliance on AI may weaken doctors' confidence, experience-based reasoning, and independent decision-making. Medicine is not merely data analysis; it also depends on human observation, ethical responsibility, and contextual understanding that AI cannot fully replicate.

AI should therefore remain a powerful clinical assistant rather than a substitute for physicians. Regulatory frameworks must ensure patient safety, transparency, and clear accountability while preserving the physician's central role in medical decision-making. The final responsibility for diagnosis and treatment must always rest with the treating physician, not the machine.

Keywords: Artificial Intelligence, Healthcare, Medical Ethics, Clinical Decision Support, Physician Responsibility, Medical Liability, Patient Safety, Health Policy, AI Regulation, Digital Health

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, चिकित्सा और जवाबदेही की नई सीमाएँ

चिकित्सा विज्ञान में तकनीक का प्रवेश कोई नई घटना नहीं है। एक्स-रे, एमआरआई, रोबोटिक सर्जरी और जीनोमिक्स जैसी तकनीकों ने चिकित्सा को अधिक सटीक और प्रभावी बनाया है। किंतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का आगमन केवल एक तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि चिकित्सा के निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में एक मूलभूत परिवर्तन है। अब AI केवल जानकारी उपलब्ध कराने वाला उपकरण नहीं रह गया है, बल्कि निदान और उपचार संबंधी निर्णयों का सक्रिय भागीदार बनता जा रहा है। यही परिवर्तन चिकित्सा की नैतिकता, कानून और जवाबदेही के सामने नए प्रश्न खड़े करता है।

प्रतिष्ठित शोध पत्रिका Nature में काइल लैम (Kyle Lam), एरिक टोपोल (Eric Topol) तथा उनके सहयोगियों द्वारा प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन इसी चुनौती का विश्लेषण करता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि चिकित्सक और AI मिलकर उपचार संबंधी निर्णय लें और उसके परिणामस्वरूप रोगी को हानि पहुँचे, तो उत्तरदायित्व किसका होगा—चिकित्सक का, अस्पताल का, AI विकसित करने वाली कंपनी का, अथवा उस एल्गोरिद्म का जिसकी कार्यप्रणाली स्वयं विशेषज्ञों के लिए भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं है? यहीं AI की तथाकथित 'ब्लैक-बॉक्स' प्रकृति सामने आती है। डीप-लर्निंग आधारित AI लाखों आँकड़ों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालता है, किंतु वह उस निष्कर्ष तक कैसे पहुँचा, इसे स्पष्ट करना अनेक बार संभव नहीं होता। यदि AI किसी रोग का गलत निदान कर दे या उपचार का अनुचित सुझाव दे, तो यह निर्धारित करना कठिन हो जाएगा कि त्रुटि चिकित्सक की थी, एल्गोरिद्म की, प्रशिक्षण डेटा की अथवा संस्थागत व्यवस्था की।

इसी समस्या के समाधान के लिए शोधकर्ताओं ने चिकित्सा AI को उसकी स्वायत्तता के आधार पर सात स्तरों (Level 0 से Level 6) में वर्गीकृत करने का प्रस्ताव रखा है। प्रारंभिक स्तरों पर AI केवल सूचना और निर्णय-सहायता प्रदान करता है, जबकि उच्च स्तरों पर वह सीमित अथवा पूर्ण स्वायत्तता के साथ निर्णय लेने में सक्षम हो सकता है। जैसे-जैसे AI की स्वायत्तता बढ़ेगी, वैसे-वैसे उत्तरदायित्व की पारंपरिक अवधारणाएँ भी पुनर्परिभाषित करनी होंगी।

किन्तु कानूनी प्रश्न से भी अधिक गंभीर एक दूसरा संकट है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। वह है चिकित्सक के आत्मविश्वास और नैदानिक विवेक का क्षरण। चिकित्सा केवल आँकड़ों का विज्ञान नहीं है। यह अनुभव, निरीक्षण, रोगी के सामाजिक और मानसिक संदर्भ, नैदानिक अंतर्दृष्टि तथा मानवीय संवेदनशीलता का सम्मिलित अभ्यास है। यदि चिकित्सक निरंतर AI की अनुशंसाओं पर निर्भर रहने लगेंगे, तो धीरे-धीरे उनका स्वतंत्र नैदानिक निर्णय (Clinical Judgment) प्रभावित हो सकता है। मनोविज्ञान में इसे ऑटोमेशन बायस कहा जाता है, जहाँ व्यक्ति मशीन के निर्णय को अपने अनुभव से अधिक विश्वसनीय मानने लगता है।

यह चुनौती चिकित्सा शिक्षा के लिए भी कम गंभीर नहीं है। यदि नई पीढ़ी के चिकित्सक प्रारंभ से ही AI पर अत्यधिक निर्भर होकर निर्णय लेना सीखेंगे, तो कठिन परिस्थितियों में स्वतंत्र विश्लेषण और निर्णय लेने की उनकी क्षमता क्रमशः कमजोर पड़ सकती है। चिकित्सा का मूल आधार अनुभव, अवलोकन और चिकित्सकीय विवेक है; इनका स्थान कोई भी एल्गोरिद्म नहीं ले सकता।

इसका अर्थ यह नहीं कि AI का विरोध किया जाए। वस्तुतः AI विशाल चिकित्सा डेटा का विश्लेषण करने, सूक्ष्म पैटर्न पहचानने, दुर्लभ रोगों की संभावना बताने और चिकित्सक को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। विशेष रूप से भारत जैसे देशों में, जहाँ विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है, AI स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

किन्तु तकनीक का उद्देश्य चिकित्सक का स्थान लेना नहीं, बल्कि उसकी क्षमता का विस्तार करना होना चाहिए। अंतिम निर्णय उस चिकित्सक का होना चाहिए जो रोगी का प्रत्यक्ष परीक्षण करता है, उसके इतिहास और परिस्थितियों को समझता है तथा अपने ज्ञान, अनुभव और नैतिक उत्तरदायित्व के आधार पर उपचार निर्धारित करता है। AI सुझाव दे सकता है, निर्णय नहीं; सहायता कर सकता है, उत्तरदायित्व नहीं निभा सकता।

भारत सहित विश्व के सभी देशों को अब AI-आधारित चिकित्सा के लिए स्पष्ट विधिक और नैतिक ढाँचा विकसित करना होगा, जिसमें उत्तरदायित्व, डेटा की पारदर्शिता, एल्गोरिद्मिक परीक्षण, रोगी अधिकार और चिकित्सकीय निगरानी के स्पष्ट मानदंड निर्धारित हों। यदि तकनीक की गति नीति-निर्माण से आगे निकल गई, तो नवाचार स्वयं विवादों का कारण बन सकता है।

ईस्टर्न साइंटिस्ट का मानना है कि चिकित्सा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य तभी सुरक्षित होगा, जब वह चिकित्सक के विवेक का विकल्प नहीं, उसका सहयोगी बने। चिकित्सा का मूल आधार आज भी प्रशिक्षित चिकित्सक का ज्ञान, अनुभव, नैतिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदना है। AI इन गुणों को सशक्त बना सकता है, उनका स्थान नहीं ले सकता। इसलिए चिकित्सा का मूल सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए—"अंतिम निर्णय मशीन का नहीं, चिकित्सक का होना चाहिए।" यही सिद्धांत रोगी की सुरक्षा, चिकित्सा की विश्वसनीयता और विज्ञान की मानवीय गरिमा—तीनों की रक्षा कर सकता है।

Dr. R. Achal

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.

ORCID iD ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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