पश्चिमी चम्पारण जिले, बिहार में स्थित रमपुरवा पुरास्थल : एक अवलोकन

Title

Rampurva Archaeological Site in West Champaran District, Bihar: An Overview

Eastern Scientist | www.easternscientist.in
Print ISSN: 2581-7884 | ISSN-L: 2581-7884 | Volume III | Issue 36 | July–September 2026
REVIEW ARTICLE
मंजीत कुमार1, बदर आरा2
1शोध छात्र, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना
2प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष,प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग,पटना विश्वविद्यालय, पटना
*Corresponding Author:मंजीत कुमार | Email: manjeet991998@gmail.com
DOI :

Abstract

Archaeological surveys in Bihar were initiated by Dr. Francis Buchanan and Sir Alexander Cunningham. Cunningham's associate, Carlleyle, discovered the Rampurva archaeological site—located near the India-Nepal border—in 1877–78; subsequently, Cunningham (1880–81) and Daya Ram Sahni (1907–08) conducted significant excavations there. Two famous monolithic pillars erected by the Mauryan Emperor Ashoka have been found at this site. One pillar is adorned with a lion capital, while the other features a magnificent bull capital—the latter is currently preserved at the Rashtrapati Bhavan. A barrel-shaped copper bolt, bearing 'taurine' and 'chaitya' symbols, was also recovered from the site. Historical Significance: Situated amidst the dense forests of Champaran and along the ancient Nepal highway, these pillars were erected by Emperor Ashoka to strengthen administration, propagate Buddhism, and foster public awareness in the region.

Keywords:Women's Autonomy, Sacred Texts, Canonical Tradition, Folk Religion, Patriarchy Folk Songs and Oral Traditions, Ritual Agency Indian Culture

सारांश

बिहार में पुरातात्विक सर्वेक्षण की शुरुआत डॉ. फ्रांसिस बुकानन और सर एलेक्जेण्डर कनिंघम ने की थी। कनिंघम के सहयोगी कार्लाइल ने 1877-78 में भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित रमपुरवा पुरास्थल की खोज की थी, जिसके बाद कनिंघम (1880-81) और दयाराम साहनी (1907-08) ने यहाँ महत्वपूर्ण उत्खनन कार्य किए। यहाँ मौर्य सम्राट अशोक द्वारा स्थापित दो प्रसिद्ध एकाश्मिक स्तंभ मिले हैं। एक स्तंभ पर सिंह शीर्ष और दूसरे पर अति मनमोहक वृषभ (बैल) शीर्ष सुशोभित है, जो वर्तमान में राष्ट्रपति भवन में सुरक्षित है। यहाँ से ताँबे का एक बैरल आकार का बोल्ट भी प्राप्त हुआ है जिस पर 'टौरीन' और 'चैत्य' की आकृतियाँ अंकित हैं। ऐतिहासिक महत्त्व: चम्पारण के बीहड़ जंगलों और प्राचीन नेपाल राजमार्ग पर स्थित होने के कारण, सम्राट अशोक ने इस क्षेत्र में प्रशासनिक सुदृढ़ता, बौद्ध धर्म के प्रसार और जनचेतना जागृत करने के उद्देश्य से इन स्तंभों की स्थापना की थी।

Keywords: रमपुरवा, अशोक स्तम्भ, पश्चिमी चम्पारन,एलेक्जेंडर कनिंघम, दयाराम साहनी, मौर्य इतिहास

शोधपत्र

बिहार में पुरातात्त्विक अध्ययन प्रारम्भ करने का श्रेय डाॅ. फ्रांसिस बुकानन को जाता है। यद्यपि उनकी नियुक्ति 1800 ई. में मैसूर क्षेत्र के कृषि सम्बन्धी सर्वेक्षण के लिए की गई थी। उन्होंने कृषि सम्बन्धी विवरणों के साथ-साथ पुरावशेषों के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचनाएं प्रस्तुत की। 1807 ई. में उन्हें बंगाल प्रेसिडेन्सी के सांख्यिकी सर्वेक्षण का कार्य-भार सांैपा गया और उन्हें निर्देश दिया गया कि इस सर्वेक्षण में भू-संरचना, इतिहास एवं पुरा सम्पदाओं से सम्बन्धित सामग्री को भी समाहित करे। डाॅ. बुकानन ने सात वर्षों में बिहार, शाहाबाद, भागलपुर, गोरखपुर, दीनाजपुर, पुर्णिया और रंगपुर का व्यापक सर्वेक्षण किया। उनके द्वारा सर्वेक्षित प्रान्तों की श्रंृखला में पश्चिमी चम्पारण परिक्षेत्र एक था तथा यह उस समय बिहार प्रदेश के चम्पारण जनपद के अन्तर्गत था।1

डाॅ0 बुकानन के पश्चात् कई दशकों तक भारतवर्ष में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण एवं अध्ययन की दिशा में शासकीय स्तर पर कोई व्यवस्थित प्रयत्न नहीं हुआ। यद्यपि कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आंशिक रूप से अध्ययन होते रहे। सन् 1861 ई. का वर्ष भारतीय पुरातत्व के इतिहास का एक महत्वपूर्ण वर्ष था, क्योंकि इस वर्ष शासकीय स्तर पर इस देश की पुरानिधियों एवं पुरावशेषों की ओर ध्यान देने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना हुई थी। यह भारत में पुरातत्त्व सम्बन्धी अनुसंधान का शासकीय स्तर पर यह प्रथम प्रयास था। सन् 1861 ई. में एलेक्जेण्डर कनिंघम को महत्वपूर्ण स्मारकों की रूपरेखा, रेखाचित्रों, छायाचित्रों, उनके इतिहास एवं परम्परा के निरूपण तथा संकलन हेतु इस कार्य को सम्पन्न करने का दायित्व सौपा गया। कनिंघम को पुरातात्विक सर्वेयर नियुक्त किया गया, जिसने सन् 1861 ई. से लेकर 1865 ई. के मध्य पूर्व में गया जिले से लेकर पश्चिम में सिन्धु तक तथा उत्तर में कालसी (देहरादून) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मध्यवर्ती क्षेत्रों की प्राचीन स्थलों की यात्रा एवं स्मारकों का सर्वेक्षण किया और ऐतिहासिक महत्व की स्थलों का विस्तृत आख्याएँ भी तैयार की।

मूलतः भारत में पुरातात्विक अध्ययन का व्यवस्थित क्रम सर एलेक्जेण्डर कनिंघम से ही प्रारंभ होता है। कनिंघम ने पुरातत्व की प्रांसगिकता एवं उपादेयता को इतिहास के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने घने जंगलों, बीहड़ मार्गों और असहनीय कठिनाईयों को सहकर फाह्मान एवं ह्नेनसांग के यात्रा विवरण को आधार बनाकर सम्पूर्ण भारत की यात्रा की तथा उन स्थलों को प्रकाश में लाया जिनके विषय में जानकारी नहीं थी। कनिंघम के सर्वेक्षण का मुख्य प्रयोजन प्राचीन स्थलों, स्मारकों एवं पुरावशेषों को प्रकाश में लाना था।

पश्चिमी चम्पारण जनपद के अन्तर्गत छिपे पुरावशेषों एवं पुरास्थलों को प्रकाश में लाने का व्यवस्थित कार्य कनिंघम द्वारा सन् 1861-62 ई. में प्रारंभ किया गया। कनिंघम ने 1861 ई. में इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया । उनके इस सर्वेक्षण योजना के मूलतः दो प्रयोजन थे। प्रथम इस क्षेत्र के पुरावशेषों तथा पुरास्थलों का सर्वेक्षण एवं संग्रह तथा द्वितीय बौद्ध धर्म से सम्बंधित स्थलों की पहचान, जो वर्तमान समय में उजाड़ हो गये थे। इस योजना को साकार करने के लिए उन्होंनें सम्पूर्ण चम्पारण जनपद का परिभ्रमण किया। इस सर्वेक्षण के क्रम में अनेक उपेक्षित एवं अज्ञात पुरास्थल प्रकाश में आये जिसका विवरण कनिंघम की भारतीय पुरातŸच सर्वेक्षण नाम से 23 जिल्दों वाली विशाल रिपोर्ट में प्रकाशित है।

रमपुरवा (27016’11.71’’ उत्तरी अंक्षाष एवं 84029’58.14’’ पूर्वी देशान्तर)

यह पुरास्थल गौनाहा रेलवे स्टेशन के निकट उसके पश्चिमोत्तर दिशा में अवस्थित है। यह स्थल भारत-नेपाल सीमा के बिल्कुल समीप है तथा पाटलीपुत्र-लौरिया-नेपाल जाने के प्राचीन राजमार्ग पर अवस्थित है। यहाँ सम्राट अशोक द्वारा एकाश्मिक स्तंभ स्थापित करवाया गया था जिस पर उसका धम्म अभिलेख उत्र्कीण है। सर्वप्रथम कनिंघम के सहयोगी कार्लाइल ने वर्ष 1877-78 में इस स्थल का पुरातात्त्विक प्रतिवेदन प्रकाशित किया।

तत्पश्चात्् इसी प्रतिवेदन को आधार बनाकर कनिंघम ने सन् 1880-81 ई0 में रमपुरवा का सर्वेक्षण किया तथा कई टीलों का सीमित उत्खनन भी कराया जिससे अनेक पुरातात्त्विक महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आयें। सन् 1907-08 ई0 में दयाराम साहनी ने इस पुरास्थल का विस्तृत उत्खनन कराया।3

कार्लाइल ने वर्ष 1877-78 ई0 में रमपुरवा से लगभग दो किलोमीटर पश्चिम दिशा में सर्वप्रथम दो एकाश्मिक स्तंभों की खोज की तथा इन स्तंभों के चारों ओर उत्खनन कार्य किया। यहाँ से कनिंघम को ताँबे का बना हुआ बैरल आकार का बोल्ट प्राप्त हुआ था, जो 62 सें0 मी0 लम्बा है और व्यास 14 सें0 मी0 तथा 9 सें0 मी का है। यह वर्तमान में कलकत्ता के इण्डियन म्यूजियम में रखा है। इस ताँबे के तार का विशेष अध्ययन दयाराम साहनी ने सन् 1907 ई0 में किया तथा पाया कि इस पर ‘‘टौरीन’’ तथा तीन चैत्यों’ की आकृति अंकित थी।

साहनी ने जब इस पुरास्थल के एकाश्मिक स्तंभ वाले हिस्से का सोलह फीट नीचे तक उत्खनन किया तब पाया कि यह सात फीट नौ इंच चैकोर तथा एक फीट नौ इंच मोटे पत्थर पर यह स्तंभ खड़ा है। स्तंभ के ऊपर का शीर्ष ढाई फीट ऊँचा है जबकि पूरे स्तंभ की कुल लम्बाई चैवालिस फीट साढ़े दस इंच मापी गई। ऊपरी भाग से इसकी गोलाई तीन फीट है।4

लौरिया नन्दगढ़ के समान सिंह की आकृति रमपुरवा के एकाश्मिक स्तंभ पर भी रखा गया था। साहनी ने इस शीर्ष की माप सात फीट बताया है तथा वर्तमान में यह इंडियन म्यूजियम में है।5

रमपुरवा में अशोक द्वारा स्थापित किया गया एक अन्य एकाश्मिक स्तंभ भी है जिसे कार्लाइल ने सन् 1877 ई0 में खोजा था। तब यह स्तंभ भूमि सतह से छः फीट ऊपर दिखाई देता था। कनिंघम ने जब इसका उत्खनन प्रारंभ किया और जब पाँच फीट की गहराई तक ही खुदाई कर पाये थे तभी भूमितल में तेज पानी का रिसाव होने लगा। बाद में जब 1907-08 ई0 में दयाराम साहनी ने इस स्थल के समीप उत्खनन कार्य प्रारंभ कराया तब उन्हें एक शीर्ष भाग मिला। उन्होंने इस स्तंभ की कुल माप तैतालिस फीट चार इंच लम्बा बताया। इसके जड़ भाग की गोलाई तीन फीट आठ इंच तथा शीर्ष भाग की गोलाई दो फीट एक इंच है। इस स्तंभ पर चार फीट ऊँचा वृषभ (बैल/साड़) की अति मनमोहक आकृति ‘एबेकस’ बैठाई गई थी। इस एकाश्मिक स्तंभ पर कोई अभिलेख उत्कीर्ण नहीं है।6 वर्तमान समय में यह वृषभ शीर्ष राष्ट्रपति भवन में रखा गया है। कार्लाइल ने रमपुरवा में दो टीलों का उल्लेंख किया है जिसका उत्खनन सन् 1880-81 में कनिंघम के द्वारा कराया गया। इनमें से एक की ऊँचाई बीस फीट थी जिसका पुरातात्त्विक उत्खनन कनिंघम ने वर्ष 1880-81 में करवाया।7 लगभग छः फीट की गहराई पर एक टूटा हुआ शिवलिंग प्राप्त हुआ। यह शिवलिंग दो फीट दो इंच ऊँचा तथा इसकी गोलाई छः इंच मापी गयी थी। इस पर काफी चमक है। इस शिवलिंग के औचित्य एवं ऐतिहासिकता पर कनिंघम महोदय ने कोई प्रकाश नहीं डाला है।

सम्राट अशोक ने धम्म प्रसार के अभियान को तीव्र गति प्रदान करने हेतु छः स्थानों पर क्रमशः (प) दिल्ली - टोपरा, (पप) दिल्ली - मेरठ स्तंभ (पपप) इलाहाबाद, कौशाम्बी स्तंभ, शेष तीन स्तंभ चम्पारण जनपद के लौरिया - नन्दनगढ़, लौरिया - अरेराज व रमपुरवा में स्थापित कराया है। अब प्रश्न यह उठता है कि सम्राट अशोक को, चम्पारण जनपद जो कि सघन वनों से आच्छादित था, में एक साथ तीन स्तंभ लेखों को स्थापित कराने का क्या प्रयोजन रहा होगा? अगर इन्हें देश के विभिन्न प्रमुख राजमार्गों पर लगाने का प्रयोजन था, तो अन्य स्थानों पर अभिलेखयुक्त एकाश्मिक स्तंभ क्यों नहीं मिलें हैं? चम्पारण जनपद से प्राप्त तीनों स्तंभों में से दो तो गंडक नदी के लगभग किनारें पर स्थापित हैं तथा एक भारत - नेपाल सीमा पर। इसके समीप ही भिखनाठोरी नामक स्थल है जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मार्ग पर वैशाली से केसरिया होते हुए बुद्ध, उनके शिष्यगण एवं बौद्ध पर्यटक भारत से नेपाल जाते-आते रहे होंगे, इसके साथ ही यह भी सम्भावना व्यक्त की जा सकती है कि इस क्षेत्र के जंगलों में अशोक के समय में भी अराजकता व्याप्त रही होगी। पशु-पक्षियों, जानवरों का आखेट भी किया जाता रहा होगा, सामाजिक व्यवस्था टूटने के कगार पर रही होगी तथा लोग धर्म से विमुख होने लगे होंगे। इसी कारणवश प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ कर जनचेतना जागृत करने के उद्देश्य से सम्राट अशोक ने चम्पारण के इन बीहड़ जंगलों का चयन एकाश्मिक स्तम्भ स्थापित कराने हेतु किया होगा।

संदर्भ

  1. घोष, ए0: इण्डियन आर्कियोलाॅजी, पृ0 1-2
  2. कनिंघम, एलेक्जेण्डर (2000): ए0एस0आई रिपोर्ट, खण्ड ग्टप्ए पृ0 110-17
  3. साहनी, दयाराम: ए0एस0आई एन्यूवल रिपोर्ट (1906-07), पृ0 16
  4. वही, पृ0 16
  5. कनिंघम, एलेक्जेण्डर: पूर्वोक्त, खण्ड ग्टप्ए पृ0 110-17
  6. साहनी, दयाराम: पूर्वोक्त, पृ0 16
  7. कनिंघम, एलेक्जेण्डर: पूर्वोक्त, खण्ड ग्टप्ए पृ0 110-17

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